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मानव रहित विमानों के निर्माण को झटका: तटीय क्षेत्रों की निगरानी के लिए बने जहाज का वजन हुआ ज्यादा तो धीमी पड़ी रफ्तार, गश्त हुई प्रभावित
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हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के लघु मानवरहित हवाई वाहनों के डिजाइन एवं विकास पर निष्फल व्यय किया गया है। इनके निर्माण पर लगभग 14.73 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। जब इनका फाइनल ट्रायल हुआ तो स्थिरता एवं परिचालन उच्चता के सम्बन्ध में कई ऐसी बातें नजर आई, जिन पर निर्माण के दौरान ध्यान नहीं दिया गया। नतीजा, ग्राहकों के विनिर्देशों को पूरा नहीं किया जा सका। आगे कोई वित्तीय लाभ नहीं है, यह मानते हुए 14.73 करोड़ रुपये के कुल व्यय को लेखा पुस्तकों में प्रभारित कर दिया गया।
हिन्दुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड, विशाखापट्टनम (एचएसएल) ने भारतीय तटरक्षक (आईसीजी) के साथ 231.19 करोड़ रुपये की कुल लागत पर पांच समुद्र तट गश्त पोतों का निर्माण कार्य शुरू किया था। इनकी सुपुर्दगी मार्च 2008 और मार्च 2009 के बीच होनी थी, मगर वह जनवरी 2012 से मई 2018 तक के बीच सुपुर्द किए गए। कई ऐसे पुर्जे लगा दिए गए, जिससे जहाज का वजन काफी ज्यादा बढ़ गया। इससे जहाज की रफ्तार धीमी पड़ गई। समय पर सुपुर्दगी न होने के कारण तटीय क्षेत्रों में की जाने वाली निगरानी गश्त पर विपरित असर पड़ा।
आयुध फैक्ट्रियां एवं रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रम पर संसद में प्रस्तुत भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की ताजा रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है। रिपोर्ट में लिखा है कि एचएएल ने ग्राहकों के विनिर्देशों को पूरा नहीं किया। लघु मानवरहित हवाई वाहनों के डिजाइन एवं विकास पर जो खर्च हुआ था, वह निष्फल व्यय में तबदील हो गया। हिन्दुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड, विशाखापट्टनम (एचएसएल) ने भारतीय तटरक्षक (आईसीज) के साथ 231.19 करोड़ रुपये की कुल लागत पर पांच समुद्र तट गश्त पोतों (आईपीवी) के निर्माण तथा सुपुर्दगी के लिए, मार्च 2006 में एक अनुबंध किया था। अनुबंध के अनुसार, पांच समुद्र तट गश्त पोत, आईपीवी को मार्च 2008 तथा मार्च 2009 के बीच सुपुर्द किये जाने थे। निर्माण में हुई देरी के चलते ये पांच समुद्र तट गश्त पोत, जनवरी 2012 से मई 2018 तक के विलम्ब से सुपुर्द किए गए थे।
लेखापरीक्षा के दौरान यह भी मालूम पड़ा है कि एचएसएल ने अनुबंधात्मक शर्तों के विचलन में निर्माण सामग्रियों के वजन को मॉनिटर नहीं किया। इसका परिणाम यह हुआ कि जहाजों के वजन में वृद्धि हो गई। इसके चलते आईपीवी की गति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। तीव्र गति गश्ती पोत के रूप में उनकी उपयोगिता कम हुई। अनुबंध की कई शर्तों का उल्लंघन होने के कारण उनकी सामग्री लागत, श्रम लागत, प्रत्यक्ष व्यय और उपरिव्यय में लगातार वृद्धि होती चली गई। इसके परिणामस्वरूप निष्पादन में एचएसएल को कुल 200.43 करोड़ रुपये की हानि हुई। इतना ही नहीं, बल्कि समय पर आईसीजी को आईपीवी की अनुपलब्धि ने तटीय क्षेत्रों में नियमित निगरानी गश्त को भी प्रभावित किया।
भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) की टैंको के सामयिक उन्नयन में विफलता के कारण कंपनी को अतिरिक्त व्यय करना पड़ा। बीईएल ने 748.19 करोड़ रुपये के टैंकों को अपग्रेड करने के लिए रक्षा मंत्रालय के साथ एक नियत मूल्य का अनुबंध (मार्च 2011) किया था। बीईएल की खराब योजना ने उन्नयन कार्य को विलंबित किया। इसका नतीजा यह हुआ कि 201.50 करोड़ रुपये के अपरिहार्य व्यय के साथ 18.32 करोड़ रुपये का परिनिर्धारित नुकसान भी हुआ। एक अन्य मामले में बीईएल ने मेसर्स एबीजी शिपयार्ड लिमिटेड, मुंबई (एबीजी) से 315.66 करोड़ रुपये के कुल मूल्य पर, तीन अलग-अलग संचार प्रणाली के तीन नंबरों की आपूर्ति की सुपुर्दगी के लिए जून 2013 में ऑर्डर प्राप्त किया था। बीईएल ने अनुबंध की शर्तों के अनुसार, सभी तीन प्रणालियों के लिए प्रारंभिक अग्रिम की प्राप्ति को सुनिश्चित किए बिना, 42.58 करोड़ रुपये में तीनों प्रणालियों के लिए सामग्री खरीद ली। बीईएल को केवल 14.87 करोड़ रुपये का अग्रिम प्राप्त हुआ था। इस वजह से एबीजी दिवालिया हो गया। यह निष्क्रिय स्कंध का कारण बना, जो 26.32 करोड़ रुपये की राशि की निधियों के अवरोधन में परिणत हुआ।