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बाधाओं को चीर बनाई राह.. : ऑटो, क्रेन चालक के बच्चे नहीं, अब कहिए आईएएस अफसर, अपने दम पर हुए चयनित
Wed, 01 Jun 2022 05:34 AM IST
योगेश साहू
अमर उजाला रिसर्च डेस्क, नई दिल्ली।
अमर उजाला रिसर्च डेस्क, नई दिल्ली।
Published by: योगेश साहू
Updated Wed, 01 Jun 2022 05:34 AM IST
सार
झारखंड में क्रेन ऑपरेटर की बेटी दिव्या पांडेय ने एक साल तक रोजाना 18 घंटे स्मार्टफोन व इंटरनेट की मदद से परीक्षा की तैयारी की। दिव्या (24) के पिता जगदीश प्रसाद बेटी की सफलता पर गदगद है। उनकी बड़ी बेटी प्रियदर्शिनी भी झारखंड राज्य लोकसेवा आयोग की परीक्षा का पहला चरण पास कर चुकी हैं।
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आयुषी डबास
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
आईएएस बनने का सपना कई युवा देखते हैं, लेकिन कई बाधाएं उनकी राह रोक देती हैं। और वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो इन्हीं बाधाओं, मुश्किलों और अभावों के बीच जीते हुए इनसे जूझना सीख लेते हैं। पढ़िए ऐसे ही कुछ युवाओं के बारे में जिन्होंने इन सभी को अपने रास्ते में नहीं आने दिया और सिविल सेवा अधिकारी बनेंगे। किसी के पिता क्रेन ऑपरेटर थे तो किसी के ऑटो चालक या छोटे से गांव में दुकानदार। कुछ ने अपनी शारीरिक चुनौती के बावजूद जीवन को उजाला से भरा तो किसी ने दूर-दुर्गम इलाकों में रहते हुए देश की सबसे चुनौतीपूर्ण परीक्षा में सफलता पाई।
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अपनी मेहनत से भरा जीवन में उजाला : आयुषी डबास, रैंक 48
30 साल की आयुषी डबास देख नहीं सकतीं, लेकिन यह अंधेरा उन्हें अपने जीवन में उजाला लाने से रोक नहीं सका। सिविल सेवा में 48वां स्थान लाने वाली आयुषी स्कूल-कॉलेज में भी टॉपर रहीं। दिल्ली रानी खेड़ा की आयुषी दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड में भी टॉप पर रहीं और अभी इतिहास की शिक्षिका हैं।
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तैयारी ऐसे की
आयुषी ने कई तरह के मोबाइल एप की सहायता से पढ़ाई की। इनसे वे विषय व सामग्री को सुन सकती थीं। वहीं नर्सिंग अधिकारी रहीं उनकी मां ने वीआरएस लेकर उनकी तैयारी करवाई।
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बेटे की जीत से ऑटो चालक के घर उत्सव : स्वप्निल पवार, रैंक 418
नाशिक के स्वप्निल के घर में उत्सव का माहौल है। घर की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं है, पिता जगन्नाथ पवार ऑटो रिक्शा चालक हैं और किसी तरह संघर्ष कर परिवार चलाते थे। उनके इस संघर्ष को स्वप्निल ने सफलता में बदलते हुए सिविल सेवा परीक्षा में 418वां स्थान हासिल किया है।
नौकरी के साथ तैयारी
केमिकल इंजीनियरिंग स्वप्निल काम से लौट कर सिविल सेवा की तैयारी करते थे। उनका पहला प्रयास भी सफल था, लेकिन रैंक कम थी। उन्होंने फिर से प्रयास किया और इस बार अपनी रैंक में सुधार किया।
गांव के दुकानदार के बेटे ने भरी उड़ान : रामेश्वर सुधाकर, रैंक 202
यूपीएससी परीक्षा में सफलता हासिल करने वाले महाराष्ट्र के रामेश्वर ने जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा ली और पुणे से इंजीनियरिंग। उनके पिता महाराष्ट्र के लातूर की उदगीर तहसील के एक छोटे से गांव हंडरगुळी में दुकान चलाते हैं और मां गृहिणी हैं।
कड़ी मेहनत
सिविल सेवा में जाने के लिए यह रामेश्वर का दूसरा प्रयास था। उन्होंने बताया कि पढ़ाई के दौरान उन्होंने आर्थिक बाधाओं पर अपनी कड़ी मेहनत से इन पर विजय पाई।
क्रेन ऑपरेटर की बेटी ने पाई सफलता : दिव्या पांडेय, रैंक 323
झारखंड में क्रेन ऑपरेटर की बेटी दिव्या पांडेय ने एक साल तक रोजाना 18 घंटे स्मार्टफोन व इंटरनेट की मदद से परीक्षा की तैयारी की। दिव्या (24) के पिता जगदीश प्रसाद बेटी की सफलता पर गदगद है। उनकी बड़ी बेटी प्रियदर्शिनी भी झारखंड राज्य लोकसेवा आयोग की परीक्षा का पहला चरण पास कर चुकी हैं।
इंटरनेट बना सहारा
रांची विश्वविद्यालय से 2017 में ग्रेजुएशन कर चुकी दिव्या का पहला ही प्रयास था। उन्होंने बताया कि स्मार्टफोन और इंटरनेट की मदद के साथ एनसीईआरटी की किताबों से परीक्षा की तैयारी की।
तेनजिंग ने किया अरुणाचल का नाम रोशन : तेनजिंग चोनजोम, रैंक 584
अरुणाचल प्रदेश के दुर्गम शहर तवांग की तेनजिंग चोनजोम ने सिविल सेवा परीक्षा में कामयाबी हासिल की। पिता सांग फुंत्सोक पन-ऊर्जा विभाग में सचिव हैं। उनकी सफलता पर उत्साहित सीएम पेमा खांडू ने उन्हें बधाई दी और कहा कि चोनजोम ने पूरे प्रदेश का नाम ऊंचा किया है।
सीएम ने बढ़ाया उत्साह
राज्य से 7 अभ्यर्थी प्रीलिम्स में पास हुए थे, केवल चोनजोम ने मेन्स पास किया। पास नहीं हुए अभ्यर्थियों का भी उत्साह बढ़ाते हुए सीएम ने उन्हें निराश न होने और आगे बढ़ने की सलाह दी।