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विष्णु प्रभाकर की एकांकी ‘मैं भी मानव हूं’ का थर्ड बेल ने किया सजीव मंचन

Wed, 13 Mar 2019 07:04 PM IST
Gaurav Pandey एन. अर्जुन, नई दिल्ली
एन. अर्जुन, नई दिल्ली Published by: Gaurav Pandey Updated Wed, 13 Mar 2019 07:04 PM IST
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Third Bell played the play let 'main bhi manav hoon' written by Vishnu Prabhakar
नाटक का मंचन करते कलाकार

'...सुना तो मैंने भी है कि सम्राट राजकुमार को क्षमा कर देंगे, अगर क्षमा ही करना था तो इतना बड़ा मरण त्यौहार क्यों? इतनी बड़ी दानवी लीला किसलिए? सम्राटों की माया कौन जानता है? एक क्षण वे रक्त और ज्वाला की भाषा बोलते हैं तो दूसरे ही क्षण वसंत विहाग का राग छेड़ देते हैं। सम्राट महत्वाकांक्षी होते हैं। वे विजय चाहते हैं। किसी भी शर्त पर विजय। इस महानाश को देखकर हमारे सम्राट डर गए हैं, अब वे ह्रदय के माध्यम से विजय प्राप्त करना चाहते हैं।' 

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ह्रदय परिवर्तन की यह गाथा सुनाकर दर्शक तालियों की गड़गड़ाहट से प्रहरियों की वार्तालाप का स्वागत करते हैं। यह ह्रदय परिवर्तन हुआ, हिंदी के प्रख्यात लेखक और नाटककार विष्णु प्रभाकर के नाटक 'मैं भी मानव हूं' में, जिसका नई दिल्ली में थर्ड बेल के कलाकारों ने सफल मंचन किया।
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करीब 18 साल से रंगमंच को जीवन समर्पित कर चुके अनुराग अरोड़ा अब तक करीब 40 से अधिक नाटक, 450 से अधिक शो और ‘ओए लक्की, लक्की ओए’ से अपना फिल्मी करियर की शुरुआत कर चुके हैं। फिल्म 'दंगल' से होते हुए 'मंटो' तक का सफर पार करने वाले अनुराग अरोड़ा ने विष्णु प्रभाकर की कालजयी नाटक ‘मैं भी मानव हूं’ जैसे गंभीर विषय को उठाया और युद्ध की विभीषिका को उसी रूप में दिखाने में सफल प्रयास किया। 
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नाटक देखते हुए दर्शक का मन अशोक से बार-बार आग्रह करता है तू कलिंग के राजकुमार को माफ कर... माफ कर... माफी से बड़ा कोई धर्म नहीं और माफ करना किसी युद्ध विजय से कम नहीं है। युद्ध किसी समस्या का हल नहीं। अगर किसी को मारकर जीत हासिल कर भी ली तो क्या किया? 

विष्णु प्रभाकर ने जिस वक्त यह नाटक लिखा होगा तब तो पता नहीं लेकिन आज के परिपेक्ष्य में जब पूरी मानवता युद्ध की जिस भयंकर चपेट में अभी आई-अभी आई की स्थिति में है, यह नाटक युद्ध के खतरनाक परिणामों की ओर इंगित करता है। इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल वेनेजुएला-2018 में शॉर्ट फिल्म ‘अम्मा मेरी’ के लिए बेस्ट एक्टर का पुरस्कार जीतने वाले अनुराग ने विष्णु प्रभाकर के नाटक के कथानक के साथ और निर्देशन के माध्यम से न्याय किया है।

किसी भी सफल नाटक के मंचन में उसकी वेश-भूषा का बहुत महत्वपूर्ण स्थान रहता है। जिस काल का नाटक मंचन हो रहा है क्या उन लोगों की वेश-भूषा वैसी ही है, जैसी कि उस कालखंड में इस्तेमाल में लाई जाती थी। अगर, इसका जवाब हां में है तो निश्चित ही इस दृष्टि से ‘मैं भी मानव हूं’ की डिजाइनर इसमें सफल हुई हैं। 

राज शर्मा, जो कि इसकी कस्ट्यूम डिजाइनर हैं, ने वेश-भूषा के साथ न्याय किया है और वे दर्शकों को उसी युग में ले जाने में सफल हुई हैं। चाहे अशोक के परिधान हों या संघमित्रा या फिर किसी सिपाही के, देखते हुए आप पाएंगे कि आप उसी कालखंड में हैं। कस्ट्यूम नाटक को अपनी मंजिल तक ले जाने में सफल सिद्ध हुआ है।

इसी तरह से किसी नाटक की आत्मा है संगीत। नाटक का संगीत, नाटक को शिखर तक ले जाने में बेहतरीन भूमिका निभाता हुआ दिखता है। संगीत के माध्यम से सभी रस अपना-अपना असर छोड़ने में कामयाब हुए हैं। संगीत के साथ-साथ प्रकाश योजना हो या फिर मेकअप हर विभाग ने अपने-अपने क्षेत्र में बेहतरीन कार्य किया, जिससे एक सफल नाटक के मंचन का आयोजन होता है। 

इस लिहाज से डायरेक्टर अनुराग अरोड़ा सभी विधाओं में पूरी तरह से कामयाब हुए हैं। सभी के बेहतरीन तालमेल का ही नतीजा था कि लोगों को युद्ध जैसे एक विकट समस्या को बहुत सरल ढंग से लोगों तक पहुंचाने में सफल हुए हैं। अगर आप भी एक बार इसे देखने का मौका पाना चाहते हैं तो 17 मार्च को गुड़गांव में देख सकते हैं।

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