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भारत-पाकिस्तान सीमा की चौकसी में हैं ढेरों 'सुराख', आतंकियों को दे रहे हैं घुसपैठ का मौका!

Sat, 21 Nov 2020 07:05 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Sat, 21 Nov 2020 07:05 PM IST
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सार
जम्मू या कश्मीर में जहां से भी घुसपैठ हो रही है, वह क्षेत्र पहाड़ी, जंगल से भरा हुआ, नदी-नाले और ऊंची-नीची जमीन है। कई ऐसे इलाके हैं, जहां सीमा पर सरकंडे खड़े हैं। ये इतने घने हैं कि कैमरे भी इनके भीतर छिपी वस्तु या इंसान को नहीं देख पाते...
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There are many holes in the guarding of the India-Pakistan border, giving terrorists a chance to infiltrate
Security agencies engaged in investigation after getting tunnel on IB, 10 BSF jawans and one SPO rewarded for finding tunnel - फोटो : Amar Ujala (File)

विस्तार

भारत-पाकिस्तान सीमा की चौकसी के लिए सेना और बीएसएफ दिन रात लगी रहती हैं। सीमा पर नजर रखने के लिए कुछ उपकरण भी आ रहे हैं। लेजर दीवार तैयार करने की खबरें भी आती रहती हैं। इन सबके बावजूद पाकिस्तान से चले आतंकी भारतीय सीमा में प्रवेश कर जाते हैं। सीमा की चौकसी में ऐसे कितने छेद हैं जो आतंकियों को घुसपैठ का मौका दे रहे हैं। एक सवाल है कि सुरक्षा एजेंसियों के बीच कहीं छोटे भाई-बड़े भाई जैसा तो कुछ शुरू नहीं हो गया है।



पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) डीएस हुड्डा ने कुछ माह पहले जो बात कही थी, अब सुरक्षा विश्लेषक, ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता (रिटायर्ड) भी कह रहे हैं।' वन बॉर्डर, वन फोर्स' की अवधारणा पर चिंतन करने का समय आ गया है। पड़ोसी राष्ट्रों में बॉर्डर गॉर्ड फोर्स, सेना के नियंत्रण में है। दूसरी ओर, बीएसएफ के पूर्व एडीजी संजीव कुमार सूद कहते हैं, पाकिस्तान से लगती सीमा पर नियंत्रण रेखा यानी 'लाइन ऑफ कंट्रोल' वाले हिस्से में बीएसएफ, सेना की कमांड में ड्यूटी देती है। ट्रेनिंग, तकनीक और समन्वय, अगर इन पर ठीक से काम हो जाए तो आतंकियों की घुसपैठ बंद हो सकती है।

इस्रायली तकनीक कारगर नहीं

भारत-पाकिस्तान और भारत-बांग्लादेश सीमा पर बीएसएफ तैनात है। असम के धुबरी और जम्मू के कुछ हिस्से में सीमा चौकसी के लिए 'विस्तृत एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली' (सीआईबीएमएस) तकनीक का सहारा लिया जा रहा है। हालांकि यह सिस्टम ट्रायल पर बताया गया है। ये अलग बात है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय नेपाल, भूटान और म्यांमार बॉर्डर के कुछ हिस्सों पर तकनीकी उपकरणों की मदद से सर्विलांस करने की योजना बना रहा है।

ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता (रिटायर्ड) बताते हैं, जम्मू या कश्मीर में जहां से भी घुसपैठ हो रही है, वह क्षेत्र पहाड़ी, जंगल से भरा हुआ, नदी नाले और ऊंची नीची जमीन है। जम्मू के कई ऐसे इलाके हैं, जहां सीमा पर सरकंडे खड़े हैं। ये इतने गहरे हैं कि कैमरे भी इनके भीतर छिपी वस्तु या इंसान को नहीं देख पाते। बीएसएफ वाले अपने इलाके में इन्हें काट देते हैं, जबकि पाकिस्तान सरकंडों को बढ़ाता है।

उसका मकसद होता है कि मौका मिलते ही सरकंडों की आड़ में घुसपैठ करा दी जाए। अखनूर से लेकर कठुआ तक पांच बड़े नदी नाले हैं। लखनपुर, कठुआ, हीरानगर और सांबा का क्षेत्र बहुत मुश्किल माना जाता है। हमारा जवान कई सौ फुट ऊपर ड्यूटी देता है। नीचे पानी के बहाव में आतंकी भारतीय सीमा में पहुंच जाते हैं। धुंध ज्यादा होती है और वे वाटरप्रूफ सूट और बूट पहनकर नाले में कूद जाते हैं। ये ऐसी स्थिति होती है कि सीआईबीएमएस, लेजर और रडार आदि उपकरण मददगार साबित नहीं होते हैं।

बीएसएफ को नाका सिस्टम बदलना होगा

ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता (रिटायर्ड) के अनुसार, बीएसएफ का नाका सिस्टम ठीक नहीं है। उनका नाका एक लाइन में लगा रहता है। वे आगे पीछे नहीं देखते हैं। यहीं पर सेना और बीएसएफ की ट्रेनिंग में फर्क नजर आता है। सीमा चौकसी के लिए नाइट डिवाइस पुरानी तकनीक पर आधारित हैं। सेकंड जनरेशन वाले उपकरणों से काम नहीं चलता। बॉर्डर की सुरक्षा सेना के दायरे में हो। बांग्लादेश, चीन और पाकिस्तान में बॉर्डर गार्ड फोर्स, वहां की सेना के प्रभाव में रहती हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो समन्वय की दिक्कत आती है। एक फोर्स है तो जिम्मेदारी तय होती है।

दूसरी ओर पूर्व एडीजी एसके सूद कहते हैं कि सीमा सुरक्षा के रुटीन पैटर्न से हटना होगा। बेहतर क्वॉलिटी के उपकरण खरीदने होंगे। नाइट विजन उपकरण जो हैंड होल्ड होते हैं, उनका इस्तेमाल बहुत मुश्किल रहता है। सिस्टम की खरीद प्रक्रिया लंबी है। कई वर्ष तक ट्रायल चलता है। सभी जवानों को इनका ज्ञान नहीं होता और वे इन्हें इस्तेमाल करने से हिचकिचाते हैं। ये उपकरण हर जगह पर काम नहीं करते। उपकरणों की खरीदारी में ये सब नहीं देखा जाता। जो उपकरण कच्छ के रण में सफल है, वह पंजाब या पूर्वी सीमा पर मदद नहीं देगा। वजह, वहां पर जनसंख्या ज्यादा रहती है।

बेहतर चौकसी के लिए ये सब करना होगा...

पूर्व एडीजी एसके सूद के अनुसार, बॉर्डर पर बेहतर तकनीक वाले लेटेस्ट उपकरण मुहैया कराए जाएं। जवानों को पूरा आराम मिले। देखने में आया है कि मौजूदा ड्यूटी के अंतर्गत जवानों को आराम का कम अवसर मिलता है। तकनीकी उपकरण ऐसे हों, जिन्हें कंट्रोल रूम के जरिए संचालित किया जा सके और जवानों को मोर्चे पर ही अलर्ट मिल जाए। सेना और बीएसएफ के बीच छोटे भाई और बड़े भाई, जैसा कुछ होने की अपुष्ट खबरें आती रहती हैं, लेकिन ये दोनों अच्छा काम कर रहे हैं।

सीमा की सुरक्षा का काम बीएसएफ अच्छे से कर रही है। समन्वय को बेहतर बनाया जाए। उपकरणों की ट्रेनिंग का इंतजाम हो। जब इनकी खरीद के लिए टेंडर जारी हो तो उसके साथ एक क्लॉज जोड़ दें कि ट्रेनिंग और रिपेयर करने की जिम्मेदारी संबंधित कंपनी की होगी। पहले एक कोर ग्रुप को प्रशिक्षित करें और उसके बाद वह ग्रुप बाकी के जवानों को प्रशिक्षित कर देंगे।

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