लॉकडाउन: मोदी सरकार का वह 'डर' जिसके चलते इस बार भाजपा को माननी पड़ी कांग्रेस की सलाह
पूर्व पीएम डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा दो दिन पहले लिए गए पत्र ने केंद्र सरकार को बचाव की मुद्रा में ला दिया था। उन्होंने अपने पत्र में कई ऐसे सवाल खड़े किए, जिससे केंद्र सरकार को तुरंत कई कदमों की घोषणा करनी पड़ी...
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कोरोना काल की राजनीति भी नए दौर से गुजर रही है। इस बार ऐसा क्या हो गया कि केंद्र सरकार ने 'लॉकडाउन' से खुद को अलग कर लिया। पिछले साल केंद्र सरकार को अपने उस फैसले के लिए चौतरफा आलोचना झेलनी पड़ी थी, जिसके तहत राज्यों की सलाह लिए बिना ही देश में लॉकडाउन लागू कर दिया गया। अब वैसा कुछ नहीं हो रहा है।
जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर और राजनीतिक मामलों के जानकार डॉ. आनंद कुमार कहते हैं, गत वर्ष का अनुभव तो यही कहता है कि मोदी सरकार इस बार लॉकडाउन को लेकर 'छूआ-छात' के आरोपों से बच रही है। राज्य अपनी सुविधा अनुसार लॉकडाउन लगा रहे हैं। इसके पीछे पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव भी एक अहम वजह है।
दूसरा कारण, कांग्रेस पार्टी के नेताओं द्वारा लगातार सरकार को 'कोरोना' के मामले में सचेत करते रहना है। पूर्व पीएम डॉ. मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने कोविड-19 से जुड़े कई मुद्दों पर सरकार को आगाह किया है। 'कोरोना' जो सत्तापक्ष या विपक्ष में भेद नहीं करता, भाजपा को इस डर का मतलब समझ आ रहा है।
लॉकडाउन: पिछला अनुभव और कांग्रेस के सवाल ...
पिछले साल कोरोना संक्रमण के दौरान केंद्र सरकार ने ज्यादातर फैसले खुद लिए थे। इसके लिए विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार और भाजपा की कड़ी आलोचना की थी। कांग्रेस पार्टी के मुताबिक, भाजपा ने लॉकडाउन जैसा बड़ा कदम उठाने से पहले विपक्ष या राज्य सरकारों से विचार विमर्श करना जरूरी नहीं समझा। राहुल गांधी, इस मुद्दे पर सरकार को लगातार घेरते रहे। उन्होंने लॉकडाउन में बेरोजगारी और अर्थव्यवस्था से जुड़े कई मुद्दे उठाए। इस बार भी उन्होंने मोदी सरकार को पत्र लिखा।
पूर्व पीएम डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा दो दिन पहले लिए गए पत्र ने केंद्र सरकार को बचाव की मुद्रा में ला दिया था। उन्होंने अपने पत्र में कई ऐसे सवाल खड़े किए, जिससे केंद्र सरकार को तुरंत कई कदमों की घोषणा करनी पड़ी। सोमवार को केंद्र ने घोषणा कर दी कि 18 साल तक की आयु वालों को कोरोना वैक्सीन लगेगी। डॉ. मनमोहन सिंह ने सुझाव दिया था कि विदेश में मौजूद इस वैक्सीन को अगर प्राधिकृत संस्था से मंजूरी मिली है तो वहां से उसका आयात किया जाए। हालांकि स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने कहा, इस बाबत केंद्र सरकार पहले ही निर्णय ले चुकी है। ये सब ऐसी बातें रही, जिन्होंने मोदी सरकार को इस बार लॉकडाउन पर संभल कर चलने के लिए बाध्य कर दिया।
ये कोरोना है, वह सत्ता या विपक्ष को नहीं पहचानता
डॉ. आनंद कहते हैं, यह राष्ट्रीय आपदा का समय है। गत वर्ष भी ऐसे ही हालात रहे, लेकिन इस बार वायरस कहीं ज्यादा खतरनाक है। युवा भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। अगर राजनीति से परे हट कर देखा जाए तो कांग्रेस पार्टी ने कई बार सरकार को सार्थक सुझाव दिए हैं। सोनिया गांधी ने कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में उन सुझावों का जिक्र किया हो या राहुल गांधी के पत्र में उन बातों का उल्लेख रहा, इन सभी तथ्यों ने केंद्र को सोचने एवं कुछ फैसले लेने पर मजबूर किया है।
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने बहुत ही शालीनता से पीएम मोदी के समक्ष पांच सवाल रखे थे। इन सभी ने एक सवाल पर अधिक जोर दिया था। वह राज्यों को लेकर था। कांग्रेस पार्टी को यह शिकायत रही है कि पिछली बार लॉकडाउन या दूसरे फैसलों को लेकर केंद्र ने राज्यों की उपेक्षा की है। इस बार केंद्र की भाजपा सरकार ने लॉकडाउन को लेकर खुद को पीछे कर लिया। कोरोना संक्रमण की स्थिति के मद्देनजर, राज्य अपने अपने तरीके से लॉकडाउन लगा रहे हैं।
भाजपा ने अपने पक्ष में कर रखी है बाजी
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पिछले सप्ताह तक भाजपा और इसके नेता कोरोना की परवाह किए बिना चुनाव प्रचार में जुटे हुए थे। जब सोशल मीडिया में शमशान घाट और रैलियों के फोटो एक साथ वायरल होने लगे तो भाजपा पर नैतिक दबाव बढ़ गया। हालांकि लॉकडाउन के मामले में केंद्र सरकार ने जो फैसला लिया है, उसे कांग्रेस पार्टी के लिए संजीवनी बताया जा रहा है। कांग्रेसी नेता दावा करते हैं कि ये सारे सुझाव उनके नेता लंबे समय से मोदी सरकार को देते रहे हैं।
दूसरी तरफ, इसमें भाजपा का अपना स्वार्थ भी रहा है। वह पिछले साल के उस दाग को धोना चाहती है, जिसमें उसे 'सहकारी संघवाद' को तोड़ने का प्रयास करने जैसे आरोपों का सामना करना पड़ा है। इसके अलावा पांच राज्यों में चुनाव प्रचार और उसके नतीजों ने भी केंद्र सरकार को 'लॉकडाउन' से दूर रहने को मजबूर कर दिया। साथ ही उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव हो रहे हैं। बिहार में भी इन चुनावों की प्रक्रिया शुरू हो रही है। कोरोना संक्रमण के दौरान ही कई राज्यों में विधानसभा उपचुनाव और दो लोकसभा सीटों पर भी उपचुनाव हुए हैं।
इन चुनावों के नतीजे दो मई को आने हैं। ऐसे में केंद्र सरकार ने राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन से खुद को दूर ही रखा है। यहां खास बात यह है कि असल बाजी तो भाजपा ने अपने पक्ष में ही कर रखी है। अगर राज्यों में लॉकडाउन फेल हुआ तो भाजपा उसे अपने पक्ष में भुना सकती है। पार्टी नेता कह सकते हैं कि हमने तो राज्यों को पूरी छूट दी थी। दूसरा, ऐसी स्थिति में केंद्र यह भी कह सकता है कि पिछली बार केंद्र सरकार ने अपने तरीक़े से लॉकडाउन लगाकर कोरोना के मामलों पर काबू पाने का प्रयास किया था।