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छह साल में दिशा रवि जैसे 559 लोग देशद्रोह के आरोप में हुए गिरफ्तार, पर सजा केवल 10 को मिली

Sat, 20 Feb 2021 02:09 PM IST
सुरेंद्र जोशी जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली  
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली   Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Sat, 20 Feb 2021 02:09 PM IST
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Toolkit Case Sedition Law Misused To Terrorise Young Patriotic Indians Time To Revisit Section 124A Delhi HC Women Lawyers Forum Writes To Supreme Court
Toolkit case - फोटो : अमर उजाला

टूलकिट केस में गिरफ्तार लोगों पर दिल्ली पुलिस ने देशद्रोह की धाराएं लगाई हैं। इस केस में कितना दम है, ये तो कोर्ट ही तय करेगी, लेकिन ऐसे मामलों में अब तक सजा की दर बहुत अच्छी नहीं रही है, इसलिए सवाल उठ रहे हैं।  वर्ष 2019 की बात करें तो ऐसे केसों में दोषसिद्धि दर महज 3.3 प्रतिशत रही थी।

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खास बात ये है कि पिछले चार-पांच वर्षों के दौरान देशद्रोह या राजद्रोह के केसों की संख्या बढ़ती जा रही है। 2014 में देशद्रोह के 47 केस दर्ज हुए थे, वहीं 2018 में यह आंकड़ा 70 पर पहुंच गया, जबकि 2019 में ऐसे केसों की संख्या 93 रही है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और साइबर मामलों के एक्सपर्ट पवन दुग्गल बताते हैं, ऐसे मामलों में इलेक्ट्रॉनिक सबूत जुटाने होते हैं।  कई बार जल्दबाजी में केस तो दर्ज हो जाता है, मगर बाद में उसे अंजाम तक पहुंचाने की राह मुश्किल होती है।कोर्ट के समक्ष आरोप साबित नहीं हो पाते हैं तो केस खत्म हो जाएगा। टूलकिट केस में जांच एजेंसियों को इसका इस्तेमाल देखना होगा। ये बहुत संभलकर रखे जाने वाला कदम है।

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उम्र कैद का है प्रावधान

बता दें कि ऐसे मामले में दोष सिद्ध होने पर अपराधी को उम्र कैद तक हो सकती है। दिल्ली पुलिस ने टूलकिट मामले में आईपीसी की धारा 124 ए, 153ए, 153 और 120 बी के तहत एफआईआर दर्ज की है। धारा 124ए में 3 साल से लेकर उम्र कैद तक की सजा का प्रावधान है।इसके अलावा जुर्माना भी लगाया जा सकता है। आईपीसी की धारा 153 ए के अंतर्गत तीन साल और धारा 153 के तहत एक साल तक की सजा और आर्थिक दंड दिया जा सकता है। 


राज्य के खिलाफ अपराध 

इस श्रेणी में यूएपीए के तहत दायर मामलों में, संपत्ति अधिनियम, ओएसए को नुकसान पहुंचाना और आईपीसी धारा 124 ए (राजद्रोह) व 121 (युद्ध छेड़ना या राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने का प्रयास) के तहत दर्ज केस शामिल होते हैं। इन्हीं में भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने के इरादे से हथियार एकत्रित करना भी शामिल होता है।

यह धारा 122 के अंतर्गत रहता है। भारतीय दंड संहिता की धारा 123 के अनुसार, जो कोई भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करने की परिकल्पना के अस्तित्वों को, जो ऐसे युद्ध करने को सुगम बनाने के आशय से इस प्रकार छिपाए, या यह सम्भाव्य जानते हुए कि इस प्रकार छिपाकर ऐसे युद्ध करने को सुगम बनाए, किसी कार्य, या किसी अवैध लोप द्वारा छिपाना आदि शामिल रहता है। धारा 153 बी में राष्ट्रीय अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले लांछन लगाने का आरोप साबित होता है तो तीन साल तक की सजा हो सकती है।

86 मामलों की जांच, 16 में मुकदमा, एक में दोष सिद्ध

साल 2016 में देशद्रोह के 35 केस दर्ज हुए थे। हालांकि पिछले वर्षों के मामलों को मिलाकर कुल 86 केसों की जांच की गई। इनमें से 16 ट्रायल के लिए गए। एक मामले में दोष सिद्ध हो सका। इसी तरह 2017 में 51 केस दर्ज हुए तो वहीं पिछले मामलों सहित 156 केसों की पड़ताल हुई। इनमें से 27 केस ट्रायल तक पहुंचे और एक मामले में दोष सिद्ध हो सका।

साल 2018 की बात करें तो देशद्रोह के 70 केस सामने आए थे। कुल 190 केसों की जांच करने के बाद 38 केसों में ट्रायल किया गया और दो मामलों में दोष सिद्ध हुआ। साल 2019 में केवल दो लोगों को देशद्रोह का दोषी ठहराया गया था, जबकि 29 को बरी कर दिया गया था। यूएपीए के तहत, 34 दोषी थे, लेकिन 16 लोगों को डिस्चार्ज कर दिया गया। बाकी के 92 लोगों को बरी करने के आदेश जारी हुए। साल 2018 में 124ए के तहत 56 लोग और 2019 में 96 आरोपियों को गिरफ़्तार किया गया।
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एजेंसियां चाहें तो बढ़ा सकती हैं दोष सिद्धि दर : दुग्गल

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता पवन दुग्गल के अनुसार, जांच एजेंसियां यदि चाहें तो केस की सिद्धि दर दर बढ़ सकती है। टूलकिट को जिन लोगों ने संपादित किया है, उनकी जानकारी आसानी से मिल जाएगी। इसके लिए गूगल से संपर्क करना होगा। वजह, गूगल तो सभी डॉक्यूमेंट को एड्रेस करता है। ये अलग बात है कि कुछ लोग गूगल पर सही अकाउंट नहीं बनाते। यानी फर्जी नाम से अकाउंट बना लेते हैं। पुलिस चाहे तो ऐसे सभी लोगों को एड्रेस कर सकती है। जांच एजेंसी को देखना होगा कि टूलकिट का किस तरह से और किस दिशा में दुरुपयोग हुआ है। यहां पर जांच एजेंसी अगर गैर कानूनी और कानूनी दायरे को ठीक से समझ कर आगे बढ़ेगी तो केस भी अपने अंजाम तक पहुंच जाएगा।

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