युवा चित्रकार राजा देओरी का अनोखा पेटिंग एग्जीबिशन
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कलाकार प्रकृति के जितने नजदीक रहता है, उसकी कृति भी उतनी ही निखरती है। चित्रकार जितने भी रंगों का उपयोग करता है, वे प्रकृति से ही लेता है। इसलिए रंगों का लय और ताल उसी रूप में चित्र में रंगने चाहिए, लगे की वह प्रकृति का ही रूप है। अगर हम ऐसा करने में सफल हो गए तो मानिए वह आंखों के रास्ते ध्यान का रूप ले लेता है। यह कहना है ऑयल और एक्रीलिक के सामंजस्य से भारतीय चित्रकारिता को नया आयाम देने वाले युवा चित्रकार राजा देओरी का। इन दिनों उनका आजाद भवन में चित्रकला एग्जिविशन चल रहा है, जो 25 फरवरी तक चलेगा।
पूर्वोत्तर भारत के रहने वाले लेकिन करीब 17 साल पहले अपने गृह प्रदेश असम को छोड़कर दिल्ली को ही अपने कला का घर बनाने वाले राजा कहते हैं, मेरे चित्र प्रकृति के बहुत करीब हैं। मैं वहीं से रंग और भावना लेता हूं और उसे चित्रों में उकेर देता हूं। जैसे मानव शरीर पंच तत्वों से मिलकर बना है, उसी में मिल जाएगा। मेरे चित्र भी उनका ही अनुसरण करता है। आज अगर मैं देश और विदेश में पहचाना जाता हूं तो उसका एक मात्र कारण है, ऑयल और एक्रीलिक का सामंजस्य।
इन दोनों को इस तरह से नया रूप देने का प्रयास कर रहा हूं कि उनका स्वरूप नए रूप में परिवर्तित हो जाए। कला की साधना और सेवा में अपने जीवन को समर्पित कर चुके राजा को उनकी कला के लिए कई राष्ट्रीय पुरस्कार व फैलोशिप भी मिल चुके हैं। 2018 में एआईएफएसीएस ने उन्हें नेशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया। दो बार भारत सरकार के मीनिस्ट्री ऑफ कल्चरर उन्हें फैलोशिप दे चुकी है। इसके अलावा भी अनेक सम्मान और पुस्कार उनको मिल चुके हैं।
राजा के चित्रों को देखने और समझने के लिए आपमे बहुत धैर्य होना चाहिए। उनके चित्रों की बारीक-बारीक लकीरें, उनमें रंगों का संयोजन, रंगों का ऐसा मिश्रण मानों कोई नदी बह रही है। ये रंग आपको आपके आंखों के माध्यम से ध्यान तक ले जाते हैं। आप चुप-चाप जब उनकी रंगों में खोते हैं तो लगता है कि आप भी कहीं खो गए हैं। आपको अपने होने का आभास बहुत कम रह जाएगा।
उनके रंग और उनकी महीन कारीगरी आपको दूसरी ही दुनिया में लेकर जाते हैं। जहां न आप होते हैं और ना ही चित्र और ना ही रंगों की दुनिया। आप भी उनके रंगों में खो सकते हैं, 25 तक आजाद भवन, में लगे एग्जिविशन में जाकर।