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विशेष: विश्व पटल पर फिर चमका शांतिनिकेतन, पांच विद्यार्थियों से शुरू हुआ था सफर
Mon, 18 Sep 2023 01:08 AM IST
गुलाम अहमद
एन. अर्जुन, कोलकाता
एन. अर्जुन, कोलकाता
Published by: गुलाम अहमद
Updated Mon, 18 Sep 2023 01:08 AM IST
सार
जन-जन तक शिक्षा को पहुंचाने के लिए रवींद्रनाथ टैगोर ने पांच विद्यार्थियों के साथ 1901 में एक स्कूल की स्थापना की, जो कालांतर में विश्व प्रसिद्ध विश्व भारती विश्वविद्यालय बना। आज इसे दुनिया शांतिनिकेतन के नाम से जानती है। यह पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के के बोलपुर के समीप है। यह स्थान आज पर्यटन स्थल बन गया है क्योंकि टैगोर ने यहां कई कालजयी साहित्यिक कृतियों का सृजन किया।
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Santiniketan
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
पश्चिम बंगाल का विश्व प्रसिद्ध शांतिनिकेतन रविवार को एक बार फिर चर्चा में आ गया। इसका कारण है, नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन को यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल करना। इस खबर से पूरे देश में खुशी का माहौल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस पर खुशी जताई है और इसे गर्व का क्षण बताया है। शांतिनिकेतन पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित है। रवींद्रनाथ टैगोर ने अपने जीवन का अधिकांश समय यहीं बिताया था। हाल ही में यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में इसे शामिल करने की सिफारिश की गई थी।
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जन-जन तक शिक्षा को पहुंचाने के लिए रवींद्रनाथ टैगोर ने पांच विद्यार्थियों के साथ 1901 में एक स्कूल की स्थापना की, जो कालांतर में विश्व प्रसिद्ध विश्व भारती विश्वविद्यालय बना। आज इसे दुनिया शांतिनिकेतन के नाम से जानती है। यह पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के के बोलपुर के समीप है। यह स्थान आज पर्यटन स्थल बन गया है क्योंकि टैगोर ने यहां कई कालजयी साहित्यिक कृतियों का सृजन किया। उनका घर ऐतिहासिक महत्व की इमारत है। विश्व भारती में हजारों विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं। शांतिनिकेतन का अर्थ होता है- शांति से भरा हुआ घर। इसके आस-पास की प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है। देश-दुनिया के पर्यटक इस जगह को घूमने जाते रहते हैं। शांतिनिकेतन सिर्फ पढ़ाई के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी कला अभिव्यक्ति के लिए भी मशहूर है। कला प्रेमियों को भी शांतिनिकेतन बहुत पसंद है क्योंकि ये जगह डांस, म्यूजिक और ड्रामा, जैसी सांस्कृतिक कलाओं का केंद्र है। तरह-तरह के भारतीय त्योहार भी यहां धूमधाम से मनाए जाते हैं। हर वर्ष होली मनाने के लिए हजारों लोग शांतिनिकेतन आते हैं।
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उल्लेखनीय है कि रवींद्ररनाथ के पिता देवेंद्रनाथ टैगोर ने वर्ष 1863 में सात एकड़ जमीन पर एक आश्रम की स्थापना की थी। भारत की पुरानी आश्रम शिक्षा पद्धति लागू है, जिसके अनुसार पेड़ के नीचे जमीन पर बैठकर पढ़ाई होती है। रवींद्रनाथ टैगोर को प्रकृति का सानिध्य काफी पसंद था।
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जिनकी दो रचनएं, दो देशों की राष्ट्रगान बनी
जोड़ासांको (ठाकुरबाड़ी), यह उत्तरी कोलकाता का एक ऐतिहासिक स्थल है, जहां रवींद्रनाथ टैगोर (ठाकुर) का पुश्तैनी घर मौजूद है। देवेंद्रनाथ टैगौर और शारदा देवी के इसी घर में 7 मई, 1861 (बंगली कैलेंडर के हिसाब से 25 वैसाख, 1268) में महान कवि, पहले भारतीय और पहले गैर-यूरोपीनय नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म हुआ था। उन्हें गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। यहीं पर आठ वर्ष की आयु में पहली बार कविता की रचना की और सोलह वर्ष की आयु में लघुकथा प्रकाशित हुई।
यहीं से शुरू हुआ था नोबेल पुरस्कार से लेकर नाइटहुड और भारत रत्न तक का सफर। और 7 अगस्त, 1941 को देश की आजादी से करीब छह वर्ष पहले उन्होंने यहीं पर आखिरी सांसें भी लीं। वे केवल विश्व विख्यात कवि ही नहीं थे, बल्कि वे दार्शनिक, रचनाकार, नाटककार, चत्रिकार, समाज सुधारक, और संगीतकार भी थे। गुरुदेव ने 50 से अधिक काव्य संग्रह और करीब 2,230 से अधिक गीत लिखे। वे बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नई जान फूंकने वाले युगदृष्टा थे। वे पहले एक मात्र ऐसे कवि हैं, जिनकी दो रचनाएं दो देशों की राष्ट्रगान बनीं- 'गन गन मन' भारत का और बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान 'आमार सोनार बांग्ला' गुरुवेद की ही रचनाएं हैं।
आइंस्टीन और मुसोलिनी से भी मिले थे रवींद्रनाथ टैगोर
वर्ष 1910 में रवींद्रनाथ टैगोर की महान कृति गीतांजलि बांग्ला में प्रकाशित हुई। इसके दो वर्ष बाद 1912 में अंग्रेजी में उनके अनुवाद ने यूरोपीय पाठकों के बीच काफी लोकप्रिय बना दिया। 1913 में गुरुदेव को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। वे पहले गैर यूरोपीय और पहले एशियाई साहित्यकार थे, जिसे प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार मिला। इसके बाद 1915 में रवींद्रनाथ टैगोर को जार्ज पंचम द्वारा 'द सर' (नाइटहुड) से सम्मानित किया गया, लेकिन टैगोर ने 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड से दुखी होकर उन्होंने यह सम्मान ब्रिटिश सरकार को लौटा दिया। 1878 से 1932 तक रवींद्रनाथ टैगोर ने पांच महाद्वीपों के 30 से अधित देशों का भ्रमण किया। इस दौरान वे दुनिया के महान कवियों, विचारकों और वैज्ञानिकों से मिले। इस दौरान वे चार्ल्स एफ एंड्रयूज, विलियम बटलर यीट्स, एजरा पाउंड, रॉबर्ट ब्रिजेस, ऑर्नेस्ट राइस, थॉमस स्टर्ज मूर, वैज्ञानिक आइंस्टीन और मुसोलिनी से भी मिले।
भारत के इस महान सपूत की उम्र अब ढलने लगी थी। 1940 में जब वे शांतिनिकेतन में ही रह रहे थे तो उनकी तबीयत बिगड़ने रहने लगी। जब तबीयत ज्यादा बिगड़ने लगी तो उनको एक विशेष ट्रेन से जोड़ासांको (ठाकुरबाड़ी) लाया गया। यहीं पर महर्षि भवन के पहली मंजिल में उनका ऑपरेशन किया गया। मां भरती के इस महान सपूत ने देश की आजादी से करीब छह वर्ष पहले 7 अगस्त, 1941 को इस धरती को अलविदा कह गया। जोड़ासांको (ठाकुरबाड़ी) में उनकी जन्म शताब्दी के अवसर पर 8 मई, 1962 को रवींद्र भारती विश्वविद्यालय की स्थापना की गई, जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू शामिल हुए थे। विश्वविद्याय की स्थापना विशेष रूप से संगीत, नृत्य और नाटक की शाखाओं में सीखने और संस्कृति की उन्नति के लिए की गई थी। जो आज सच्चे अर्थों में फलीभूत हो रही है।