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संकट: अफगानिस्तान के दलदल में आधा दर्जन देशों को फंसाकर निकल गया अमेरिका, भारत को भी नहीं सूझ रहा उपाय
Sat, 10 Jul 2021 03:29 PM IST
संजीव कुमार झा
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: संजीव कुमार झा
Updated Sat, 10 Jul 2021 03:29 PM IST
सार
- तालिबान का मकसद मिशन काबुल पर कब्जा करना
- तुर्की, पाकिस्तान, रूस, चीन, ईरान कर रहे हैं अफगानिस्तान योजना पर काम
- रूस, चीन, ईरान को साधकर ही बनेगी भारत की बात
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अफगानिस्तान पुलिस
विस्तार
अफगानिस्तान में अमेरिका, भारत और नाटो द्वारा प्रशिक्षित करीब 20-22 हजार सैनिकों ने अपना देश छोड़कर आस-पास के देशों में जगह ले ली है। अमेरिकी फौज के समय से पहले ही अफगानिस्तान छोड़ देने के बाद पड़ोसी देश जहां गृहयुद्ध के रास्ते पर खड़ा हो गया है, वहीं रूस, चीन, ईरान की भी चिंताएं बढ़ गई हैं। बदले समय को देखकर तालिबान जहां काबुल पर कब्जा का रोडमैप बना रहा है, वहीं तुर्की, पाकिस्तान समेत कई देशों की अफगानिस्तान को लेकर सक्रियता बढ़ी है। भारतीय कूटनीति के जानकारों को अफगानिस्तान एक नए दल दल के रूप में दिखाई दे रहा है और वो मानते हैं कि फिलहाल इसका कोई अचूक उपाय नहीं है।
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नया दलदल है अफगानिस्तान, सबसे बड़ी चिंता तो सुरक्षा की है
पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि सबसे बड़ी समस्या विश्वास के संकट की खड़ी हो गई है? अमेरिका पर विश्वास करें या तालिबान पर विश्वास करें? शशांक कहते हैं कि सबसे बड़ी चुनौती तो अभी सुरक्षा और हितों की चिंताओं से निबटना है। अफगानिस्तान में हमारे हजारों लोग हैं। उन्हें सुरक्षित रखना, निकालना या निकलना भी गंभीर विषय है। दुविधा यह है कि लंबे समय से भारत ने तालिबान और अन्य से कोई संबंध, संवाद नहीं रखा। हम अमेरिका के भरोसे रहे और अफगानिस्तान की सरकार और उनके तंत्र से बात करते रहे। अब अफगानिस्तान में सरकार के लोग खुद अपनी ही सुरक्षा को लेकर तंग है। तमाम अफगानिस्तान के प्रशिक्षित सुरक्षा बलों ने भागकर सुरक्षित स्थानों पर शरण ली है। नादर्न अलायंस सिमट गया है। तालिबान अपना प्रभाव बनाने में लगा है और लोग अमेरिकी सैनिकों के भागने के बाद लूटपाट में लगे हैं।
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अफगानिस्तान में शांति का जो रास्ता बता देगा, वह नोबेल प्राइज पा जाएगा: प्रो. एसडी मुनि
विदेश मामलों के जानकार प्रो. एसडी मुनि से जब अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता को लेकर सवाल हुआ तो उनकी एक सहज प्रतिक्रिया आई। प्रो. मुनि ने कहा कि जो यह रास्ता बता देगा, वह नोबल प्राइज का हकदार हो जाएगा। प्रो. मुनि की प्रतिक्रिया बताती है कि हालात कितने पेचीदा हैं। प्रो. मुनि कहते हैं कि अफगानिस्तान के अंदरुनी हालात और राजनीति में तो हमारा कोई दखल था नहीं। हम केवल अफगानिस्तान के निर्माण, आधारभूत संरचना विकास में सहयोग कर रहे थे। तालिबान समेत अन्य के संपर्क में नहीं थे। अब अमेरिकी सैनिक समय से पहले अफगानिस्तान छोड़कर चले गए हैं और कह रहे हैं कि रूस, चीन सभी लोग मिल जाओ। यह कहना आसान है, लेकिन जमीनी स्थिति काफी अलग है। प्रो. मुनि के अनुसार अफगानिस्तान में आने वाले समय में अस्थिरता बढ़ेगी। तालिबान का प्रभाव रहेगा। हमारे विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कल कहा कि वह अफगानिस्तान में लोकतंत्र का शासन चाहते हैं, जबकि तालिबान का लोकतंत्र में भरोसा ही नहीं है। अफगानिस्तान के राजदूत ने कहा कि भारत वहां के सैनिकों को प्रशिक्षण में सहयोग देता रहे। प्रो. मुनि के अनुसार सैनिकों को हम प्रशिक्षण तो दे सकते हैं, लेकिन वहां सेना नहीं उतार सकते। इसलिए अभी बहुत कुछ सवालों का जवाब समय आने पर ही दिया जा सकता है।
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तुर्की, पाकिस्तान, चीन, रूस, ईरान, भारत और अफगानिस्तान
जिओपॉलिटिक्स के नए शेप को समझना भी जरूरी है। पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई अफगानिस्तान में तालिबान समेत कई समुदायों, संगठनों में सक्रिय रही है। चीन अपने शिनजियांग प्रांत और ऊइगर मुसलमानों को लेकर संवेदनशील रहता है। इसलिए वह भी डील करता रहा है। ईरान की अफगानिस्तान से सीमा लगी हुई है और ईरान के अफगानिस्तान में शिया मुसलमानों समेत अन्य में लोग भी हैं। वहीं रूस उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान के माध्यम से अफगानिस्तान में सक्रिय रहता है। नादर्न अलायंस के लोग रूस के साथ संपर्क में हैं। एक नया देश तुर्की अफगानिस्तान में ज्यादा रुचि ले रहा है। पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं तुर्की खिलाफत का खलीफा बनने के लिए उतावला है। इन सभी देशों में भारत के रूस के साथ संबंध सबसे अच्छे हैं। चीन के साथ अभी रिश्ता थोड़ा खटास भरा है। ईरान, तुर्की के साथ वह प्रगाढ़ता नहीं है और पाकिस्तान की जमीन से भारत के विरुद्ध आतंकी गतिविधियां चलती हैं। इसलिए अभी आगे नहीं कहा जा सकता कि रिश्ता किस तरह से क्या आकार लेगा। शशांक के मुताबिक सबसे ज्यादा जरुरी अभी सुरक्षा को सुनिश्चित करना ही है। भविष्य और हितों की सुरक्षा इसके बाद आती है। अभी तो यह भी नहीं पता है कि भविष्य के अफगानिस्तान में काबुल की स्थिति क्या रहेगी। किस समुदाय का कहां कितना प्रभाव रहेगा। यह सब बहुत आसान नहीं रहने वाला है।
अफगान सरकार के सैनिक और सुरक्षा बलों को सता रही है अपनी चिंता
खुफिया और सुरक्षा मामलों से जुड़े अधिकारी बताते हैं कि प्रशिक्षित अफगानी सैनिकों की बड़ी तादाद अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित है। तमाम प्रशिक्षित सैनिकों के पास संसाधन,राशन, पैसा, हथियार और सामान नहीं हैं। ये अमेरिका और यूरोप के संसाधन पर वहां लड़ रहे थे। अमेरिकी फौज के जाने के बाद वह भाग खड़े हुए हैं। तालिबान ने कंधार दमन में धमाके, कब्जा करना शुरू किया है। उसकी योजना 85 प्रतिशत अफगानिस्तान पर कब्जा करने की है। अफगानिस्तान रूस, भारत समेत अन्य से सैन्य मदद मांग रहा है। अमेरिकी 20 साल तक अफगानिस्तान में रहे और अचानक सब छोड़कर भाग गए। इससे साफ है कि अब अमेरिका अफगानिस्तान में कुछ खास करने वाला नहीं है। उसका मिशन अफगानिस्तान पूरी तरह से फेल रहा है। इसलिए अभी कुछ भी कहना ठीक नहीं है।