फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   These communities benefit from right of states to sub-classify Scheduled Castes for reservation in govt jobs

नौकरियों में आरक्षण: शीर्ष फैसले से पंजाब, आंध्र-तमिलनाडु और UP के इन समुदायों पर असर, CJI ने की ये टिप्पणी

Fri, 02 Aug 2024 06:02 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Fri, 02 Aug 2024 06:02 AM IST
सार

चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने अपने 140 पेज के बहुमत के फैसले में कहा कि अनुसूचित जाति (एससी) के भीतर पिछड़ापन मौलिक समानता हासिल करने में एक बाधा है और उप-वर्गीकरण इसे साकार करने का एक साधन है। 

विज्ञापन
These communities benefit from right of states to sub-classify Scheduled Castes for reservation in govt jobs
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा कि राज्य को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने के लिए अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का उप-वर्गीकरण करने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की संविधान पीठ ने बहुमत से यह फैसला लिया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से पंजाब में वाल्मीकि और मजहबी सिखों, आंध्र में मडुगा समुदाय, बिहार में पासवान, यूपी में जाटव और तमिलनाडु में अरुणथथियार समुदाय को फायदा मिलेगा। इस दौरान चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने अपने 140 पेज के बहुमत के फैसले में कहा कि अनुसूचित जाति (एससी) के भीतर पिछड़ापन मौलिक समानता हासिल करने में एक बाधा है और उप-वर्गीकरण इसे साकार करने का एक साधन है। 

विज्ञापन

अनुसूचित जाति में पिछड़ापन वास्तविक समानता में बाधक- सीजेआई
सीजेआई ने अपने फैसले में उन सिद्धांतों का सारांश दिया जो संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के तहत लाभार्थी वर्ग की पहचान के उद्देश्य और मानदंड को रेखांकित करते हैं। उन्होंने कहा, अनुच्छेद 15(4) और 16(4) में विशेष प्रावधानों का उद्देश्य लाभार्थी वर्ग को वास्तविक समानता प्रदान करना है। वर्ग के भीतर परस्पर पिछड़ापन वास्तविक समानता प्राप्त करने में एक बाधा है। उप-वर्गीकरण वास्तविक समानता हासिल करने की दिशा में उपाय है। अनुच्छेद 15(4) में कहा गया है कि किसी भी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की उन्नति के लिए कोई विशेष प्रावधान करने की दिशा में राज्य पर कोई रोक नहीं है। वहीं अनुच्छेद 16(4) में कहा गया है कि राज्य को पिछड़े वर्ग के ऐसे नागरिकों जिनका सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, के लिए नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए प्रावधान करने पर कोई रोक नहीं है।

चीफ जस्टिस ने कहा, अनुच्छेद 15(4) में लाभार्थी वर्ग को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा वर्ग होना चाहिए। यह वाक्यांश समाजशास्त्रीय वास्तविकता की एक सांविधानिक मान्यता को स्थापित करता है कि शैक्षिक पिछड़ापन उस वर्ग के सामाजिक पिछड़ेपन के कारण होता है।

इंद्रा साहनी मामले में उप वर्गीकरण ओबीसी तक सीमित नहीं था 
न्यायालय ने यह भी कहा कि इंद्रा साहनी (मंडल आयोग) मामले में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ ने क्रीमी लेयर के सिद्धांत को लागू करने में उप-वर्गीकरण के आवेदन को केवल अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) तक सीमित नहीं किया था। न्यायालय ने तब संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के तहत लाभार्थी वर्गों पर इस सिद्धांत के लागू होने को बरकरार रखा था। 

विज्ञापन
विज्ञापन

लाभ उठा चुके लोगों को हटाने के लिए समय-समय पर काम हो- न्यायाधीश जस्टिस पंकज मिथल
वहीं, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस पंकज मिथल ने कहा कि आरक्षण का लाभ लेने के बाद सामान्य वर्ग के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ने वाले लोगों के वर्ग को बाहर करने के लिए समय-समय पर काम किया जाना चाहिए। एससी/एसटी आरक्षण के अंदर आरक्षण मामले में फैसला सुनाते हुए उन्होंने कहा, संविधान के तहत और इसके विभिन्न संशोधनों के तहत आरक्षण की नीति पर नए सिरे से विचार करने और पिछड़े वर्ग या एससी/एसटी/ओबीसी समुदायों से संबंधित लोगों की मदद करने और उनके उत्थान के लिए अन्य तरीकों को विकसित करने की आवश्यकता है।

उन्होंने लिखा, चूंकि इसके कार्यान्वयन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा क्योंकि पिछड़े वर्गों में से कुछ आगे बढ़ गए हैं, इसलिए पिछड़े में भी पिछड़े लोगों का उत्थान करना अनिवार्य हो गया है, जिसके लिए उप-वर्गीकरण किया जाना चाहिए। जस्टिस मिथल ने कहा कि आरक्षण, यदि कोई हो, तो केवल पहली पीढ़ी या एक पीढ़ी तक ही सीमित होना चाहिए और यदि परिवार में किसी पीढ़ी ने इसका लाभ उठाया है और उच्च दर्जा प्राप्त किया है तो इसका लाभ तार्किक रूप से दूसरी पीढ़ी को नहीं मिलना चाहिए।

उन्होंने कहा, जब तक कोई नई पद्धति विकसित या अपनाई नहीं जाती तब तक आरक्षण की मौजूदा प्रणाली किसी वर्ग, विशेष रूप से अनुसूचित जाति, के उप-वर्गीकरण की अनुमति देने की शक्ति जारी रह सकती है क्योंकि मैं एक नई इमारत खड़ी किए बिना किसी मौजूदा इमारत को गिराने का सुझाव नहीं दूंगा। जस्टिस मित्थल ने भगवद् गीता और रामचरित मानस, स्कंद पुराण का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राचीन भारत में कोई जाति व्यवस्था नहीं थी। उन्होंने कहा, वर्ण व्यवस्था को जाति व्यवस्था के रूप में गलत तरीके से प्रस्तुत करना एक सामाजिक दोष था, जो समय के साथ बढ़ता गया और इसे अच्छा नहीं माना गया, क्योंकि इसने समाज को विभाजित किया और भेदभाव और असमानता को जन्म दिया।

विज्ञापन

जस्टिस बेला त्रिवेदी ने दिया असहमति वाला फैसला
सात जजों की पीठ में एकमात्र जस्टिस बेला एम त्रिवेदी ने असहमति वाला फैसला दिया। जस्टिस त्रिवेदी ने 85 पेज के फैसले में कहा, केवल संसद किसी जाति को एससी सूची में शामिल या बाहर कर सकती है। राज्यों को इसमें छेड़छाड़ करने का अधिकार नहीं है। एससी एक जैसी जातियों का वर्ग है जिसमें आगे उप-वर्गीकरण नहीं किया जा सकता।

जस्टिस त्रिवेदी ने कहा, अनुच्छेद 341 के तहत राज्यों के पास एससी के रूप में सूचीबद्ध जातियों, नस्लों या जनजातियों को विभाजित/उप-विभाजित/उप-वर्गीकृत या पुनर्समूहित करके आरक्षण प्रदान करने या किसी विशेष जाति/जातियों को ऐसा आरक्षण देने के लिए कानून बनाने की कोई विधायी क्षमता नहीं है। राज्यों द्वारा उप-वर्गीकरण संविधान के अनुच्छेद 341(2) के तहत राष्ट्रपति की अधिसूचना के साथ छेड़छाड़ करने के समान होगा।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed