यूपीआई शुल्क मामला: दो हजार रुपये से ज्यादा भुगतान पर एमडीआर का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, कल होगी सुनवाई
यूपीआई से 2000 रुपये से ज्यादा के चुनिंदा कारोबारी भुगतान पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लगाने की नई व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। मामले की सुनवाई 28 सितंबर को होगी। यह शुल्क 15 अक्टूबर से लागू होना है। याचिकाकर्ता ने इस व्यवस्था को क्यों चुनौती दी है? क्या सुप्रीम कोर्ट इस पर रोक लगाने या बदलाव का रास्ता खोल सकता है? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
विस्तार
यूपीआई से 2000 रुपये से ज्यादा के भुगतान पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर लगाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। शीर्ष अदालत 28 सितंबर को इस व्यवस्था को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करेगी। केंद्र ने 14 सितंबर को संबंधित अधिसूचना जारी की थी और 15 सितंबर को एमडीआर का ढांचा घोषित किया गया था। नई व्यवस्था 15 अक्टूबर से लागू होने वाली है।
सुप्रीम कोर्ट में किस याचिका पर होगी सुनवाई?
अधिवक्ता अंजन दत्ता ने जनहित याचिका दाखिल कर केंद्र के फैसले को चुनौती दी है। याचिका में 14 सितंबर की अधिसूचना और 15 सितंबर को घोषित एमडीआर व्यवस्था को चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट की 28 सितंबर की कार्यसूची के मुताबिक, मामले की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ करेगी। याचिका में कहा गया है कि यह शुल्क पर्याप्त कानूनी सुरक्षा, पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श के बिना लागू किया गया है।
2000 रुपये से ज्यादा के यूपीआई भुगतान पर क्या बदलेगा?
नई व्यवस्था के तहत सामान्य व्यक्ति से कारोबारी यानी पी2एम यूपीआई भुगतान में 2,000 रुपये से अधिक की राशि पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लगाया जाएगा। यह शुल्क 75,000 रुपये या उससे अधिक के भुगतान पर अधिकतम 300 रुपये तक सीमित रहेगा। वहीं, रेलवे, दूरसंचार, बीमा, ईंधन और कृषि संबंधी जरूरी क्षेत्रों में 2,000 रुपये से अधिक के भुगतान पर प्रति लेनदेन 5 रुपये का एमडीआर तय किया गया है। शेयर बाजार, प्रतिभूति और म्यूचुअल फंड से जुड़े भुगतान पर 0.02 प्रतिशत एमडीआर होगा, जिसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये है।
क्या हर यूपीआई भुगतान पर शुल्क लगेगा?
इस व्यवस्था में व्यक्ति से व्यक्ति यानी पी2पी यूपीआई भुगतान पर कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा। 2,000 रुपये तक के निर्धारित यूपीआई भुगतान भी शुल्क से बाहर रहेंगे। यानी प्रस्तावित एमडीआर का असर मुख्य रूप से तय सीमा से अधिक के व्यक्ति से कारोबारी भुगतान पर पड़ेगा। एमडीआर सीधे ग्राहक से लिया जाने वाला सामान्य यूपीआई शुल्क नहीं है, बल्कि यह भुगतान व्यवस्था से जुड़े कारोबारी लेनदेन पर लागू होने वाला शुल्क है।
याचिका में एमडीआर को लेकर क्या सवाल उठाए गए?
याचिका में संशोधित भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की धारा 10ए की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि इस प्रावधान से कार्यपालिका को यह तय करने की पर्याप्त स्पष्ट सीमा नहीं मिलती कि किन इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों को शुल्क से छूट मिलेगी। याचिका में यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड के बीच अलग-अलग व्यवस्था पर भी सवाल उठाया गया है। याचिकाकर्ता ने एमडीआर व्यवस्था को रद्द या स्थगित करने की मांग की है।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से क्या मांग की?
याचिका में वैकल्पिक तौर पर एमडीआर व्यवस्था पर दोबारा विचार करने की मांग की गई है। इसके लिए पारदर्शी परामर्श, आंकड़ों का प्रकाशन और प्रभाव का आकलन कराने की बात कही गई है। याचिका में छोटे और सूक्ष्म कारोबारियों के लिए सुरक्षा उपायों की मांग भी की गई है। साथ ही कहा गया है कि भविष्य में एमडीआर तय करते समय कारोबारी का कारोबार, एमएसएमई की स्थिति, वास्तविक मुनाफा, क्षेत्र और शुल्क वहन करने की क्षमता जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा जाए। अब 28 सितंबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट इस चुनौती पर सुनवाई करेगा।