UP Politics: क्या मायावती बदलेंगी अपनी सियासी चाल? घोसी उपचुनाव में उलटे पड़े दांव के बाद बन रही यह रणनीति
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विस्तार
बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती अब अपनी सियासी रणनीति को बदलने की बड़ी योजना बना सकती हैं। योजना के मुताबिक पार्टी अब यह संभावना भी तलाशने की कोशिश कर रही है कि क्या लोकसभा चुनाव से पहले किसी बड़े सियासी गठजोड़ का हिस्सा बना जाए। दरअसल मायावती ने लोकसभा चुनाव से पहले किसी भी सियासी दल से गठबंधन के लिए हामी ही नहीं भरी है। सियासी जानकारों का मानना है कि जिस तरीके से घोसी उपचुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने वोट न देने का दांव खेला था, वह पूरी तरीके से फ्लॉप हो गया। अब हालात ऐसे हो गए हैं कि मायावती को अब अपने कोर वोट बैंक में भी उनकी पार्टी के लिए भरोसे का सबसे बड़ा संकट पैदा हो गया है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बसपा अमूमन उपचुनाव से हमेशा से दूर रही है। लेकिन कई बार उसने उपचुनाव में अपनी किस्मत भी आजमाई। इस बार उत्तर प्रदेश के घोसी में हुए उपचुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने चुनाव लड़ना तो दूर की बात, बल्कि अपने मतदाताओं को वोट न देने की भी अपील कर डाली। राजनीतिक विश्लेषक हरिओम तंवर कहते हैं कि चुनावी साल में बसपा ने जिस तरीके से उपचुनाव न लड़ने के साथ-साथ मतदाताओं को वोट न देने की अपील की, वह बहुजन समाज पार्टी के लिए बैकफायर कर गया। उनका कहना है कि जो चुनाव आने वाले लोकसभा चुनावों में एक तरह का परसेप्शन बनाने वाला था, उसमें ही बहुजन समाज पार्टी को सबसे बड़ा झटका लगा है। तंवर कहते हैं कि और उनकी पार्टी के रणनीतिकारों ने ऐसा फैसला क्यों लिया यह तो वही बेहतर बता सकेंगे, लेकिन उसके दूरगामी परिणाम फिलहाल बहुजन समाज पार्टी के लिए बिल्कुल सकारात्मक नजर नहीं आ रहे हैं।
वहीं बहुजन समाज पार्टी ने भी घोसी उपचुनाव से पहले अपनी तैयार की गई रणनीति पर एक बार फिर से विचार करने की तैयारी शुरू कर ली है। सूत्रों का कहना है कि पार्टी से जुड़े प्रमुख नेता अब बसपा सुप्रीमो मायावती से मिलकर घोसी उप चुनाव में मिले वोटों पर मंथन करने के साथ-साथ नई रणनीति बनाने की गुजारिश करने की बात कर रहे हैं। पार्टी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पार्टी ज्यादातर उपचुनाव नहीं लड़ती है, लेकिन दबी जुबान में कुछ नेता इस बात को स्वीकार करते हैं कि जब लोकसभा चुनाव से पहले घोसी के उपचुनाव की इतनी अहमियत थी, तो पार्टी को इतना बड़ा रिस्क नहीं लेना चाहिए था। इस फैसले से अंदरूनी तौर पर नाराज कुछ नेता कहते हैं कि अब पार्टी के लिए सबसे बड़ा संकट अपने वोटर के बीच में भरोसे का हो गया है। राजनीतिक जानकार भी मानते हैं कि बहुजन समाज पार्टी के वोटरों के बीच में यह संदेश जाना बेहद जरूरी था कि बहुजन समाज पार्टी घोसी के उपचुनाव में मैदान में है। उसका परिणाम चाहे पार्टी के पक्ष में आता है या विपक्ष में।
राजनीतिक विश्लेषक हरिहर पांडे कहते हैं कि जिस तरीके से घोसी उपचुनाव में बहुजन समाज पार्टी के वोटरों के सामने कोई विकल्प नहीं बचा और वह एकतरफा भारी संख्या में समाजवादी पार्टी की ओर चले गए, उससे बसपा को अपनी रणनीति बनाने पर निश्चित तौर पर बड़ा विचार करना होगा। पांडे कहते हैं कि मायावती की पार्टी ने जिस तरीके से लोकसभा चुनावों से पहले एनडीए और INDIA गठबंधन से दूरी बनाई थी, अब पार्टी इस बारे में विचार कर सकती है। उनका मानना है कि बहुजन समाज पार्टी के लिए इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती अपने वोट बैंक को बचाने की है। क्योंकि पहले से तय रणनीति के चलते ही उसके वोट बैंक में बड़ी सेंधमारी हुई है।
जानकारों का मानना है कि घोसी उपचुनाव के परिणाम के बाद संभव है कि मायावती अपनी सियासी रणनीति में बड़े फेरबदल कर सकती है। घोसी में लंबे समय तक सियासत को करीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार हरि नाम दुबे कहते हैं कि 2019 में बहुजन समाज पार्टी ने उपचुनाव में कयूम अंसारी को अपना प्रत्याशी बनाकर सियासी मैदान में उतारा था। उन्हें 50000 से ज्यादा वोट मिले थे। दुबे कहते हैं पूर्वांचल में घोसी विधानसभा सीट बहुजन समाज पार्टी के लिए हमेशा से महत्वपूर्ण सीट मानी जाती रही है। 2007 में बहुजन समाज पार्टी से फागु चौहान यहीं से विधायक हुए। जबकि उससे पहले भी बसपा ने यहां पर अपनी जीत दर्ज थी। वह कहते हैं कि बहुजन समाज पार्टी के लिए घोसी विधानसभा सीट इसलिए भी महत्वपूर्ण रही है कि जिन चुनावों में वह यहां से नहीं जीती, उसमें भी बसपा दो नंबर पर ही रही है। इसलिए यह माना जाता रहा है बहुजन समाज पार्टी का अच्छा खासा वोट बैंक और वर्चस्व घोसी विधानसभा में रहा है। 2022 में हुए विधानसभा के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी को 54000 से ज्यादा वोट मिले थे। लेकिन उपचुनाव में आए नतीजे और समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी को मिले वोट बताते हैं कि बहुजन समाज पार्टी ने लोकसभा चुनावों से पहले किस तरीके की सियासी गलती कर दी है।