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UP Assembly Election 2022: योगी, अखिलेश, केजरीवाल, मायावती, इनके-उनके किनके राम

Tue, 26 Oct 2021 07:19 PM IST
Pratibha Jyoti प्रतिभा ज्योति
Updated Tue, 26 Oct 2021 07:19 PM IST
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सार
2017 के यूपी चुनाव का नारा था राम लहर, लेकिन असल में राम लहर पर तो इस बार सभी पार्टियां सवार हैं। सभी पार्टियां भाजपा के तुष्टिकरण के आरोपों का मुकाबला करने के लिए अपने-अपने तरीके से राम की शरण में पहुंच रही हैं। इसलिए इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा अयोध्या की हो रही है। सभी पार्टियों को उम्मीद है कि ‘राम’ नाम ही भंवर में फंसी उनकी नैया को पार लगाएगा।
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up assembly election 2022: yogi adityanath, akhilesh yadav, arvind kejriwal, mayawati, every parties running around ram and ayodhya temple
सरयू आरती करते अरविंद केजरीवाल। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अयोध्या दौरे पर पहुंचे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बड़ा एलान किया है। केजरीवाल ने कहा कि दिल्लीवासियों को हम मुफ्त में रामलला के दर्शन कराएंगे। साथ ही केजरीवाल ने यह भी कहा हम दिल्ली के अंदर मुख्यमंत्री तीर्थ योजना चला रहे हैं जिसके तहत लोगों को मुफ्त तीर्थ यात्रा कराई जाती है। हम अयोध्या को भी मुख्यमंत्री तीर्थ योजना में शामिल करेंगे। अब दिल्ली के लोग रामजन्मभूमि के भी मुफ्त दर्शन करेंगे।



केजरीवाल ने दीपावली से पहले राम के दर्शन कर लिए हैं। जबकि दीपावली से पहले हर साल होने वाले दीपोत्सव कार्यक्रम में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के भी अयोध्या पहुंचने की चर्चा है। मार्च 2017 में प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार आने के बाद से प्रदेश में हर साल यह कार्यक्रम आयोजित हो रहा है।  दीपोत्सव दिवाली से एक दिन पहले मनाया जाएगा।


यूपी चुनाव को लेकर राज्य की सभी विपक्षी पार्टियां जिनमें आम आदमी पार्टी भी शामिल है इस बार राम के दरबार में हैं और वे नरम हिंदुत्व की राह पर चल रहे हैं। चाहे वह दिल्ली की सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी हो, जिसने अयोध्या में तिरंगा यात्रा निकाली हो या बहुजन समाज पार्टी जिसने ब्राह्मणों को अपने पाले मे खींचने के लिए प्रबुद्ध समाज की बैठक की शुरुआत यहीं से की हो। दिसंबर 2020 में, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी अयोध्या का दौरा किया था। तब उन्होंने कहा था, "भगवान राम उतने ही हमारे हैं जितने किसी और के हैं।" उन्होंने कहा था जब राम मंदिर बनेगा तो पत्नी, बच्चों संग दर्शन करूंगा।

यादव ने तब से राज्य भर के कई मंदिरों का दौरा किया है, जिसमें मथुरा में प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर भी शामिल है। हालांकि भाजपा लगातार सपा पर तुष्टिकरण के आरोप लगाते हुए अखिलेश पर निशाना साधती रही है। उनसे पहले कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी भी 2019 के लोकसभा चुनाव में अयोध्या पहुंची थीं। इस दौरान प्रियंका ने कांग्रेस प्रत्याशी निर्मल खत्री के लिए रोड शो करने के साथ-साथ हनुमान गढ़ी के दर्शन किए थे। 

अयोध्या में योगी आदित्यनाथ (फाइल फोटो)
अयोध्या में योगी आदित्यनाथ (फाइल फोटो) - फोटो : amar ujala

दूसरी तरफ राम मंदिर आंदोलन के सहारे केंद्र और राज्य की सत्ता में पहुंचने वाली भाजपा मानती है कि हमारे लिए तो राम आस्था का प्रतीक हैं, लेकिन विपक्षी पार्टियां इसे वोट बैंक की तरह देखती हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ 29  बार से ज्यादा अयोध्या जा चुके हैं। वहीं प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी राम जन्म भूमि मंदिर निर्माण के भूमि पूजन से लेकर कई मौके पर अयोध्या पहुंचते रहे हैं।

योगी सरकार ने पहले फैजाबाद जिले का नाम अयोध्या किया और अभी फैजाबाद स्टेशन का नाम अयोध्या कैंट कर दिया गया है। स्टेशन पर पुनर्निमाण का कार्य चल रहा है। एयरपोर्ट तैयार हो रहा है और अयोध्या को विश्व स्तरीय पर्यटन स्थल के तौर पर तैयार किया जा रहा है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि विपक्षी पार्टियों पर अल्पसंख्यकों, मुख्य रूप से मुसलमानों के "तुष्टिकरण" के आरोप लगते रहे हैं इसलिए वे भाजपा की चाल को कुंद करने के लिए राम के दरबार में बारी-बारी से आ रहे हैं। 

उत्तर प्रदेश की राजनीति को गहराई से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी का मानना है कि राम सबके थे, गांधी के भी, लोहिया के भी, लेकिन भाजपा ने इसे पॉलिटिकल हिंदुत्व के एजेंडे में बदल दिया है, इसलिए दूसरी पार्टियां नहीं चाहती कि वे राम विरोधी कहलाई जाएं या भाजपा को उन्हें राम विरोधी कहने का मौका मिले, इसलिए वे राम की शरण में आ गए हैं। 

अयोध्या में रंगभरी एकादशी में निकली निशान यात्रा में भक्तों पर गुलाल डालते साधु-संत और बजरंगबली पर गुलाल अर्पित करते भक्त (फाइल फोटो)
अयोध्या में रंगभरी एकादशी में निकली निशान यात्रा में भक्तों पर गुलाल डालते साधु-संत और बजरंगबली पर गुलाल अर्पित करते भक्त (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

राम सबके
सपा के एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा वे (भाजपा) हम पर तुष्टिकरण करने का आरोप लगाकर यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि भगवान राम या भगवान कृष्ण पर उनका कॉपीराइट है। लेकिन हम कह रहे हैं कि भगवान सभी के लिए हैं, कुछ चुनिंदा लोगों के लिए नहीं। हम भी हिंदू हैं, लेकिन भाजपा उसी वोट बैंक की राजनीति चतुराई से करती है। 

क्या सिर्फ राम के नाम पर चुनाव जीता जा सकता हैं?
एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि राम आस्था का प्रतीक हैं, लेकिन उनके नाम को चुनाव में उतार दिया गया, बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद 1993 के विधानसभा चुनाव में यूपी में भाजपा की सरकार बनती लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस चुनाव में मुलायम सिंह यादव ने कांशीराम से हाथ मिला लिया था। 177 सीटें जीतने के बावजूद भाजपा सत्ता से दूर रही।

यूपी में भाजपा-विरोधी मोर्चा तैयार हो गया था। हालांकि दूसरा सच यह भी है कि राम जन्मभूमि के नाम पर ही सियासत में भाजपा का चढ़ाव हुआ और पार्टी लोकसभा में 300 से ज्यादा सीटों पर पहुंच गई। लेकिन इस चुनाव में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा नहीं है, क्योंकि राम मंदिर बनने लगा है, इसलिए पार्टियों के पास अब विरोध करने के लिए कुछ नहीं बचा है। पांच अगस्त 2020 को पीएम नरेंद्र मोदी ने मंदिर के लिए भूमि पूजन किया था, उसके बाद से यूपी में पहली बार चुनाव हो रहे हैं, जिसमें भाजपा निश्चित तौर पर राम मंदिर निर्माण की उपलब्धि की चर्चा करेगी। 

राम दत्त त्रिपाठी कहते हैं कि चुनाव किसी एक मुद्दे पर नहीं जीता जा सकता है, उसमें कई स्थानीय और क्षेत्रीय महत्व के मुद्दे भी शामिल होते हैं। राम नाम उसका एक हिस्सा हो सकता है, लेकिन जमीन पर काम किए बिना केवल इस सहारे चुनाव नहीं जीता जा सकता, क्योंकि जरुरी नहीं कि सारे हिंदू भाजपा के हिंदुत्व ब्रांड के साथ हों।    

मुलायम सिंह यादव व अखिलेश यादव।
मुलायम सिंह यादव व अखिलेश यादव। - फोटो : amar ujala

राजनीतिक परिदृश्य कैसे बदला
राम मंदिर का निर्माण शुरू होने से पहले राजनीतिक दलों में दो तरह की विचारधारा काम कर रही थी। एक राम मंदिर का विरोध करने वाली पार्टियां थीं, तो दूसरे मंदिर के समर्थन में। लेकिन अब जब राम मंदिर का निर्माण शुरू हो गया है तो अब कोई राजनीतिक दल इसका समर्थन नहीं करने का जोखिम नहीं उठाना चाहती है। बल्कि सभी पार्टियां अयोध्या के विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही हैं। राम दत्त त्रिपाठी के मुताबिक चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने अब विवाद सुलझा दिया है, इसलिए राम मंदिर निर्माण को लेकर कुछ राजनीतिक पार्टियों में जो हिचक थी, वह दूर हो गई है। इसलिए अब यूपी में चुनावी परिदृश्य बदल गया है।

अब तक तुष्टिकरण की बात नहीं
राजनीति के जानकार कहते हैं कि 2022 के चुनाव से पहले मुस्लिम तुष्टिकरण का मुद्दा हर चुनाव में हावी रहा, जिसके कारण मुलायम से लेकर कल्याण सिंह तक को खामियाजा उठाना पड़ा। 1990 में मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे और उन्होंने विवादस्पद भूमि पर साधु-संतों और कारसेवकों के पहुंचने के बारे में कहा था कि ‘परिंदे को भी राम जन्मभूमि पर पर नहीं मारने दूंगा’। उनके आदेश पर दो नवंबर 1990 को कारसेवकों पर गोली चलाई गई थी, गोलीकांड में 40 कारसेवकों की मौत हो गई थी।

पहली बार 30 अक्तूबर, 1990 को कारसेवकों पर चली गोलियों में पांच लोगों की मौत हुई थीं। इस गोलीकांड का नुकसान मुलायम सिंह को उठाना पड़ा था। जबकि 1992 में यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने कारसेवकों पर गोली नहीं चलाई तो इसका नतीजा यह हुआ कि उनकी सरकार चली गई। कल्याण सिंह राम मंदिर आंदोलन के दौरान पार्टी के यूपी में सबसे मुखर चेहरा थे। 

जानकार बताते हैं कि इन दोनों घटनाओं का यूपी चुनाव पर लंबे समय तक असर रहा। लेकिन इस चुनाव में अभी तक मुस्लिम तुष्टिकरण की बात नहीं हो रही है। कोई भी राजनीतिक दल अभी तक मुसलमानों के साथ सीधे खड़े होने का जोखिम नहीं ले रहा है। प्रत्यक्ष तौर पर मुस्लिम वोट बैंक सियासी दलों के फोकस में नहीं है। 

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