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UP Election 2022: यूपी चुनाव में क्या गुल खिलाएगा जिन्ना का ‘जिन्न’, क्या यह सपा का गढ़ा हुआ विवाद है

Mon, 01 Nov 2021 03:34 PM IST
Pratibha Jyoti प्रतिभा ज्योति
Updated Mon, 01 Nov 2021 03:34 PM IST
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सार
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना का जिक्र गलती से कर दिया है या वे जानबूझ कर जिन्ना को यूपी चुनाव में ले कर आए हैं? जानकार कहते हैं कि अखिलेश यादव की जबान फिसलती नहीं है, वे जो करते हैं सोच-समझ कर करते हैं।
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up election 2022 mohammad ali jinnah jin turned out again is this a fabricated controversy of samajwadi party chief akhilesh yadav
मोहम्मद अली जिन्ना - फोटो : BBC

विस्तार

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने यूपी चुनाव में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना का जिक्र छेड़ कर नए विवाद की शुरूआत कर दी है। हरदोई जिले में समाजवादी विजय रथ यात्रा लेकर पहुंचे  अखिलेश यादव ने जिन्ना को आजादी का नायक बताया। अपने भाषण में उन्होंने जिन्ना की तारीफ करते हुए कहा कि उन्होंने आजादी के लिए संघर्ष किया था। उन्होंने कहा कि जिन्ना गांधी और पटेल की सोच एक ही थी।


उनके इस बयान पर भाजपा ने उन्हें घेरना शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि पटेल से जिन्ना की तुलना शर्मनाक है। अखिलेश यादव को माफी मांगनी चाहिए। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने रविवार को ट्वीट किया सरदार पटेल की जयंती पर अखिलेश यादव जिन्ना का गुणगान क्यों कर रहे हैं। वहीं यूपी सरकार के मंत्री मोहसिन रजा ने भी कहा कि विभाजनकारी जिन्ना की  विचारधारा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी,सरदार पटेल, जवाहर लाल नेहरू की विचारधारा है, ऐसा कह कर अखिलेश यादव ने देश के महापुरुषों का अपमान किया है। उन्हें जिन्नावादियों से वोट की आस है। इससे पहले भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अब तक दो बार समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते वक्त ‘अब्बाजान’ शब्द का इस्तेमाल कर चुके हैं। 




अनावश्यक विवाद
उत्तर प्रदेश की राजनीति को गहराई से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी की नजर में यह अखिलेश यादव की नासमझी है। वे वही गलती कर रहे हैं जो आडवाणी ने पाकिस्तान जाकर की थी। उनका मानना है कि अखिलेश यादव ने एक अनावश्यक विवाद मोल लिया है। भाजपा तो वैसे भी हिंदुत्व कार्ड खेल रही है और उन्होंने भाजपा को एक और मुद्दा थमा दिया है। जिसका चुनाव में भाजपा जमकर इस्तेमाल करेगी, क्योंकि वह ऐसे ही मुद्दों की तलाश में रहती है। 
 

मोहसिन रजा व अखिलेश यादव।
मोहसिन रजा व अखिलेश यादव। - फोटो : amar ujala
एम-वाई समीकरण से बनाई कई बार सरकार
2017 के विधानसभा चुनावों तक उत्तरप्रदेश में मुस्लिम वोट बैंक की बड़ी लड़ाई थी। एम-वाई समीकरण की वजह से तीन बार मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव एक बार उत्तर प्रदेश में सत्ता की कमान संभाल चुके हैं। प्रदेश में करीब 10 फीसदी यादव समुदाय के मतदाता हैं, जो ओबीसी समुदाय की जनसंख्या में 20 फीसदी हैं। यादव समाज में मंडल कमीशन के बाद ऐसी गोलबंदी हुई कि उनका झुकाव सपा की तरफ हो गया।वहीं उत्तर प्रदेश में करीब 20 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। प्रदेश की कुल 143 सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं का प्रभाव है। इनमें से 70 सीटों पर मुस्लिम आबादी बीस से तीस प्रतिशत है। वहीं 73 सीटें ऐसी हैं जहां मुसलमान तीस फीसद से ज्यादा है। 

मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप
2108 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में जिन्ना की तस्वीर लगाए जाने पर भी जब विवाद हुआ था तो सपा ने इससे दूरी बनाई थी। 1990 में जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे और उन्होंने विवादस्पद भूमि पर साधु-संतों और कारसेवकों के पहुंचने के बारे में कहा था कि ‘परिंदे को भी राम जन्मभूमि पर पर नहीं मारने दूंगा’। उनके आदेश पर दो नवंबर 1990 को कारसेवकों पर गोली चलाई गई थी, गोलीकांड में 40 कारसेवकों की मौत हो गई थी। हालांकि सपा को इस का सियासी फायदा मिला वे मुस्लिम सपा की तरफ खिंचते चल गए। मुसलमानों में अभी भी सपा उनकी पहली पसंद मानी जाती है और सपा मुस्लिम वोटों की चाहत रखती है।

इसी वजह से सपा पर हमेशा मुसलमानों को खुश करने के आरोप लगते रहे हैं।  मुस्लिम, यादव व अन्य पिछड़ी जातियों वोट के जरिए सपा ने 2002 व 2007 के विधानसभा चुनाव में 25 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल किए थे। इसी वोट बैंक की बदौलत 2012 के चुनाव में सपा को पहली बार बहुमत की सरकार बनाने का मौका मिला। लेकिन भाजपा से मुकाबला करने के लिए इस चुनाव में अब तक अखिलेश यादव खुद को नर्म हिन्दुत्व के प्रतिनिधि के तौर पर भी पेश करने की कोशिश कर रहे थे, क्योंकि उनकी पार्टी ने यह भांप लिया कि 2014 के बाद से जिस तरह से हिंदू वोटर्स पर भाजपा की पकड़ मजबूत होती जा रही है उसे देखते हुए पार्टी को यह लगता है कि केवल यादव और मुस्लिम वोट बैंक के भरोसे रखकर विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत नहीं हासिल किया जा सकता। 
 

गोरखपुर में प्रियंका गांधी वाड्रा।
गोरखपुर में प्रियंका गांधी वाड्रा। - फोटो : अमर उजाला।
अखिलेश यादव के पास एम-वाई समीकरण का आधार है, लेकिन उन्होंने शुरुआत में अपनी रणनीति बदलते हुए बहुसंख्यक हिंदुओं का वोट बैंक जोड़ने के लिए एक तरफ खुद को असली केशव (श्रीकृष्ण) का वंशज बताया, तो दूसरी तरफ वह उन बातों से परहेज करते रहे जिससे भाजपा उन पर मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप न लगाए। इसलिए उन्होंने रामंदिर का दर्शन करने की भी बात कही थी। परशुराम की मूर्ति और मंदिर बनाने का एलान किया। इसी साल आठ जनवरी को अखिलेश ने चित्रकूट से चुनावी दौरा शुरू किया था,  आठ साल पहले भाजपा ने भी यहीं से प्रचार शुरू किया था।

मुस्लिम कार्ड खेलने से बचते रहे
अखिलेश यादव ने कामदगिरि पर्वत की परिक्रमा की। सिर्फ जनवरी में उन्होंने चार प्रमुख मंदिरों का दौरा कर लिया। वे तुष्टिकरण के आरोपों से बचने के लिए ही वजह एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी से हाथ मिलाने से कतराते रहे हैं। जबकि एआईएमआईएम चुनाव में सपा से गठबंधन करने की इच्छुक नजर आती है। हाालंकि 2021-10-25 हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में भी सपा ने यही कोशिश की थी, जिसका मतदाताओं पर कोई खास असर नहीं पड़ा। उत्तर प्रदेश में इस बार के चुनाव में भाजपा के हिंदुत्व कार्ड के सामने अखिलेश यादव खुलकर मुस्लिम कार्ड खेलने से अभी तक बच रहे थे, लेकिन बदलते माहौल ने उन्हें अपने कोर वोट बैंक को पकड़ कर रखने के लिए वापिस उनके बीच पहुंचने के लिए मजबूर कर दिया है।

प्रियंका और ओवैसी की सक्रियता ने डराया 
सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के मैदान में उतरने और कांग्रेस के पक्ष में माहौल को थोड़ा बदलते देख सपा ने अपनी रणनीति में एक बार फिर बदलाव किया है। वहीं असदुद्दीन ओवैसी की यूपी में बढ़ती सक्रियता और मुसलमानों के बीच बनती पैठ ने भी उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर कर दिया है।

 

अबू आजमी
अबू आजमी - फोटो : amar ujala
एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक के मुताबिक एक जमाने में मुस्लिम वोट बैंक कांग्रेस का आधार वोट बैंक माना जाता था जो पिछले कुछ चुनावों में लगभग पूरी तरह सपा की तरफ शिफ्ट हो गया था। लेकिन यूपी में प्रियंका गांधी जिस तरह से सक्रिय हुईं है उससे सपा में यह भय बन गया है कि कहीं उनका परंपरागत वोट बैंक वापिस कांग्रेस की तरफ न मुड़ जाए और उनका कोर वोट बैंक न खिसक जाए इसलिए जिन्ना की बात करके अखिलेश यादव एक तरह से संतुलन साधने की कोशिश कर रहे है। वे बताते हैं कि आने वाले चुनाव में जिन्ना का जिक्र चुनाव के आखिरी चरण तक होता रहेगा। भाजपा जमकर इसे मुद्दे को भुनाएगी और इससे वोटों का ध्रुवीकरण होगा। 

सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता आई पी सिंह ने कहा 'सरदार वल्लभ भाई पटेल ने कहा था कि मुसलमानों को अलग कर हिंदू राष्ट्र बनाने जैसी बातें करने वाले लोग देश को कमजोर करते हैं, इन पर प्रतिबंध लगाया जाना शायद सार्थक है। आज सरदार पटेल होते तो नफरत की राजनीति करने वालों पर पूरी तरह प्रतिबंध होता।' 

मुस्लिम वोट बैंक को साधे की कवायद
मुस्लिम वोट बैंक को अपने साथ मजबूती से जोड़ने के लिए सपा मुस्लिम उलेमाओं का सहारा लेने की कवायद में जुट गई है। अखिलेश यादव ने पिछले सप्ताह ईद-मिलादुन्नबी के मौके पर लखनऊ के ऐशबाग ईदगाह में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मौलाना खालिद राशीद फरंगी महली से मुलाकात की। सपा के मुस्लिम चेहरा आजम खान के जेल में बंद होने के कारण सपा के पास कोई मुस्लिम चेहरा नहीं है तो अखिलेश यादव ने महाराष्ट्र के मुंबई से विधायक अबु आसिम आजमी को यूपी के मुसलमानों को साधे रखने की जिम्मेदारी दी है। आजमी अलग-अलग जिलों का दौरा करके मुस्लिम उलेमाओं और मौलानाओं से मुलाकात कर रहे हैं और उन्हें सपा के लिए लामबंद करने की कोशिश में लगे हैं।


 

भाजपा नेता ने शौचालय में लगाई जिन्ना की तस्वीर
भाजपा नेता ने शौचालय में लगाई जिन्ना की तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
जिन्ना का नाम लेने से हिन्दुस्तान के मुसलमान खुश नहीं होते
हालांकि वरिष्ठ पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी के मुताबिक यदि अखिलेश यादव यह सोच रहे हैं कि वे जिन्ना का नाम लेकर  मुस्लिमों को खुश कर देंगें, तो वे गलत सोच रहे हैं क्योंकि उनका यह दांव उल्टा भी पड़ सकता है। वे मानते हैं कि यह समझना भारी भूल होगी कि हिन्दुस्तान का मुसलमान जिन्ना को नेता मानता है। जो जिन्ना को मानते थे जो उनके समर्थक थे वे उनके साथ पाकिस्तान चले गए।, हिन्दुस्तान में जो मुसलमान बचा है वे गांधी, नेहरू, पटेल, की वजह से रूके थे। जिन्ना को उनके समकक्ष रखना गांधी, नेहरू और पटेल का अपमान है। वे चाहते तो खान अब्दुल गफ्फार खान का नाम ले सकते थे, मौलाना आजाद का नाम ले सकते थे। एक गंभीर विषय पर भीड़ में इस तरह की बातें नहीं होनी चाहिए यह इतिहासकारों का काम है।

कब-कब हुआ जिन्ना पर विवाद
इसी साल पीएम नरेंद्र मोदी 14 सितंबर को जब अलीगढ़ दौरे पर पहुंचने वाले थे तो पीएम के आने से पहले ही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में लगी जिन्ना की तस्वीर पर विवाद बढ़ गया।  भाजपा कार्यकर्ताओं ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से मोहम्मद अली जिन्ना की फोटो हटवाने के लिए विरोध जताया। इसके बाद भाजपा कार्यकर्ताओं ने जिन्ना की तस्वीर शौचालय में लगा दी। 

इससे पहले 2108 में जब अलीगढ़ के सांसद सतीश गौतम ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में जिन्ना की तस्वीर लगाए जाने पर आपत्ति जताई थी। फोटो हटाने की मांग को लेकर विवाद छिड़ गया था और छात्रों ने इसका विरोध जताना शुरू कर दिया। विरोध प्रदर्शन रोकने के लिए पुलिस को छात्रों पर लाठीचार्ज करना पड़ा। जिसमें कम से कम तीन छात्र घायल हो गए थे। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लगी जिन्ना की तस्वीर पर विवाद लंबा चला। इसी विवाद पर यूपी कैबिनेट के मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने जिन्मा को महापुरूष बता दिया था। उन्होंने जिन्ना को भारत के लिए योगदान देने वाला पुरूष बताया था। 

 

Prayagraj News : असदुद्दीन ओवैसी।
Prayagraj News : असदुद्दीन ओवैसी। - फोटो : प्रयागराज
मई 2018 में समाजवादी पार्टी के सांसद प्रवीण निषाद ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के योगदान की तुलना पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना से करने पर भी विवाद पैदा हो गया था। 

दिसंबर 2018 में फैजाबाद जेल में एक कार्यक्रम के दौरान मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर लगाए जाने को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया था। स्थानीय भाजपा विधायक और विहिप ने आयोजकों और जेल अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।

14 अगस्त 2017 को उस समय नया विवाद खड़ा हो गया था जब संघ समर्थित मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के कार्यकर्ताओं ने मोहम्मद अली जिन्ना के साथ देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का पुतला फूंका।

2015 में जब एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी उत्तर प्रदेश में अपने पैर पसारने की कोशिश कर रहे थे तब अगस्त में लखनऊ में हुए 'समाजवादी प्रबुद्ध सभा'  की सभा में, पूर्व सपा सांसद रामजी लाल सुमन ने ओवैसी को "नया जिन्ना" बताया था। उन्होंने कहा कि ओवैसी का बढ़ता प्रभाव देश के लिए खतरनाक है।

 
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