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फांसी की सजा पाने वालों में अधिकतर गरीब और कम पढ़े लिखे

Sun, 08 May 2016 03:19 PM IST
राजीव सिन्हा/ अमर उजाला, दिल्ली
राजीव सिन्हा/ अमर उजाला, दिल्ली Updated Sun, 08 May 2016 03:19 PM IST
सार

  • सेंटर ऑन द डेथ पेनाल्टी की रिपोर्ट में हुआ खुलासा
  • फांसी की सजा पाने वालों में 84 फीसदी का था पहला अपराध

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UP tops in death penalty cases
फांसी - फोटो : Demo pic

विस्तार

अपने जघन्य अपराध के लिए फांसी की सजा पाने वालों की संख्या सबसे अधिक उत्तर प्रदेश में है, जबकि बिहार दूसरे स्थान पर है। वैसे आबादी के अनुपात में देखें तो देश की राजधानी दिल्ली पहले पायदान पर है। इस बात का खुलासा सेंटर ऑन द डेथ पेनाल्टी की रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार फांसी की सजा पाने वालों में 84 फीसदी ऐसे हैं, जिन्होंने पहली बार अपराध किया। इनमें अधिकतर गरीब और कम पढ़े लिखे हैं तथा उनका कोई आपराधिक पृष्ठभूमि भी नहीं रहा है।

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20 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश की जेलों में बंद फांसी की सजा पाए 373 कैदियों और उनके परिवारवालों से बातचीत के आधार पर तैयार रिपोर्ट में कहा गया है कि फांसी की सजा पाए 74.1 फीसदी कैदी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के हैं। इनमें 76 फीसदी अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति, ओबीसी या धार्मिक अल्पसंख्यक समूह से हैं।
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इन कैदियों में 73 अपने परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य थे, जबकि 59 परिवार में कमाने वाले मुख्य सदस्य थे। रिपोर्ट के मुताबिक, फांसी की सजा पाने वाले कैदियों में 23 फीसदी ऐसे हैं जो कभी स्कूल नहीं गए, जबिक 61.6 फीसदी ने माध्यमिक तक की शिक्षा पूरी नहीं की। फांसी की सजा पाए लोगों में 34 फीसदी ओबीसी हैं, जबकि 24.5 फीसदी एससी/एसटी व 24 फीसदी सामान्य वर्ग के हैं। 20.7 फीसदी धार्मिक अल्पसंख्यक समूह के हैं। आतंकी गतिविधियों में फांसी की सजा पाने वालों में करीब 93.5 फीसदी अनुसूचित जाति या धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय से हैं। आतंकी मामलों में फांसी की सजा पाए 31 लोगों में 19 (61.3 फीसदी) अल्पसंख्यक हैं। रिपोर्ट के अनुसार फांसी की सजा पाने वालों में 12 महिलाएं हैं। 
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उत्तर प्रदेश में कुल 79 लोगों को फांसी की सजा मिली है। इनमें से 62 लोगों को हत्या के मामले में फांसी की सजा हुई है। दिल्ली में फांसी की सजा पाने वालों की संख्या 30 है, जबकि जम्मू एवं कश्मीर और उत्तराखंड में यह संख्या क्रमश: छह और चार है। रिपोर्ट के मुताबिक, फांसी की सजा पाए 373 कैदियों में से दिहाड़ी मजदूर (खेतिहर और गैर खेतिहर) की संख्या 170 है, जबकि 17 बेरोजगार,  छह छात्र और तीन धर्म से जुड़े काम करने वाले हैं।


रिपोर्ट के मुताबिक, फांसी की सजा पाने वालों में 60 फीसदी हत्या, जबकि  20 फीसदी यौन अपराधों में दोषी ठहराए गए हैं। 373 कैदियों में से 270 का मामला विभिन्न हाईकोर्टों में लंबित है, जबकि 52 कैदियों का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। 30 की दया याचिका लंबित है, जबकि 21 की दया याचिका खारिज हो चुकी है। इन कैदियों में से 18 ने दावा किया है कि घटना के वक्त वे नाबालिग थे।

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