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Tripura Election 2023: BJP का यह वादा पूर्वोत्तर में लगा सकता है आग, नागालैंड-मिजोरम भी आएंगे चपेट में

Fri, 10 Feb 2023 05:22 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Fri, 10 Feb 2023 05:22 PM IST
सार

Tripura Election 2023: अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए भाजपा ने आदिवासियों के कोर एजेंडे को हवा दे दी है। उसने उन सभी क्षेत्रों में जनजातीय क्षेत्रों को स्वायत्तता देने की घोषणा कर दी है, जिनकी मांग वे लंबे समय से करते रहे हैं...

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Tripura Election 2023: BJP promised restructuring of autonomous district council to give greater autonomy
Tripura Election 2023- BJP President JP Nadda During release of BJP Sankalp Patra - फोटो : Agency

विस्तार

भाजपा ने त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के लिए अपना संकल्प पत्र जारी करते हुए राज्य के कई आदिवासी क्षेत्रों को 'स्वायत्तता' देने का वादा किया है। इससे इन क्षेत्रों को अपना प्रशासन पूरी तरह अपने हाथ में मिल जाएगा और उसमें किसी बाहरी हस्तक्षेप की संभावना नहीं रहेगी। पहली नजर में स्थानीय संस्कृति और जैव विविधता को बचाने के लिए किया गया यह वादा पूरे पूर्वोत्तर में अलगाववाद को बढ़ावा दे सकता है। नागालैंड और मिजोरम के कई विद्रोही गुट पहले ही अपने क्षेत्रों के लिए पूर्ण राज्य की मांग छोड़ते हुए स्वायत्तता की मांग पर आकर टिक गए थे। अब तक सरकार उन्हें इस तरह की अलग पहचान देने से बच रही थी, लेकिन भाजपा के इस वादे से इस पूरे क्षेत्र में इस तरह के स्वायत्त क्षेत्रों की मांग बढ़ सकती है।       

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भाजपा ने क्यों किया ये वादा

दरअसल, वर्ष 2018 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भाजपा ने वामदलों के इस मजबूत गढ़ को अकेले दम पर ढहा दिया था। उसकी इस बड़ी सफलता में सबसे बड़ी भूमिका उन आदिवासी मतदाताओं की थी, जिन्होंने दिल खोलकर पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को समर्थन दिया था। राज्य की 60 विधानसभाओं में से आदिवासियों के लिए आरक्षित 20 सीटों में से 10 पर भाजपा को और आठ सीटों पर उसके सहयोगी दल आईपीएफटी को सफलता मिली थी।

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लेकिन विधानसभा चुनाव में भाजपा का जबरदस्त समर्थन (54%) करने वाले आदिवासी मतदाताओं ने लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपेक्षाकृत कम वोट (37%) किया था। त्रिपुरा के नए राजनीतिक समीकरणों में आदिवासी मतदाताओं में और ज्यादा बिखराव हो सकता है। चूंकि इस बार त्रिपुरा के चुनावी मैदान में स्थानीय राजवंश अपने दम पर अपने भाग्य की आजमाइश कर रहा है, इन मतदाताओं में ज्यादा बिखराव होना तय माना जा रहा है। इसका सीधा नुकसान भाजपा को हो सकता है और पूर्वोत्तर पर अपनी पकड़ बनाए रखने का उसका सपना अधूरा रह सकता है।

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चूंकि आदिवासी बहुल राज्य में उनके बड़ी संख्या में समर्थन के बिना सरकार बनाना संभव नहीं है, उन्हें साधने के लिए कई स्तर पर कोशिशें की जा रही हैं। आदिवासी मतदाताओं को 'द्रौपदी मुर्मू फैक्टर' से साधने की कोशिश भी की जा रही है और उन्हें बताया जा रहा है कि भाजपा ने मुर्मू को राष्ट्रपति पद पर बैठाकर आदिवासी संस्कृति-सभ्यता का सम्मान करने का काम किया है। लेकिन अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए भाजपा ने आदिवासियों के कोर एजेंडे को हवा दे दी है। उसने उन सभी क्षेत्रों में जनजातीय क्षेत्रों को स्वायत्तता देने की घोषणा कर दी है, जिनकी मांग वे लंबे समय से करते रहे हैं।

बढ़ सकता है संकट

लेकिन राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि भाजपा का यह दांव दूसरे क्षेत्रों में राजनीतिक आग लगा सकता है। नागालैंड-मिजोरम के कई अलगाववादी गुट पहले अपने लिए अलग राज्य की मांग करते रहे थे। इस समय भी पूर्वोत्तर के कई अलगाववादी गुट केंद्र सरकार के साथ वार्ता कर अपने क्षेत्रों के लिए अलग राज्य या पूर्ण स्वायत्त क्षेत्र बनाने की मांग कर रहे हैं। भाजपा के त्रिपुरा में किए गए वादे से इस पूरे क्षेत्र में नया राजनीतिक तूफान खड़ा हो सकता है।

संवैधानिक मांग के अनुरूप

भाजपा के एक नेता ने कहा कि त्रिपुरा के लोगों को किया गया यह वादा पूरी तरह संवैधानिक और कानून के अनुरूप है। इस समय भी त्रिपुरा सहित पूर्वोत्तर के लगभग सभी राज्यों में इस तरह के स्वायत्त क्षेत्र काम कर रहे हैं। कुछ गुट अपने लिए अलग स्वायत्त क्षेत्र की मांग करते रहे हैं, जिनके विषय में तत्कालीन सरकारों ने अपने-अपने स्तर पर विचार किया है। उन्होंने कहा कि भाजपा देश के जनजातीय समूहों को उनकी मूल पहचान को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है और उनको किया गया यह वादा पूरी तरह से उसके अनुरूप है।

कितने आदिवासी

त्रिपुरा में लगभग 19 जनजातीय समुदाय रहते हैं। इनमें भील, भूटिया, चायल, चकमा, गारो, मुंडा, ओरंग और रींग प्रमुख हैं। त्रिपुरी जनजाति अकेले पूरे त्रिपुरा की लगभग आधी आबादी का हिस्सा रखती है। राज्य की 60 सीटों में से 20 सीटें आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित हैं, जिन पर भारी आबादी के कारण केवल आदिवासी मतदाता ही हार-जीत का निर्णय करते हैं। इन सीटों पर भाजपा मुर्मू फैक्टर को जमकर उछाल रही है, जो इनमें उनकी जीत की राह खोल सकते हैं। स्वायत्तता का मुद्दा इस वोट बैंक को ज्यादा मजबूती देने के लिए किया गया है।

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