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रोक: विकास परियोजनाओं के लिए अब ऐसे नहीं कटेंगे पेड़, सुप्रीम कोर्ट ने गठित की समिति
Fri, 26 Mar 2021 04:32 AM IST
देव कश्यप
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: देव कश्यप
Updated Fri, 26 Mar 2021 04:32 AM IST
सार
- सात सदस्यीय समिति तैयार करेगी पेड़ काटने के वैज्ञानिक दिशानिर्देश
- भारत-बांग्लादेश सीमा पर एनएच-112 के चौड़ीकरण और पांच रेलवे ओवरब्रिज (आरओबी) के निर्माण के लिए 350 पेड़ों को काटने की इजाजत राज्य सरकार ने मांगी थी।
- चार सदस्यीय समिति ने 300 पेड़ों के लिए 220 करोड़ रुपये के पर्यावरणीय मुआवजे का मूल्यांकन किया था।
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सर्वोच्च न्यायालय
- फोटो : पीटीआई
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विस्तार
अब किसी भी विकास परियोजना के लिए हरी-भरी धरती को उजाड़ देने का काम नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को सात सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया, जो विकास परियोजनाओं के लिए पेड़ काटने से जुड़े वैज्ञानिक और नीतिगत दिशानिर्देश तैयार करेगी। इन दिशानिर्देशों के आधार पर किसी भी परियोजना के लिए कटने वाले पेड़ के आर्थिक मूल्य का वास्तविक मूल्यांकन किया जा सके। अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी।
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चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी. रामासुब्रमण्यम की पीठ ने यह आदेश जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखकर पारित किया। जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार बढ़ रही चिंता से जुड़ा मुद्दा है। पीठ ने कहा कि जहां भी किसी परियोजना के लिए पेड़ काटने की आवश्यकता होती है, वहां बहस का मुद्दा यह होता है कि उस पेड़ का उचित व न्यायिक मुआवजा संबंधित प्राधिकरण या संगठन कैसे तय कर सकता है? पीठ ने कहा, इसमें शक नहीं है कि ऐसे मुआवजे का आकलन होना चाहिए और इसे परियोजना की लागत में शामिल किया जाना चाहिए। इस मुआवजे का उपयोग विशेषज्ञ तरीके से पर्यावरण की बेहतरी में होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि इस मुआवजे का उपयोग वन क्षेत्र बढ़ाने में किया जाना चाहिए।
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पीठ ने कहा है कि इसके लिए पेड़ का वास्तविक आर्थिक मूल्यांकन जरूरी है। पेड़ों का पर्यावरण में योगदान, उनसे उत्सर्जित होने वाली ऑक्सीजन और वातावरण से कार्बन डाई ऑक्साइड को हटाने की क्षमता का मूल्यांकन जरूरी है। पीठ ने कहा कि विशेषज्ञ समिति के दिशा-निर्देशों में पेड़ों की प्रजातियों को उनके पर्यावरणीय मूल्यों के आधार पर श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। इसके लिए वृक्षों की आयु और बढ़ोतरी आदि पर विचार किया जा सकता है। भौगोलिक क्षेत्र या पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्र के लिए विशेष महत्व दिया जा सकता है।
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इनको रखा गया है समिति में
सुप्रीम कोर्ट ने सात सदस्यीयसमिति की अध्यक्षता वन्यजीव विशेषज्ञ व भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एमके रंजीत सिंह झाला को सौंपी है, जबकि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के संयुक्त सचिव जिगमेट टकपा को सदस्य सचिव बनाया है। समिति के अन्य सदस्यों में भारतीय वानिकी अनुसंधान परिषद के महासचिव अरुण सिंह रावत, प्रो. संदीप तांबे, भारतीय वन्यजीव संस्थान के पूर्व निदेशक गोपाल सिंह रावत, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक डॉ. नीलांजन घोष व प्रदीप कृष्ण शामिल किए गए हैं। साथ ही पीठ ने अदालत की मदद के लिए एडवोकेट के. परमेश्वर को न्याय मित्र नियुक्त किया है।
स्वच्छ व स्वस्थ पर्यावरण है मौलिक अधिकार
पीठ ने कहा, स्वच्छ व स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। साथ ही अनुच्छेद-48ए के तहत सरकार को पर्यावरण के संरक्षण व सुधार और जंगलों व वन्यजीवों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
भारत-बांग्लादेश सीमा से जुड़ा है मुद्दा, 220 करोड़ रुपये आंकी गई थी 300 पेड़ की कीमत
दरअसल सुप्रीम कोर्ट उस याचिका की सुनवाई कर रहा था, जिसमें पश्चिम बंगाल में भारत-बांग्लादेश सीमा पर बारासात से पेतरापोल तक छह किलोमीटर लंबे क्षेत्र में एनएच-112 के चौड़ीकरण और पांच रेलवे ओवरब्रिज (आरओबी) के निर्माण के लिए 350 पेड़ों को काटने की इजाजत राज्य सरकार ने मांगी थी।
इनमें से 50 पेड़ पहले ही भारत-बांग्लादेश के बीच यातायात के लिए बेहद अहम इस राजमार्ग के चौड़ीकरण के लिए काटे जा चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से इससे पहले गठित चार सदस्यीय समिति ने शेष बचे 300 पेड़ों के लिए 220 करोड़ रुपये के पर्यावरणीय मुआवजे का मूल्यांकन किया था।