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UP Election 2022: पसमांदा मुसलमानों को जोड़ने में कितने कामयाब हुए मोदी, दूसरे चरण का विजेता तय करने में इनकी अहम भूमिका
सार
2007 में मायावती और 2012 में अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने में इस क्षेत्र ने अहम भूमिका निभाई थी, लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में इस क्षेत्र में 38 सीटें हासिल कर भाजपा ने सपा-बसपा की चुनावी रणनीति पर सवाल खड़ा कर दिया था।
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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पश्चिमी यूपी में दूसरे चरण की जिन 55 सीटों पर सोमवार को मतदान हुआ, इनमें सबसे ज्यादा संख्या मुसलमानों की है। इस क्षेत्र में लगभग 37 फीसदी की आबादी रखने वाला मुसलमान जिसके भी पक्ष में मुड़ जाए, उसकी जीत लगभग पक्की हो जाती है। 2007 में मायावती और 2012 में अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने में इस क्षेत्र ने अहम भूमिका निभाई थी, लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में इस क्षेत्र में 38 सीटें हासिल कर भाजपा ने सपा-बसपा की चुनावी रणनीति पर सवाल खड़ा कर दिया था।
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सबसे ज्यादा चौंकाने वाला परिणाम मायावती के लिए रहा था, जिनकी पार्टी बसपा 25 फीसदी से ज्यादा दलित आबादी वाले इसी क्षेत्र में शून्य पर जाकर सिमट गई थी। तो क्या दलित मतदाताओं ने मायावती को नकार दिया था, और क्या भाजपा ने वंचित मुसलमानों के बीच भी अपना मतदाता तैयार कर लिया है जो सांप्रदायिक राजनीति से ऊपर उठकर उसे सपोर्ट कर रहे हैं? क्या इस चुनाव में भी ऐसा होगा?
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पसमांदा मुस्लिम समुदाय के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. फैयाज अहमद फैजी ने अमर उजाला से कहा कि मंडल-कमंडल की राजनीति के उभार के बाद भाजपा हाशिए पर चली गई थी। वह यूपी में तीसरे नंबर की पार्टी बनकर रह गई थी। ऐसी परिस्थिति में भाजपा नेताओं ने बड़ी ही रणनीतिक चतुराई का परिचय देते हुए गैर-जाटव दलितों और गैर-यादव ओबीसी को अपने साथ जोड़ा। उन्होंने इन वर्गों के लिए काम किया और उन्हें संगठन-समुदाय में पर्याप्त भागीदारी देते हुए उनका भरोसा जीता। इसी का परिणाम हुआ कि इन वर्गों ने भाजपा के लिए वोट किया और भाजपा एक बार फिर बड़ी ताकत बनकर उभरी।
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हाल ही में हुए एक सर्वे के अनुसार, पांच फीसदी मुसलमान योगी आदित्यनाथ को दुबारा मुख्यमंत्री बनते हुए देखना चाहते हैं। परंपरागत मुस्लिम राजनीति को देखते हुए यह आंकड़ा कुछ लोगों को चौंका सकता है, लेकिन डॉ. फैयाज अहमद फैजी कहते हैं कि इसमें कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि नरेंद्र मोदी सरकार की प्रधानमंत्री आवास योजना, राशन योजना और पेंशन योजना का सबसे बड़ा लाभ पसमांदा मुसलमानों को ही हुआ है।
पूर्वांचल के गाजीपुर का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यहां प्रधानमंत्री आवास योजना के 80 फीसदी लाभार्थी पसमांदा समाज के मुसलमान ही हैं। जिन गरीब मुसलमानों के लिए घर एक सपना हुआ करती थी, नरेंद्र मोदी सरकार ने उसे एक हकीकत में तब्दील करने का काम किया है। यही कारण है कि इस वर्ग में भाजपा के साइलेंट समर्थक तैयार हो रहे हैं जो चुपचाप उसके लिए मतदान कर रहे हैं।
उच्च पदों पर भागीदारी भी
पसमांदा मुसलमानों में योगी-मोदी समर्थक इसलिए भी तैयार हो रहे हैं क्योंकि सरकार ने इस वंचित वर्ग को उन पदों पर बैठाने का काम किया है जो कभी इनके लिए सपना रहा करता था। अल्पसंख्यक आयोग, उत्तर प्रदेश, मदरसा बोर्ड और उर्दू बोर्ड के अध्यक्ष अब तक केवल अशराफ मुसलमानों (स्वयं को विदेशी मूल का मानने वाले मुस्लिम समुदाय में उच्च जाति के मुसलमान) के बीच से ही होते आए हैं। लेकिन योगी आदित्यनाथ सरकार ने इन प्रमुख पदों पर पसमांदा समाज के मुसलमानों को बिठाया है। अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष पसमांदा मुसलमानों में बढ़ई वर्ग से संबंध रखते हैं तो मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष इफ्तिखार जावेद पसमांदा मुसलमानों में बुनकर समुदाय से आते हैं।
रोजगार से भी साधा
भाजपा ने रामपुर-वाराणसी से लेकर दिल्ली तक अनेक बार हुनर हाट का आयोजन किया है। इन हुनर हाटों में सबसे ज्यादा प्राथमिकता उन कारीगरों को ही दिया जाता है जो अपने हाथ से काम करने वाले कारीगर रहे हैं। हिंदू समुदाय के कारीगर वर्ग अब ज्यादातर नौकरी पेशा होने को प्राथमिकता देने लगे हैं, लेकिन मुसलमानों के बीच अभी भी हाथ के कारीगर भारी संख्या में मौजूद हैं। इन हुनर हाटों का सबसे ज्यादा फायदा उन्हें ही हो रहा है, उनका कारोबार आगे बढ़ रहा है और इन बाजारों के जरिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच भी मिल रहा है। ऐसे में यदि इन वर्गों के बीच भाजपा के लिए रुझान बढ़ रहा हो तो इस पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
पसमांदा मुस्लिम समुदाय के बारे में सबकुछ
कहा जाता है कि मुस्लिम समुदाय में 90 फीसदी आबादी पसमांदा मुसलमानों की है। ये वे मुसलमान हैं जो हिंदू धर्म में निचली जातियों से थे, लेकिन मुगल काल में इस्लाम अपना लेने के बाद वे मुसलमान बन गए। लेकिन मुसलमान बनने के बाद भी इनकी सामाजिक-राजनीतिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया। खुद को विदेशी मूल का मुसलमान मानने वाले उच्च जाति के अशराफ मुसलमान इनसे रोटी-बेटी का संबंध नहीं रखते। कई जगहों पर इनका सामाजिक बहिष्कार तक किया जाता है। ऐसे में इन जातियों के बीच अपने नेतृत्व को लेकर सुगबुगाहट तेज हो रही है।