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OPS: ‘पेंशन इनाम या अनुग्रह राशि नहीं है’, सुप्रीम कोर्ट की बात नहीं मान रही सरकार; 4000 रुपये पेंशन क्यों?

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Wed, 24 Jul 2024 08:52 PM IST
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सार

केंद्रीय बजट, सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की उम्मीदों तक पहुंचने में विफल रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से फैसला सुनाया है कि पेंशन कोई इनाम नहीं है, पेंशन कोई ऐसी चीज नहीं है जो नियोक्ता की इच्छा के अनुसार दी जाती है।

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There is no mention of the old pension scheme in the Union Budget
पुरानी पेंशन स्कीम। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

केंद्रीय बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 'एनपीएस' सुधार की बात कही है। उन्होंने 'पुरानी पेंशन' का जिक्र नहीं किया। संसद में पूछे गए एक सवाल के जवाब में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने कहा, कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन बहाली का कोई प्रस्ताव केंद्र सरकार के विचाराधीन नहीं है। सरकार, वेतन और पेंशन में संशोधन के लिए 8वें वेतन आयोग के गठन की दिशा में किसी प्रस्ताव पर विचार नहीं कर रही। इससे एक बात तो स्पष्ट हो गई है कि अब सरकार 'ओपीएस' बहाल नहीं करेगी। एआईडीईएफ के महासचिव और एआईटीयूसी के राष्ट्रीय सचिव सी. श्रीकुमार का कहना है, केंद्रीय बजट, सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की उम्मीदों तक पहुंचने में विफल रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से फैसला सुनाया है कि पेंशन कोई इनाम नहीं है, पेंशन कोई अनुग्रह राशि नहीं है, पेंशन कोई ऐसी चीज नहीं है जो नियोक्ता की इच्छा के अनुसार दी जाती है। यह प्रत्येक सरकारी कर्मचारी का मौलिक अधिकार है। सरकार, जिससे आदर्श नियोक्ता बनने की उम्मीद की जाती है, अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी सम्मान नहीं कर रही है।



एनपीएस में संशोधन पर ही बात
श्रीकुमार ने कहा, जब केंद्र और राज्य सरकार के कर्मचारी पुरानी पेंशन योजना की बहाली के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तब वित्त मंत्री ने बजट में सरकारी कर्मचारियों से संबंधित 'ओपीएस' को लेकर कोई घोषणा नहीं की है। उन्होंने एकमात्र घोषणा, एनपीएस में किए जाने वाले संशोधन के बारे में की है। इनकम टैक्स में भी कोई खास राहत नहीं दी गई है। आठवें वेतन आयोग के गठन की स्थापना आदि जैसी घोषणा भी बजट में शामिल नहीं की गई। केंद्रीय बजट, सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की उम्मीदों तक पहुंचने में विफल रहा है। बजट से सरकारी कर्मचारी ही नहीं, पूरा कर्मचारी वर्ग और उनकी ट्रेड यूनियनें भी पूरी तरह निराश हैं। 


सरकार के लिए यही कार्यबल जुटाता है राजस्व
एक बात जो सरकार आराम से भूल जाती है, वह यह है कि देश का कार्यबल धन का निर्माता है, वे ही हर चीज का उत्पादन करते हैं। जिस पर सरकार जीएसटी एकत्र करती है, जो सरकार के लिए राजस्व का मुख्य स्रोत है, फिर वही कर्मचारी अपनी जरूरतों के लिए बाजार से जो भी सामान खरीदते हैं उस पर जीएसटी चुकाते हैं। इससे भी बढ़कर, वे देश के सच्चे करदाता हैं। यह कार्यबल ही है जो सरकार के लिए राजस्व उत्पन्न करता है। केंद्रीय ट्रेड यूनियनों द्वारा वित्त मंत्री को दिए गए सभी प्रस्तावों को आसानी से नजरअंदाज कर दिया गया है। कर्मचारी नेता ने बताया, किसी भी सरकारी कर्मचारी या उनके संगठन ने एनपीएस में सुधार की मांग नहीं की है। उनकी मांग, केवल पुरानी पेंशन योजना को बहाल करने की है। 

इसलिए सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षण
सरकारी कर्मचारी, कैंपस साक्षात्कार या सिफारिशों के माध्यम से नौकरी पर नहीं आते हैं। नौकरी के योग्य होने के लिए उन्हें कई चयन प्रक्रियाओं और परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षण, नौकरी की सुरक्षा और गैर-अंशदायी पेंशन लाभों के कारण था। भले ही वे आचरण नियमों के नाम पर सैकड़ों प्रतिबंधों से उलझे हुए हों। सरकारी कर्मचारियों का पेंशन अधिकार, एक मौलिक अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय पहले ही यह बात कह चुका है। एनपीएस कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद अपने सेवा काल की संचित बचत का 40 प्रतिशत हिस्सा, पीएफआरडीए के पास रखना होता है। उससे उन्हें दो चार हजार रुपये की मामूली पेंशन मिलती है।खासतौर पर, ग्रुप-सी के कर्मचारी, जिनकी संख्या सरकार में अधिक है, उन्हें एनपीएस में 2000 से 4000 रुपये की पेंशन मिलती है। एक तरफ सरकार, विदेशी कंपनियों सहित कॉरपोरेट घरानों को हर तरह के लाभ और राहत देने में खुश है तो वहीं दूसरी ओर, सरकारी कर्मचारियों सहित श्रमिक वर्ग को पूरी तरह से उपेक्षित किया गया है। 

18 महीने के डीए बकाया का भुगतान भी नहीं
भारत सरकार में 15 लाख से अधिक कर्मचारी एनपीएस के अंतर्गत आते हैं। पुरानी पेंशन योजना बहाल करने की उनकी मांग को सरकार ने खारिज कर दिया है। केंद्र सरकार के कर्मचारी अपने साथ हुए अन्याय को स्वीकार नहीं करेंगे। वे अपना पेंशन अधिकार वापस पाने के लिए संघर्ष करेंगे। सरकारी कर्मचारी और पेंशनभोगी उम्मीद कर रहे थे कि सरकार 18 महीने के डीए बकाया का भुगतान करेगी, जो कि कोविड-19 महामारी के दौरान अवैध रूप से रोक दिया गया था। अब सरकार ने इसे भी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों से छीन लिया है। 7वें वेतन आयोग को लागू हुए 8 साल हो चुके हैं। सातवें वेतन आयोग ने सिफारिश की है कि समय-समय पर वेतन संशोधन होना चाहिए। इसे सरकार ने स्वीकार नहीं किया है। यदि कोई वेतन आयोग गठित होता है तो उसे अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने में 2 वर्ष से अधिक का समय लगेगा। आठवें वेतन आयोग की नियुक्ति का यह सही समय है, क्योंकि आज के जीवन की आवश्यकता के अनुसार न्यूनतम वेतन, प्रवेश स्तर पर 40,000 किए जाने की आवश्यकता है। वित्त मंत्री ने 8वें केंद्रीय वेतन आयोग के गठन पर कोई घोषणा नहीं की है। 

रोजगार पैदा करने की घोषणा नहीं
बतौर श्रीकुमार, सरकारी विभागों में 20 लाख से ज्यादा पद खाली पड़े हैं। जनता को यह दिखाने के लिए कि कम संख्या में पद खाली हैं, रिक्त पदों को खत्म कर दिया गया है। वित्त मंत्री ने सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार पैदा करने के लिए बजट में कोई घोषणा नहीं की। केवल सार्वजनिक क्षेत्र है, जहां ओबीसी, एससी/एसटी समुदायों के सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित युवाओं को नौकरी देने के लिए आरक्षण मिलता है। रिक्त पदों को भरने के लिए बजट में किसी भी कार्य योजना की घोषणा नहीं की गई है। केंद्रीय वित्त मंत्री ने केवल निजी क्षेत्र में रोजगार पैदा करने का जिक्र किया है, जहां न तो आरक्षण है और न ही नौकरी में स्थायित्व। सरकारी विभागों, सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र में, अनुबंध व निश्चित अवधि का रोजगार, दिन का क्रम बन गया है। इन सभी क्षेत्रों में 'प्रशिक्षु' के नाम पर युवाओं को सभी प्रकार की नौकरियों में लगाया जाता है। इन्हें न्यूनतम वेतन भी नहीं मिलता। इनका पूरी तरह से शोषण किया जाता है। अब तो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने भी बिना गारंटी की नौकरी के अप्रेंटिस ट्रेनिंग के नाम पर युवाओं की भर्ती शुरू कर दी है। सशस्त्र बलों में भी फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट 'अग्निवीर' योजना लागू कर दी गई है।

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