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Padma Shri: पश्चिम बंगाल के दुखु माझी को पद्म श्री पुरस्कार, बंजर भूमि को 5000 से अधिक पेड़ों से किया हरा भरा
Thu, 25 Jan 2024 10:41 PM IST
आदर्श शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: आदर्श शर्मा
Updated Thu, 25 Jan 2024 10:41 PM IST
सार
पश्चिम बंगाल स्थित सिंदरी गांव के पुरुलिया निवासी 78 वर्ष आदिवासी पर्यावरणविद् दुखु माझी (गाच दादू) को पद्म श्री देने का एलान किया गया है।
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गाच दादू
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
भारत सरकार ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर गुरुवार को पद्म पुरस्कारों का एलान कर दिया है। पश्चिम बंगाल स्थित सिंदरी गांव के पुरुलिया निवासी 78 वर्ष आदिवासी पर्यावरणविद् दुखु माझी (गाच दादू) को पद्म श्री देने का एलान किया गया है। इससे पहले 23 जनवरी को सरकार ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कूर्परी ठाकुर को भारत रत्न से नवाजने का एलान किया था।
कौन हैं दुखु माझी (गाच दादू)
पुरुलिया के आदिवासी पर्यावरणविद् दुखु माझी 'गाच दादू' को यह पुरस्कार बंजर भूमि को फिर से हरा भरा बनाने के लिए विशेष योगदान के लिए दिया गया है। गाच दादू ने बंजर भूमि में तकरीबन पांच हजार से अधिक बरगद, आम और ब्लैकबैरी के पेड़ लगाए हैं। जिससे क्षेत्र की बंजर भूमि फिर से हरी भरी हो गई है। हर दिन साइकिल पर मीलों दूर जाकर उन्होंने यह कार्य किया। इसके साथ ही उन्होंने क्षेत्र के लोगों को वृक्षारोपण के बारे में जागरूक किया। आर्थिक तंगी के कारण दुखु माझी अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर सके थे। 12 साल की उम्र से ही दुखु माझी (गाच दादू) पर्यावरण के लिए लगातार काम कर रहे हैं। उन्होंने लकड़ी की तस्करी के खिलाफ अभियान चलाए और स्थानीय लोगों को पेड़ों के महत्व के बारे में जागरूक किया। गौरतलब है कि दुखु माझी को 'गाच दादू' के नाम से भी जाना जाता है।
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कौन हैं दुखु माझी (गाच दादू)
पुरुलिया के आदिवासी पर्यावरणविद् दुखु माझी 'गाच दादू' को यह पुरस्कार बंजर भूमि को फिर से हरा भरा बनाने के लिए विशेष योगदान के लिए दिया गया है। गाच दादू ने बंजर भूमि में तकरीबन पांच हजार से अधिक बरगद, आम और ब्लैकबैरी के पेड़ लगाए हैं। जिससे क्षेत्र की बंजर भूमि फिर से हरी भरी हो गई है। हर दिन साइकिल पर मीलों दूर जाकर उन्होंने यह कार्य किया। इसके साथ ही उन्होंने क्षेत्र के लोगों को वृक्षारोपण के बारे में जागरूक किया। आर्थिक तंगी के कारण दुखु माझी अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर सके थे। 12 साल की उम्र से ही दुखु माझी (गाच दादू) पर्यावरण के लिए लगातार काम कर रहे हैं। उन्होंने लकड़ी की तस्करी के खिलाफ अभियान चलाए और स्थानीय लोगों को पेड़ों के महत्व के बारे में जागरूक किया। गौरतलब है कि दुखु माझी को 'गाच दादू' के नाम से भी जाना जाता है।
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