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कोरोना लॉकडाउन के बीच क्षय रोग के मामलों में आई कमी, जानें क्या है पूरी सच्चाई

Sun, 19 Apr 2020 03:27 PM IST
Tanuja Yadav न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Tanuja Yadav Updated Sun, 19 Apr 2020 03:27 PM IST
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tuberculosis cases drop amid coronavirus lokdown
Tuberculosis

कोरोना वायरस के खतरे के बीच स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं के प्रबंध को बनाए रखने पर जोर दिया है। इस वक्त ज्यादातर स्वास्थ्य सुविधाएं कोरोना के खिलाफ लड़ने में व्यस्त है, ऐसे में क्षय रोग एक बड़ी जनहानि के तौर पर उभर सकती है।


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क्षय रोग का आधिकारिक डाटा देने वाला निक्षय डैशबोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक 14 फरवरी से 29 फरवरी तक 1,14,460 क्षय रोग के मामले सामने आए। जिनमें से 83,697 सरकारी अस्पताल और बचे 30,763 निजी अस्पताल से आए। हालांकि कोरोना को कहर मार्च की शुरुआत में रडार पर आया था।

एक अप्रैल से 14 अप्रैल के बीच क्षय रोग के मरीजों की संख्या में अचानक गिरावट देखने को मिली। इन 14 दिनों में मरीजों की संख्या 19,145 रही जिसमें से 15,813 मामले सरकारी अस्पताल से आए। लॉकडाउन के तीन हफ्तों में क्षय रोग के मरीजों की कुल संख्या 34,566 रही। ये तब है जब सरकारी आंकड़ा कहता है कि इस बीमारी से देश में हर दिन औसतन 1400 मरीजों की मौत होती है।

क्षय रोग की अधिसूचना में तेज गिरावट को लेकर स्वास्थ्य जानकार चिंतित हैं। उनका कहना है कि मरीज को स्वास्थ्य सुविधा ना मिलने से सिर्फ संक्रमण बढ़ने का ही डर नहीं है बल्कि बड़े स्तर पर हालात और खराब हो सकते हैं। 

देश में सबसे ज्यादा क्षय रोग के मामले उत्तर प्रदेश से आते हैं। राज्य ने क्षय रोग के मरीजों को ढूंढ़ने के लिए चल रहे कैंपेन को फिलहाल स्थगित कर दिया है, ये कैंपेन 20 अप्रैल से 30 अप्रैल तक राज्य के 31 जिलों में चलना था।

क्षय रोग के अधिकारी संतोष गुप्ता ने बताया कि सभी जमीनी कार्यकर्ता कोरोना से लड़ने में जुटे हैं, सरकारी अस्पतालों में ओपीडी सेवा बंद हैं और निजी अस्पतालों भी बंद हैं। यहां तक कि जिन मरीजों में क्षय रोग के लक्षण दिखाई दे रहे हैं, उनकों भी सुविधा नहीं मिल पा रही है। इसलिए इसकी अधिसूचना को फिलहाल रोक दिया गया है। 

संतोष गुप्ता ने आगे बताया कि अभी देश में 4,75,000 सक्रिय मामले हैं। उनके लिए दवाइयों का इंतजान करना काफी कठिन काम है। अधिकारियों की ओर से यही कोशिश रहती है कि इन मरीजों के इलाज में कोई भी बाधा ना आए।

अधिसूचना क्षय रोग के इलाज के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। इसकी मदद से मरीज के पूरे इलाज का ख्याल रखा जाता है और हर महीने पांच सौ रुपये का पौष्टिक आहार दिया जाता है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2025 तक क्षय रोग को संपूर्ण तरीके से खत्म करने की प्रतिज्ञा ली है। 

डॉ मधुकर पाई का कहना है कि भारत को क्षय रोग से निपटने के लिए जल्द कुछ बड़ा एलान करना होगा। उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस के बीच भी क्षय रोग के मरीजों को इलाज की सुविधा मिलनी चाहिए और उनकी दवाई कुरियर के माध्यम से मरीजों तक पहुंचानी चाहिए।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने मंगलवार को गाइडलाइंस जारी की जिसमें इबोला के समय स्वास्थ्य सुविधाओं को पटरी पर लाने के लिए किए गए कार्यों का उल्लेख है। 2014-15 के इबोला के विश्लेषण से ये बात सामने आती है कि इबोला से मरने वालों की संख्या इतनी इसलिए बढ़ी क्योंकि खसरा, मलेरिया, एचआईवी और क्षय रोग के मरीजों ने स्वास्थ्य सुविधाओं पर असर डाला था।

बिहार के क्षय रोग अधिकारी के एन सहाय का कहना है कि 80 फीसदी स्टाफ कोविड-19 के इलाज में जुटे हैं और फिलहाल में राज्य में 1,25,000 क्षय रोग के मरीज हैं। अधिकारियों की कोशिश यही है कि मरीजों तक दवाइयां पहुंचाई जाए लेकिन ये बहुत मुश्किल काम है। 

लॉकडाउन की वजह से बिना पास के कार नहीं चल पा रही है और मरीज भी अस्पताल तक नहीं आ पा रहे हैं। 2012 से क्षय रोग की मरीजों की सूचना जारी हो रही है। पूरे विश्व में देखें तो भारत में क्षय रोग के सबसे ज्यादा मामले हैं। 

क्षय रोग को खत्म करने वाला नेशनल स्ट्रैटेजिक प्लान 2017-25 के मुताबिक भारत में क्षय रोग गंभीर समस्या रहने वाली है। क्षय रोग से सालाना औसतन 4,80,000 लोगों की मौत होती है और हर साल दस लाख मामले लापता सूची में आ जाते हैं और ज्यादातर मामलों का डायनोग्सिस ही नहीं होता। 

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