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जनजातीय इलाकों के बच्चों को शिक्षित करने के लिए सरकार अपना रही ये तरीके

Mon, 12 Mar 2018 04:53 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Updated Mon, 12 Mar 2018 04:53 PM IST
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to educate childrens and remove unemployment in tribal areas, these tricks are using by government

अट्टाप्पडी से करीब 150 किलोमीटर दूर पल्लकड़ में बीते महीने भीड़ द्वारा एक आदिवासी व्यक्ति को मार दिया गया। भीड़ ने उसे खाना चुराने का दोषी माना। यहां आदिवासी लोगों की हालत ज्यादा अच्छी नहीं है। ना ही वह शिक्षित हैं और ना ही उनके पास रोजगार है। सरकार द्वार ऐसे इलाकों का विकास करने के लिए एक योजना की शुरूआत की गई है। राजन नामक व्यक्ति नई सरकार द्वारा शुरू की गई बंधु योजना के अंतर्गत कार्य करता है। यहां विद्यालय छोड़ने वाले छात्रों की संख्या अधिक है। इस बढ़ती दर को रोकने के लिए इस योजना की शुरुआत की गई। साथ ही अनुसूचित जनजाति के लोगों की बेरोजगारी को कम करने के लिए भी इस योजना को शुरू किया गया। 

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इस योजना की शुरूआत करीब 9 महीने पहले की गई थी। इसमें यह तय किया गया कि एक गोधरा बंधु या गोधरा मेंटर (उपदेशक) को सरकारी विद्यालयों में भेजा जाए। यहां करीब 241 सरकारी विद्यालय हैं। इसके साथ ही वयानद जिले के स्कूलों को भी इससे सहायता पहुंचेगी जहां अनुसूचित जनजाति की संख्या 18.5 फीसदी है। जो कि करेल में सबसे अधिक है। 
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उपदेशकों को जिले के अंदर से ही चुना गया है। यह कक्षा एक के छात्रों और अध्यापकों के बीच भाषा अवरोध के अंतर को कम करने का काम करते हैं। साथ ही इस बात का भी ख्याल रखते हैं कि छात्र विद्यालयों तक मुफ्त वाहनों से पहुंचें, यह सहायता छात्रों को सरकार द्वारा प्रदान की गई है। राजन के अनुसार यहां के लोग गोधरा भाषा (नान्कु माथ) में बात करते हैं। जिसे बाहरी लोग समझ नहीं पाते हैं। कक्षा एक के छात्र को दूसरे समुदाय से आए अध्यापकों की भाषा समझने में संघर्ष का सामना करना पड़ता है। दूसरे समुदाय से आए अध्यापकों का भी यही कहना है कि उन्हें भी भाषा से संबंधित परेशानी होती है। राजन के अनुसार एक उपदेशक के तौर पर उसे अध्यापकों और छात्रों की मदद करनी होती है। राजन काठुनाइका जनजाति का सदस्य है और कक्षा एक के 27 में से 21 आदिवासी छात्रों का उपदेशक भी है। 
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29 साल के राजन का कहना है कि एक आदिवासी युवा होने के नाते वह कक्षा में अलगाव की भावना को समाप्त करने में भी मदद करता है। राजन ने 12 वीं करने के बाद 2011 में टीचर ट्रेनिंग सर्टिफिकेट प्राप्त किया। इस स्कीम के तहत उपदेशकों को रोजाना 750 रुपये दिए जाते हैं। यानि महीने में करीब 15,000-17,000 के बीच रुपये दिए जाते हैं। यह योजना जून में सर्व शिक्षा अभियान के तहत आदिवासी विकास विभाग और राज्य शिक्षा विभाग द्वारा शुरू की गई थी। इसके बाद उपदेशकों के लिए एप्लीकेशन फॉर्म भी निकाले गए, जिनमें से चुने हुए लोगों को सर्व शिक्षा अभियान के तहत तीन दिनों का प्रर्शिक्षण भी दिया गया। 

सर्व सिक्षा अभियान के जिला योजना अधिकारी जीएन बीबूराज का कहना है कि उन्हें करीब 500 आदिवासी लोगों के फॉर्म मिले। वह हैरान थे यह देखकर कि आदिवासी इलाकों में इतने ज्यादा पढ़े लिखे बेरोजगार युवा हैं। उनके अनुसार यहां अधिक संख्या में छात्र विद्यालय छोड़ते हैं और बेरोजगार युवाओं की संख्या भी अधिक है। उन्होंने आगे कहा कि उन्हें एक आदिवासी युवक ने बताया कि उसने नौकरी के लिए पांच बार साक्षात्कार दिया। लेकिन उसके बाद भी उसे नौकरी नहीं मिली। उसके अनुसार राज्य में अनुसूचित जनजाति के लिए 1.5 फीसदी और अनुसूचित जनजाति के लिए 2 फीसदी ही आरक्षण है। जो कि वयानाद के लोगों के लिए बहुत कम है। यहां बहुत से लोगों ने टीचर ट्रेनिंग का कोर्स किया है पर फिर भी उन्हें नौकरी नहीं मिल रही है। 


राजन की कक्षा में मौजूद अध्यापिका का कहना है कि इस योजना से आदिवासी लोगों की मानसिकता में बदलाव आ रहा है। राजन भी बच्चों के माता पिता को प्रोत्साहित करता है कि वह अपने बच्चों को विद्यालय भेजें। कॉफी और काली मिर्च की खेती के दौरान भी लोग अपने बच्चों को खेतों में साथ ले जाते हैं। इस योजना से यह फायदा मिलता है कि उपदेशक बच्चों को विद्यालय तक आसानी से ले आते हैं।

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