तीन तलाक कुरान का हिस्सा नहीं तो कैसे बनी परंपरा : सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सवाल किया कि ‘तीन तलाक’ अगर कुरान का हिस्सा नहीं है तो यह परंपरा आखिर कैसे बन गई? इसका ईजाद कैसे हुआ? वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा कि तीन तलाक आस्था का विषय है। 637 ईसवीं से तीन तलाक प्रचलन में है। यह परंपरा 1400 वर्षों से चली आ रही है। ऐसे में इसे गैर इस्लामिक कैसे ठहराया जा सकता है।
बोर्ड की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि अगर अयोध्या भगवान राम का जन्मस्थली है और उनकी इस आस्था पर संवैधानिक नैतिकता केआधार पर सवाल नहीं उठाया जा सकता तो तीन तलाक पर सवाल क्यों उठाया जाना चाहिए। चीफ जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर पेश वरिष्ठ वकील से सवाल किया कि कुरान में तलाक का जिक्रहै लेकिन तीन तलाक का जिक्र नहीं है।
ऐसे में आखिर तीन तलाक का ईजाद कैसे हुआ? आखिर किसी ने ऐसी व्याख्या कैसे की। पीठ के सदस्य न्यायमूर्ति कूरियन जोसफ ने यह भी सवाल किया कि अगर तीन तलाक इतना ही आस्था का विषय है तो इसे निकाहनामे में क्यों नहीं शामिल किया गया? निकाहनामे में तलाक एहसन और तलाक हसन शामिल होता है। आखिर तीन तलाक को इससे क्यों अलग रखा गया। इस पर सिब्बल ने कहा कि तीन तलाक पाप है, अवांछनीय है और अनियमित है, इसलिए इसे निकाहनामे से दूर रखा गया है।
सिब्बल ने कहा कि मुस्लिम समुदाय इससे दूर होना चाहता है, लिहाजा उन्हें वक्त दिया जाए। कृपया उसे यह निर्देश न दिया जाए कि उसे कैसे सुधार लाना है। सिब्बल ने कहा, हम भी बदलाव लाना चाहते हैं। हमारा सिर्फ इतना कहना है कि इसमें बदलाव के लिए कोई और इसमें दखल या दबाव न दें।’ सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी।
छह दिनों ने हल नहीं किए जा सकते मसले
सिब्बल ने कहा कि तीन तलाक 1400 वर्षों से आस्था का हिस्सा रहा है। हिंदू भी कई परंपरा से निकलना चाहते हैं लेकिन वह परंपरा अब भी है। जवाब में न्यायमूर्ति कूरियन ने कहा, ‘होगा, लेकिन 1400 वर्षों बाद महिलाएं न्यायालय के पास आ रही हैं। इस पर सिब्बल ने कहा कि छह दिनों में इन मसलों का हल नहीं निकाला जा सकता। मालूम हो कि संविधान पीठ ने तीन तलाक पर छह दिन सुनवाई करने का निर्णय लिया है।
मौलिक अधिकार के दायरे से बाहर है शरियत
सिब्बल ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि शरियत, पर्सनल लॉ है। यह मौलिक अधिकार के दायरे से बाहर है। उन्होंने कहा मुस्लिम बहुल देशों में हिंदू को संरक्षण मिलना चाहिए, वहीं हिंदू बहुल देशों में मुस्लिम, सिख आदि अल्पसंख्यकों को संरक्षण मिलना चाहिए। हमें दूसरे धर्म की परंपरा और संस्कृति का आदर करना चाहिए। जब हिंदू कानून की बात होती है उसे संरक्षण दिया जानता है लेकिन इस्लाम की बात आने पर उसे संरक्षण नहीं मिलता।
अदालत द्वारा स्वत: संज्ञान क्यों लिया गया : सिब्बल
सिब्बल ने यह भी कहा कि रातोंरात इन मसलों का हल नहीं निकाला जा सकता। यह आंतरिक विवाद है। वर्र्षों से हम इसे मानते आ रहे हैं और परंपरा को निभा रहे हैं। साथ ही उन्होंने पीठ से कहा, ‘अगर आप इसमें दखल देते हैं तो यह कहां खत्म होगा इसकी कोई सीमा नहीं है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर हम ही क्यों? अदालत द्वारा स्वत: संज्ञान क्यों लिया गया।’
क्या ई-तलाक भी हो रहा है : सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति कूरियन से वकील कपिल सिब्बल से पूछा कि क्या ई-तलाक भी हो रहा है? मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट के पास मुस्लिम महिलाओं की ओर से शिकायत की गई है कि व्हाट्स एप और फेसबुक के जरिए पति ने उनसे तलाक लिया है। जवाब में सिब्बल ने कहा, हां व्हाट्स एप से भी तलाक हो रहा है।