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तिरुप्परनकुंद्रम दीप प्रज्वलन मामला: सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने की आशंका बेबुनियाद, हाईकोर्ट में वकील का तर्क

Wed, 17 Dec 2025 07:19 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मदुरै
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मदुरै Published by: पवन पांडेय Updated Wed, 17 Dec 2025 07:19 PM IST
सार

Thirupparankundram Lamp ,Lighting case: मद्रास हाईकोर्ट में इस संवेदनशील मामले की सुनवाई जारी है, जिसमें धार्मिक परंपरा, सांस्कृतिक अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन को लेकर अहम सवाल उठ रहे हैं।

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Thirupparankundram lamp lighting case: Concern of public disorder non-existent, advocate tells HC
मद्रास हाईकोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित दरगाह के पास एक पत्थर के स्तंभ पर कार्तिगाई दीपम के अवसर पर दीप जलाने से सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने की आशंका को लेकर जिला प्रशासन ने जो चिंता जताई है, वह पूरी तरह काल्पनिक और बेबुनियाद है। यह तर्क वरिष्ठ अधिवक्ता एस. श्रीराम ने बुधवार को मद्रास हाईकोर्ट के समक्ष रखा। उन्होंने कहा कि यह आशंका तमिल संस्कृति और परंपराओं को रोकने के उद्देश्य से दिखाई जा रही है। श्रीराम उन भक्तों की ओर से दलीलें रख रहे थे, जो एकल न्यायाधीश के उस आदेश के खिलाफ दायर अपीलों का विरोध कर रहे हैं, जिसमें कार्तिगै दीपम के दिन दीप जलाने की अनुमति दी गई थी।
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राज्य की अनिच्छा पर सवाल
अधिवक्ता श्रीराम ने कहा कि जब राज्य स्वयं लोगों के धार्मिक अधिकारों को लागू करने के लिए तैयार नहीं है, तब जनता को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत का सहारा लेने का पूरा हक है। मामले की सुनवाई कर रही खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जी. जयचंद्रन और न्यायमूर्ति केके. रामकृष्णन शामिल हैं, ने पूछा कि क्या भक्त इस मामले में किसी समझौते के लिए तैयार हैं। इस पर श्रीराम ने साफ कहा कि वे किसी बातचीत या समझौते के पक्ष में नहीं हैं।
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सार्वजनिक व्यवस्था का तर्क बहाना
श्रीराम ने दलील दी कि जिला प्रशासन ने एकल न्यायाधीश के समक्ष कभी सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने की बात नहीं उठाई थी। अब इसे तर्क के रूप में पेश करना केवल जांच से बचने का तरीका है। उन्होंने कहा, 'सार्वजनिक व्यवस्था का तर्क कोई जादुई ढाल नहीं है, जिसे दिखाकर धार्मिक अधिकारों की जांच से बचा जाए।' इस पर न्यायमूर्ति जयचंद्रन ने टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रशासन यह कहकर कैसे हस्तक्षेप कर रहा है कि दीप न जलाया जाए, और यह भी कि सार्वजनिक व्यवस्था का डर भी बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा रहा है, जबकि दोनों पक्षों की दलीलें अतिरंजित लगती हैं।


तमिल संस्कृति और धार्मिक परंपरा
अधिवक्ता ने जोर देकर कहा कि दीप जलाना एक हिंदू धार्मिक परंपरा और तमिल संस्कृति का हिस्सा है। लेकिन अधिकारी यह कहकर इसे चुनौती दे रहे हैं कि किसी खास स्थान पर पूजा करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मौलिक अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अधिकारियों का रवैया पहले से ही एकतरफा और पक्षपाती है। उन्होंने कहा, 'दीप जलाना और पूजा करना तमिल संस्कृति है। इसे रोकने के लिए सार्वजनिक व्यवस्था का एक काल्पनिक डर दिखाया जा रहा है।'

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पत्थर के स्तंभ को लेकर विवाद
श्रीराम ने प्रशासन की उस दलील को भी खारिज किया, जिसमें कहा गया था कि वह पत्थर का स्तंभ जैनों का हो सकता है, दरगाह का हिस्सा हो सकता है या फिर महज एक सर्वे स्टोन हो सकता है। उन्होंने इसे ईमानदारी से रहित तर्क बताया। उन्होंने मंदिर प्रशासन के उस पुराने बयान का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि 'भले ही भगवान मुरुगन की दो पत्नियां हों, लेकिन पहाड़ी पर सिर्फ एक ही दीप जलाया जा सकता है।' श्रीराम ने कहा कि यह बयान हिंदू भक्तों के प्रति उपेक्षा और तिरस्कार को दर्शाता है।


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