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UCC: क्या शरीयत मुसलमानों का धार्मिक कानून है, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के दावे पर क्यों उठे सवाल

Thu, 06 Jul 2023 06:05 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Thu, 06 Jul 2023 06:05 PM IST
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सार
UCC: इस्लामिक मामलों के विशेषज्ञ डॉ. फैयाज अहमद फैजी ने अमर उजाला से कहा कि शरीयत अल्लाह या पैगंबर मोहम्मद साहब के द्वारा निर्मित कानून नहीं हैं। अरबी शासन व्यवस्था में विभिन्न बादशाहों-धार्मिक नेताओं ने अपने शासनकाल में सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए अनेक नियम बनाए थे। इन्हें ही बाद में शरीयत का नाम दे दिया गया...
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UCC: Is Shariat the religious law of Muslims, why questions were raised on claim of Muslim Personal Law Board
UCC: Shariat laws - फोटो : Amar Ujala/Sonu Kumar

विस्तार

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने मुसलमानों से समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) का विरोध करने की अपील की है। उसने इसे इस्लामी शरीयत कानून के विरुद्ध बताते हुए कहा है कि देश को यूसीसी की आवश्यकता नहीं है। लेकिन इस्लामी मामलों के जानकारों ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के दावे पर सवाल उठाए हैं। विशेषज्ञों ने कहा है कि शरीयत इस्लामी धार्मिक कानून नहीं हैं। ये राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए बादशाहों-खलीफाओं के द्वारा समय-समय पर निर्मित किए गए इंसानी कानून हैं, जिसमें समय-समय पर बदलाव होता रहा है। ऐसे में इसमें किसी तरह के बदलाव की बात कहकर इसके नाम पर मुसलमानों को समान नागरिक संहिता से डराना उचित नहीं है।

यह भी पढ़ें: UCC: क्या समान नागरिक संहिता पर BJP को नहीं मिलेगा आदिवासियों का साथ? कई राज्यों में उठ रहे विरोध में स्वर

इस्लामिक मामलों के विशेषज्ञ डॉ. फैयाज अहमद फैजी ने अमर उजाला से कहा कि शरीयत अल्लाह या पैगंबर मोहम्मद साहब के द्वारा निर्मित कानून नहीं हैं। अरबी शासन व्यवस्था में विभिन्न बादशाहों-धार्मिक नेताओं ने अपने शासनकाल में सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए अनेक नियम बनाए थे। इन्हें ही बाद में शरीयत का नाम दे दिया गया। बाद के शासकों ने इसमें समय-समय पर बदलाव भी किया है। ऐसे में इसे अंतिम या अपरिवर्तनीय भी नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा कि वर्तमान शरीयत कानूनों में शामिल सबसे ज्यादा नियमों को इस्लाम के 'हनफी' संप्रदाय के लोगों द्वारा बनाया गया है। लेकिन इस्लाम को मानने वालों में अनेक दूसरे संप्रदाय भी हैं। ऐसे में किसी एक संप्रदाय के द्वारा बनाए गए कानूनों को सभी संप्रदायों के मुसलमानों पर थोपना सही नहीं है।

'शरीयत की ये 'गलती' ठीक करेगा यूसीसी'

डॉ. फैजी ने कहा कि शरीयत में कई ऐसे कानून हैं, जो वर्तमान समय में महिलाओं के लिए ठीक नहीं कहे जा सकते। जैसे शरीयत में यह व्यवस्था है कि यदि किसी व्यक्ति को केवल बेटियां पैदा होती हैं, तो उसकी मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति में केवल एक चौथाई उसकी बेटियों को मिलेगा, जबकि शेष तीन चौथाई संपत्ति पर उसके चचेरे भाइयों का अधिकार होगा।

वर्तमान में कोई भी व्यक्ति यह नहीं चाहेगा कि उसकी संपत्ति उसकी मौत के बाद उसकी बेटियों को न मिलकर किसी और के पास चली जाए। यदि इस तरह का कोई विवाद सामने आता है, जिसमें एक व्यक्ति की मौत के बाद उसकी बेटियां अपने पिता की संपत्ति पर दावा करें, तो उसके चचेरे भाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं। चूंकि, इस समय देश में मुसलमानों के मामलों में शरीयत कानून लागू हैं, अदालतें भी मृत व्यक्ति की संपत्ति को मृतक की बेटियों की बजाय उसके चचेरे भाइयों को देने के लिए मजबूर होंगी।

डॉ. फैजी के अनुसार, शरीयत कानूनों के बारे में मुसलमानों के बीच भी सही जानकारी नहीं है। यदि उन्हें इसकी सही और प्रामाणिक जानकारी दी जाए तो मुसलमानों का एक बड़ा तबका स्वयं इसका विरोध करेगा। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि शरीयत के नाम पर समान नागरिक संहिता का विरोध नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि इसके माध्यम से महिलाओं को उनका सही अधिकार देने की कोशिश की जा रही है।    

'शरिया कानून में पोते को अधिकार नहीं'

शरीयत कानून में यह व्यवस्था है कि यदि कोई व्यक्ति अपने पिता के जीवित रहते मर जाता है, तो उसकी मृत्यु के बाद उसके बच्चों को दादा की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं होगा। डॉ. फैजी ने कहा कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी और बच्चों को सबसे ज्यादा आर्थिक सहायता की आवश्यकता होती है, लेकिन शरीयत कानून में ऐसे असहाय लोगों के पालन-पोषण की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। जबकि हिंदुओं के लिए लागू कानूनों में पिता, माता या दोनों की मृत्यु के बाद भी बच्चों का दादा की संपत्ति में बराबर का अधिकार सुनिश्चित है। ऐसे में इस विसंगति को दूर करना समय की आवश्यकता है।        

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड करता है अशराफ मुसलमानों का प्रतिनिधित्व

डॉ. फैयाज अहमद फैजी ने आरोप लगाया कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड केवल विदेशी मूल के उच्च वर्ण के अशराफ मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करता है। इसके 200 सबसे महत्त्वपूर्ण सदस्यों में पसमांदा मुसलमानों की भागीदारी नहीं है, जो इस देश के कुल मुसलमानों में लगभग 90 फीसदी हैं। ऐसे में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को देश के सभी मुसलमानों की ओर से कोई दावा करने का कोई अधिकार नहीं है।

उन्होंने कहा कि समान नागरिक संहिता का सबसे ज्यादा असर महिलाओं पर पड़ेगा। इससे उनकी सामाजिक परिस्थिति में बदलाव आएगा और उन्हें भी पिता और परिवार की संपत्ति में बराबर का अधिकार मिलेगा। उन्हें विकास करने का अवसर मिलेगा। लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में महिलाओं की भागीदारी न के बराबर है। ऐसे में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को महिलाओं के अधिकारों की बात करने का कोई अधिकार नहीं है।

उन्होंने कहा कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में इसके अध्यक्ष और सचिव जैसे अति महत्त्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग आजीवन अपने पदों पर बने रहते हैं। ऐसे में इसे लोकतांत्रिक संस्था नहीं कहा जा सकता है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इस तरह की संस्थाओं की कानूनी वैधता पर सवालिया निशान लगाए जा सकते हैं।

'लोकतांत्रिक देश में शरिया लागू नहीं हो सकता'

इस्लामिक कानूनों की जानकार अंबर जैदी ने अमर उजाला से कहा कि शरीयत कानून केवल उस देश में लागू किया जा सकता है, जिसका शासक मुसलमान हो और वह इस्लाम धर्म को स्वीकार करता हो। शरीयत की रचना किसी देश को इस्लामी धार्मिक कानूनों के अनुसार चलाने के लिए की गई थी। इस्लामिक व्यवस्था के अनुसार शरियत कानून किसी ऐसे लोकतांत्रिक देश में चलाना सही नहीं कहा जा सकता, जो किसी धर्म को राजकीय धर्म के रूप में स्वीकार नहीं करता। ऐसे में भारत में शरीयत कानून लागू नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन देश में मुसलमानों के सामाजिक मामलों में शरियत कानून लागू हैं, जो स्वयं शरीयत के अनुसार भी गलत हैं।

अंबर जैदी ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड दोहरी बातें करता है। वह अपराध के मामलों में देश के भारतीय दंड संहिता (इंडियन पीनल कोड) को स्वीकार करता है, लेकिन सामाजिक मामलों में शरीयत लागू करना चाहता है। उन्होंने कहा कि यदि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की नीयत साफ है, तो उसे आपराधिक मामलों में भी शरीयत की मांग करनी चाहिए।  

'आरिफ मोहम्मद खान को इन मामलों पर बोलने का अधिकार नहीं'

केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने भी शरीयत को इस्लामी धार्मिक कानून न होने की बात कही है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य और मुफ्ती अतीक बस्तवी ने अमर उजाला से कहा कि आरिफ मोहम्मद खान को ऐसे मामलों में बोलने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि शरीयत का विकास इस्लामी व्यवस्था के अनुसार ही किया गया है, ऐसे में इसे इस्लामी धार्मिक कानून से अलग करके देखना सही नहीं है।

उन्होंने कहा कि 1937 में जब देश में विभिन्न वर्गों के लिए कानून बनाने की प्रक्रिया चल रही थी, तब यह तय किया गया था कि यदि किसी मामले में दोनों पक्ष मुसलमान हों, तो न्यायाधीश उस मामले की सुनवाई शरीयत कानून के अनुसार करने के लिए बाध्य होगा। ऐसे में महिलाओं-बच्चों के पालन-पोषण के अधिकार शरीयत के अनुसार होना तय किया गया था।   

बस्तावी ने कहा कि इस्लाम में संपत्ति का बंटवारा लोगों की जिम्मेदारियों के अनुरूप किया गया है। पुरुषों की सामाजिक और आर्थिक जिम्मेदारी ज्यादा होती है, इसीलिए उसे संपत्ति के बंटवारे में प्राथमिकता दी गई है, जबकि महिलाओं की जिम्मेदारी कम होती है, इसलिए उसे संपत्ति का कम हिस्सा दिया गया है। किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति को केवल बेटियों को देने की बजाय अन्य करीबी रिश्तेदारों में बांटने को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

जहां तक दादा की संपत्ति में पोते के अधिकार की बात है, पिता की मृत्यु पर दादा उसे संपत्ति देने के लिए बाध्य नहीं है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि उसे अनाथ छोड़ दिया जाता है। उसकी जिम्मेदारी परिवार के अन्य सदस्यों को उठानी पड़ती है।

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