UCC: मुसलमानों के इस सवाल का भाजपा के पास क्या है जवाब? मुस्लिम महिलाओं ने कही ये बात
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विस्तार
समान नागरिक संहिता (UCC) पर अलग-अलग वर्गों की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ वर्गों ने इसका खुलकर समर्थन किया है, तो कुछ ने धर्म के नाम पर इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। मुसलमानों की नाराजगी भी सामने आ गई है। मुस्लिमों के संगठन जमीयत-उलेमा-ए-हिंद ने सवाल किया है कि यदि यूसीसी से आदिवासियों को अलग रखा जा सकता है, तो मुसलमानों को क्यों नहीं? संगठन ने कहा है कि मुसलमान ऐसे किसी भी कानून को नहीं मानेंगे, जो उनकी शरीयत के खिलाफ हो। इससे लोकसभा चुनावों के ठीक पहले अप्रिय स्थिति पैदा होने की आशंका भी बढ़ गई है।
भाजपा की राष्ट्रीय प्रवक्ता शाजिया इल्मी ने अमर उजाला से कहा कि जब भी महिला अधिकारों की बात आती है, मुस्लिम धर्मगुरु इस्लाम के नाम पर उसका विरोध करने के लिए सामने आ जाते हैं। इसके पहले तीन तलाक के मुद्दे पर भी उनका यही रुख सामने आया था। उन्होंने धर्म के नाम पर इसका विरोध किया, लेकिन जब सरकार के कड़े इरादों के कारण यह कानून बन गया, तब वे इसके समर्थन में आ गए। कायदे से वे इस कुप्रथा को समाप्त कर स्वयं अपने समाज को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते थे।
शाजिया इल्मी ने कहा कि तीन तलाक की तरह ही समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर भी मुस्लिम धर्मगुरु पूरे देश से अलग रुख अपना रहे हैं। जिस समय पूरा देश समान नागरिक संहिता का स्वागत कर रहा है, कुछ मुस्लिम धर्मगुरु इसके खिलाफ जाते हुए दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि यूसीसी (UCC) कानून के आने से मुस्लिम महिलाओं को अन्य वर्गों की महिलाओं के समान अधिकार मिलेंगे। इससे मुस्लिम धर्मगुरुओं को कोई आपत्ति क्यों होनी चाहिए?
विक्टिम मोड से बाहर आएं मुसलमान
यूसीसी आने से मुस्लिम लड़कियों का विवाह भी 18 वर्ष से पहले नहीं किया जा सकेगा। अन्य वर्गों की महिलाओं की तरह अब वे भी बच्चे को गोद ले सकेंगी। अब तक वे ऐसा नहीं कर सकतीं। मुस्लिम पुरुष बहुविवाह नहीं कर सकेंगे। इससे भी मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा होगी। उन्होंने कहा कि इसमें से किसी भी कानून से किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए। क्या वे अपनी बेटियों के अधिकारों को सुरक्षित नहीं करना चाहते?
शाजिया ने कहा कि मुस्लिम धर्मगुरुओं के एक वर्ग के कारण मुसलमान हमेशा विक्टिम मोड में रहता है। वह हमेशा यही कहता है कि उसे परेशान किया जा रहा है। इसी के नाम पर वह किसी भी बदलाव को नकारता है। लेकिन अब उसे इस सोच से बाहर निकलना चाहिए और देश के विकास में अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
आदिवासी बाहर, तो मुसलमानों पर यूसीसी क्यों
यदि आदिवासियों को अलग परंपराओं के नाम पर यूसीसी से अलग रखा जा सकता है, तो मुसलमानों को क्यों नहीं? अमर उजाला के इस प्रश्न पर शाजिया इल्मी ने कहा कि आदिवासियों की तुलना मुसलमानों से नहीं की जा सकती। आदिवासियों में सैकड़ों तरह के उपवर्ग हैं और सबकी धार्मिक-सामाजिक परंपराएं अलग-अलग हैं। उन्हें किसी एक कानून के अंदर लाना संभव नहीं है, जबकि मुसलमान एक धर्म के अंदर लगभग पूरे देश-दुनिया में एक ही प्रथाओं का पालन करते हैं।
ऐसे में यदि उनके समाज में किसी प्रकार की कुरीति है, तो नए कानूनों-परंपराओं से उनमें बदलाव करना आसान है। आदिवासियों की जनसंख्या उत्तराखंड में तीन फीसदी से भी कम है, जबकि मुसलमान की लगभग 14 फीसदी आबादी है। ऐसे में यह ज्यादा आवश्यक है कि एक बड़ी आबादी को किसी कानून के अंदर लाया जाए।
आदिवासियों में महिलाओं की स्थिति कमजोर नहीं
शाजिया इल्मी ने कहा कि यह भी समझना महत्त्वपूर्ण है कि आदिवासी समाज में महिलाओं की स्थिति चिंताजनक नहीं है। आदिवासियों के कई समुदायों में महिलाएं घर की मालकिन की भूमिका में होती हैं और घर के सभी महत्त्वपूर्ण निर्णय वही करती हैं। परिवार की संपत्तियां भी उन्हीं के नाम पर होती हैं। विवाह के मामलों में भी उनकी राय बहुत महत्त्वपूर्ण होती है, जबकि मुसलमान समाज में महिलाओं की स्थिति बहुत चिंताजनक है। ऐसे में एक बेहतर कानून लाकर मुस्लिम महिलाओं की स्थिति सुधारना बेहद आवश्यक है।
यूसीसी संवैधानिक
महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था 'होप ह्यूमैनिटी सोशल वेलफेयर सोसाइटी' की चेयरमैन अंबर जैदी ने अमर उजाला से कहा कि यूसीसी लागू करना पूरी तरह संवैधानिक है। संविधान में इसे लागू करने की जिम्मेदारी सरकारों पर डाली गई है। ऐसे में यदि यूसीसी लाया जा रहा है, तो इसका विरोध करना सही नहीं है। उन्होंने कहा कि जो लोग कानून और संविधान की दुहाई देते हैं, आज वे ही इसे गलत बताकर इसका विरोध कर रहे हैं, जो किसी भी तरह से सही नहीं है।
देश के साथ आगे बढ़ें मुसलमान
यूसीसी के लिए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर चुकीं अंबर जैदी ने कहा कि शाहबानो प्रकरण और कई अन्य अवसरों पर सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को समान नागरिक संहिता लाने के लिए निर्देश दिए थे। किन्हीं कारणों से अब तक यह आदेश पूरा नहीं किया जा सका है। लेकिन आज जब यह लाया जा रहा है, तो अलग-अलग कारणों से इसका विरोध किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि देश के मुसलमानों को अपने लिए अलग कानून और अलग व्यवस्था की सोच से बाहर निकलकर सबके साथ आगे बढ़ना चाहिए।
कानून को समझने के बाद ही बनाएं राय
महिला अधिकार कार्यकर्ता और लेखिका तमन्ना इनामदार ने कहा कि सबसे बड़ी कमी यह है कि बिना पूरी बात समझे लोग अपनी राय बना लेते हैं। अपनी राय बनाने से पहले लोगों को कानून को पूरी तरह पढ़ना-समझना चाहिए। इसके बाद उन्हें सोचना चाहिए कि इसमें से कौन सी बात गलत है या किसके कारण उनका कोई नुकसान हो सकता है। यदि ऐसा नहीं है तो बिना किसी ठोस कारण के किसी बदलाव या कानून का विरोध नहीं करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सरकारों की जिम्मेदारी देश समाज को आगे बढ़ाने की भी होती है। यदि कोई कुप्रथा किसी समाज के अंदर विद्यमान है, तो इसके लिए सबको साथ लेकर उनसे बातचीत कर उसका रास्ता निकाला जाना चाहिए। बिना सबसे बात किए कोई कानून बनाने से भी लोगों में शंका पैदा होती है, इससे बचा जाना चाहिए।