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प्लास्टिक कचरे से बनेंगे टाइल्स, चार कंपनियों ने राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला से खरीदी तकनीक
Mon, 17 Dec 2018 04:34 AM IST
आसिम खान
पीयूष पांडेय, अमर उजाला, नई दिल्ली
पीयूष पांडेय, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: आसिम खान
Updated Mon, 17 Dec 2018 04:34 AM IST
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प्लास्टिक कचरे के निपटारे के लिए राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला ने अनोखी तरकीब का इस्तेमाल किया है। उसने पर्यावरण के लिए नुकसानदायक कचरे से टाइल्स निर्मित करने की तकनीक विकसित की है। इस तकनीक को चार कंपनियां खरीद चुकी हैं और वह जल्द आम जनता के लिए प्लास्टिक के टाइल्स बिक्री करने की तैयारी में हैं। इनमें एक कंपनी नोएडा और दूसरी चंडीगढ़ में हैं।
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भारत में प्लास्टिक उद्योग 1,10,000 करोड़ रुपये का है। हर साल 1.3 करोड़ टन प्लास्टिक यहां इस्तेमाल होता है, जबकि 90 लाख टन प्लास्टिक कचरे के रूप में निकलता है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की एक रिपोर्ट के मुताबिक ज्यादातर प्लास्टिक का सामान एक बार इस्तेमाल के बाद फेंक देने के लिए बनाया जाता है। इस वजह से न सिर्फ अगले 10 से 15 साल में प्लास्टिक का उत्पादन और भी तेजी से बढ़ेगा, बल्कि कचरे की मात्रा भी खतरनाक स्तर पर पहुंचेगी। सर्वाधिक कचरा एशिया में बनता है।
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एक करोड़ में लगता है टाइल्स बनाने का सेटअप
सीएसआईआरए राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला के निदेशक दिनेश असवाल ने कहा कि प्लास्टिक कचरे से निपटना बहुत जरूरी है। चूंकि हरेक प्लास्टिक कचरे का प्रबंधन नहीं हो सकता। ऐसे में उसे दोबारा प्रयोग में लाया जा सकता है, जिसके लिए हमारी प्रयोगशाला ने मशीन तैयार की जा रही है। इस मशीन की कीमत महज 18 लाख रुपये है, जिसे अहमदाबाद, चंडीगढ़, नोएडा और वाईजैक समेत चार शहरों में कंपनियों ने खरीदा और सेटअप लगाने जा रही हैं।
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उन्होंने बताया कि इस मशीन के जरिए प्लास्टिक कचरे का निपटारा कर टाइल्स बनाने का सेटअप लगाने में अधिकतम एक करोड़ रुपये तक लगता है। प्रयोग के तौर पर प्रयोगशाला के बाहर फुटपाथ पर प्लास्टिक के टाइल्स लगाए गए थे, जो पत्थर के सामान्य टाइल्स की तुलना में सस्ते और ज्यादा मजबूत हैं। चार कंपनियों द्वारा इस तकनीक को खरीदे जाने के बाद लगातार कंपनियां हमसे संपर्क कर रही हैं।
चंडीगढ़ में शुरू हुआ काम
असवाल ने कहा कि चंडीगढ़ से चार युवाओं ने मशीन खरीदकर कारोबार शुरू किया है। उनके मुताबिक चंडीगढ़ में 54 टन प्लास्टिक कचरा निकलता है, जिसके प्रयोग से वह टाइल्स बनाएंगे। उम्मीद है कि यह एक बेहतर हल होगा, जिससे देश में होने वाले प्लास्टिक कचरे में कमी आएगी। याद रहे कि प्लास्टिक के निपटारे को इससे पैदा होने वाले खतरे से निपटने के लिए अहम कदम माना जाता है। लेकिन अभी तक दुनियाभर में पैदा हुए 90 अरब टन कचरे का केवल नौ फीसदी ही निपटारा हो सका है।
गलने में लगते हैं कई सौ साल
पर्यावरण में मौजूद प्लास्टिक गलने में कई सौ साल लगते हैं। मौजूदा चलन अगर जारी रहा तो साल 2050 तक 12 अरब टन कचरा जमा हो जाएगा। एक बार इस्तेमाल वाली प्लास्टिक की चीजें जिनसे सबसे कचरा बनता है, जो गलता नहीं और पर्यावरण में रह जाता है, उनमें सिगरेट के हिस्से, प्लास्टिक की पानी की बोतलें, बोतलों के ढक्कन, रैपर, बैग्स, स्ट्रॉ, टेक-अवे कंटेनर शामिल हैं। ये सब सामान न सिर्फ जानवरों के लिए जानलेवा साबित होते हैं, बल्कि बड़ी मात्रा में जमा होकर पानी के स्रोतों को जाम कर यह बाढ़ जैसी स्थिति को भयावह बनाते हैं।
प्लास्टिक जलाना सबसे खतरनाक
माइक्रोप्लास्टिक फूड-चेन के जरिये हमारे खाने में शामिल होकर हमारे लिए सीधे तौर पर खतरा बन सकते हैं। इसके अलावा प्लास्टिक को बनाने में इस्तेमाल हुए केमिकल्स भी हमारे खाने के जरिये हमारे फेफड़ों, नर्वस सिस्टम और रिप्रोडक्टिव सिस्टम में पहुंचकर खतरनाक साबित हो सकते हैं। गौरतलब है कि कई बार प्लास्टिक के कचरे से निपटने के लिए उसे जला दिया जाता है जो कि सबसे हानिकारक है। उससे निकलने वाली गैसें न सिर्फ पर्यावरण को बल्कि हमारे शरीर को भी भारी नुकसान पहुंचाती हैं।