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TMC: संगठन पर ममता बनर्जी की पकड़ ने गड़बड़ाए बागियों के समीकरण, क्यों 'दीदी' का दावा हुआ मजबूत?
सार
तृणमूल कांग्रेस में जारी अंदरूनी संघर्ष के बीच पार्टी संगठन पर ममता बनर्जी की मजबूत पकड़ ने बागी खेमे के लिए मूल पार्टी पर दावा करना मुश्किल बना दिया है। बागी सांसदों द्वारा अलग राजनीतिक मंच का सहारा लेने से उनकी रणनीति और बागी विधायकों की राह अलग-अलग दिखाई दे रही है। हालांकि विधानसभा में बागी विधायकों की संख्या अधिक बताई जा रही है, लेकिन संगठनात्मक ढांचे में ममता समर्थकों का प्रभाव अभी भी निर्णायक माना जा रहा है।
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टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/ANI
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विस्तार
पार्टी संगठन पर तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी की मजबूत पकड़ ने फिलहाल खुद को मूल पार्टी साबित करने की बागियों की जंग को बहुत पीछे धकेल दिया है। खासतौर से बागी सांसदों का अंजान सी पार्टी नेशनल सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय ने बागी विधायकों के एकनाथ शिंदे और अजीत पवार की तर्ज पर मूल पार्टी पर कब्जे की उम्मीद को फिलहाल धूमिल कर दिया है।
इसके अलावा भावी रणनीति को लेकर बागी विधायकों और बागी सांसदों की अलग-अलग राह ने भी पार्टी को बचाने की जंग लड़ रहीं ममता के लिए राहत की उम्मीदें बचाए रखी हैं। पार्टी संगठन में ममता दबदबे के कारण ही बागी सांसदों ने न सिर्फ मूल पार्टी के दावे से फिलहाल खुद को दूर रखा, बल्कि अयोग्यता की तलवार से बचने के लिए एक बेहद अपरिचित पार्टी में विलय का रास्ता अपनाया।
दरअसल पार्टी पर दावे के संदर्भ में चुनाव आयोग और अदालतें अलग-अलग पक्ष में शामिल सांसदों-विधायकों की संख्या ही नहीं देखते, बल्कि पार्टी के संगठनात्मक ढांचे का भी संज्ञान लेती है। मसलन पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी, राज्य इकाइयों और जिला अध्यक्षों में कितने किस गुट के साथ हैं इसका भी परीक्षण करते हैं।
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कमजोर पड़ी बागी विधायकों की चाल
राज्य विधानसभा में तृणमूल के 80 में से 64 विधायक बागी धड़े के साथ हैं। इसी आधार पर नेता प्रतिपक्ष का पद हासिल करने के बाद विरोधी धड़े ने मूल पार्टी पर अपना दावा जताया है। हालांकि बागी सांसदों के बागी विधायकों के साथ जाने के बदले एनसीपीआई में विलय से मामला उलझ गया है। अब बागी सांसदों के समर्थन के अभाव में बागी विधायकों का धड़ा मूल पार्टी पर अपना दावा नहीं जता सकता। वैसे भी पार्टी संगठन में अब भी ममता का दबदबा कायम है।
अब क्या है रास्ता?
मूल पार्टी पर अधिकार के लिए बागी विधायकों को भी बागी सांसदों के साथ एनसीपीआई मेंं विलय करना होगा। इसके अलावा बागी सांसदों-विधायकों को मूल पार्टी के संगठन में भी स्थिति मजबूत करनी होगी। बागी सांसद सुदीप बंदोपाध्याय ने इशारा किया है कि संसद के मानसून सत्र के पहले दोनों धड़ा मिल कर मूल पार्टी पर दावा करने की रणनीति तैयार कर रहे हैं।
असमंजस की स्थिति
बागी विधायक धड़ा भी अगर एनसीपीआई में विलय करता है तो अजीब सी स्थिति पैदा होगी। तब राज्य में यह भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी होगी और केंद्र में भाजपा के साथ होगी। मूल पार्टी का अधिकार मिलने पर भी यही स्थिति रहेगी। वैसे भी भाजपा की राज्य इकाई विरोधी धड़े के परोक्ष या सीधे गठजोर से बेहद नाराज है, ऐसे में नेतृत्व की चिंता केंद्रीय मंत्रिमंडल में बागी धड़े को शामिल करने को ले कर है।
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इसके अलावा भावी रणनीति को लेकर बागी विधायकों और बागी सांसदों की अलग-अलग राह ने भी पार्टी को बचाने की जंग लड़ रहीं ममता के लिए राहत की उम्मीदें बचाए रखी हैं। पार्टी संगठन में ममता दबदबे के कारण ही बागी सांसदों ने न सिर्फ मूल पार्टी के दावे से फिलहाल खुद को दूर रखा, बल्कि अयोग्यता की तलवार से बचने के लिए एक बेहद अपरिचित पार्टी में विलय का रास्ता अपनाया।
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दरअसल पार्टी पर दावे के संदर्भ में चुनाव आयोग और अदालतें अलग-अलग पक्ष में शामिल सांसदों-विधायकों की संख्या ही नहीं देखते, बल्कि पार्टी के संगठनात्मक ढांचे का भी संज्ञान लेती है। मसलन पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी, राज्य इकाइयों और जिला अध्यक्षों में कितने किस गुट के साथ हैं इसका भी परीक्षण करते हैं।
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कमजोर पड़ी बागी विधायकों की चाल
राज्य विधानसभा में तृणमूल के 80 में से 64 विधायक बागी धड़े के साथ हैं। इसी आधार पर नेता प्रतिपक्ष का पद हासिल करने के बाद विरोधी धड़े ने मूल पार्टी पर अपना दावा जताया है। हालांकि बागी सांसदों के बागी विधायकों के साथ जाने के बदले एनसीपीआई में विलय से मामला उलझ गया है। अब बागी सांसदों के समर्थन के अभाव में बागी विधायकों का धड़ा मूल पार्टी पर अपना दावा नहीं जता सकता। वैसे भी पार्टी संगठन में अब भी ममता का दबदबा कायम है।
अब क्या है रास्ता?
मूल पार्टी पर अधिकार के लिए बागी विधायकों को भी बागी सांसदों के साथ एनसीपीआई मेंं विलय करना होगा। इसके अलावा बागी सांसदों-विधायकों को मूल पार्टी के संगठन में भी स्थिति मजबूत करनी होगी। बागी सांसद सुदीप बंदोपाध्याय ने इशारा किया है कि संसद के मानसून सत्र के पहले दोनों धड़ा मिल कर मूल पार्टी पर दावा करने की रणनीति तैयार कर रहे हैं।
असमंजस की स्थिति
बागी विधायक धड़ा भी अगर एनसीपीआई में विलय करता है तो अजीब सी स्थिति पैदा होगी। तब राज्य में यह भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी होगी और केंद्र में भाजपा के साथ होगी। मूल पार्टी का अधिकार मिलने पर भी यही स्थिति रहेगी। वैसे भी भाजपा की राज्य इकाई विरोधी धड़े के परोक्ष या सीधे गठजोर से बेहद नाराज है, ऐसे में नेतृत्व की चिंता केंद्रीय मंत्रिमंडल में बागी धड़े को शामिल करने को ले कर है।