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Supreme Court: 'रिश्तों में खटास के बाद सहमति से संबंध को अपराध बनाने की प्रवृति चिंताजनक'; कोर्ट की टिप्पणी
Thu, 28 Nov 2024 05:02 AM IST
शुभम कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शुभम कुमार
Updated Thu, 28 Nov 2024 05:02 AM IST
सार
कोर्ट ने कहा कि हमारी राय में, महिला साथी की ओर से विवाह के लिए विरोध और आग्रह के बिना पुरुष साथी के साथ शारीरिक संबंध की अवधि जितनी लंबी होगी, वह पुरुष साथी द्वारा विवाह के झूठे वादे पर आधारित संबंध की बजाय सहमति से बने संबंध का संकेत होगा।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि महिला की ओर से विरोध या विवाह पर जोर दिए बिना पुरुष मित्र से लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाना विवाह के झूठे वादे पर आधारित संबंध की बजाय सहमति से बने रिश्ते का संकेत है। शीर्ष अदालत ने कहा कि रिश्तों में खटास आने के बाद लंबे समय तक सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंधों को अपराध ठहराने की प्रवृति्त चिंताजनक है।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि यह अदालत बड़ी संख्या में इस तरह के मामलों से निपट रही है। इससे स्पष्ट होता है कि लंबे समय तक चलने वाले सहमति से बने संबंधों के खराब होने पर उसे आपराधिक बनाने की कोशिश की जाती है।
पीठ ने सहमति से बने संबंधों और विवाह के झूठे वादों पर आधारित संबंधों के बीच अंतर करने की कोशिश की। कोर्ट ने माना कि महिला साथी के पास विवाह के वादे के अलावा किसी पुरुष के साथ रिश्ते में रहने के अन्य कारण भी हो सकते हैं, जैसे कि औपचारिक वैवाहिक संबंधों पर जोर दिए बिना साथी के लिए व्यक्तिगत पसंद। ऐसा संबंध जितना लंबा होगा, उतना ही अधिक संकेत होगा कि यह विवाह के किसी वादे के बिना सहमति से बनाया गया संबंध है।
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पीठ की तर्क
पीठ ने कहा कि ऐसी स्थिति में जहां महिला की ओर से जानबूझकर लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाए रखा जाता है, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है कि उक्त शारीरिक संबंध केवल अपीलकर्ता की ओर से उससे विवाह करने के कथित वादे के कारण था। जहां कोर्ट ने कहा, हमारी राय में, महिला साथी की ओर से विवाह के लिए विरोध और आग्रह के बिना पुरुष साथी के साथ शारीरिक संबंध की अवधि जितनी लंबी होगी, वह पुरुष साथी द्वारा विवाह के झूठे वादे पर आधारित संबंध की बजाय सहमति से बने संबंध का संकेत होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि महिला साथी की ओर से आपत्ति या विरोध के बिना शारीरिक संबंध को इतने लंबे समय तक जारी रखना, वास्तव में आपराधिक दोष के दंश को समाप्त निष्प्रभावी कर देता है।
हाईकोर्ट ने सहमति से संबंध नहीं माना था
महिला ने अपनी बेटी से छोड़छाड़ के आरोप में भी अपीलकर्ता के खिलाफ एक एफआईआर दर्ज कराई थी। उस मामले में भी आरोपी को संरक्षण दिया गया। इसके बाद आरोपी ने दर्ज मामलों को रद्द करने के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज करते हुए कहा कि इस बात का कोई प्रथम दृष्टया सबूत नहीं है कि शिकायतकर्ता के साथ उनका रिश्ता सहमति से था। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। अब शीर्ष अदालत ने आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि दोनों के संबंध 2008 से 2017 तक रहे।
महिला ने भी दर्ज कराया केस
महिला ने भी आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म, धोखाधड़ी और आपराधिक धमकी का मामला दर्ज कराया। उसने कहा कि वह 2008 में आरोपी से मिली थी, जब वह नौकरी की तलाश में थी। आरोपी को अपनी बीमार पत्नी की देखभाल के लिए एक सहायक की जरूरत थी। महिला ने आरोप लगाया कि आरोपी ने शादी का झूठा वादा करके उसके साथ नियमित रूप से यौन संबंध बनाए। यह सिलसिला 2017 तक चलता रहा। इसके बाद आरोपी ने उससे बचना शुरू कर दिया।
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जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि यह अदालत बड़ी संख्या में इस तरह के मामलों से निपट रही है। इससे स्पष्ट होता है कि लंबे समय तक चलने वाले सहमति से बने संबंधों के खराब होने पर उसे आपराधिक बनाने की कोशिश की जाती है।
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पीठ ने सहमति से बने संबंधों और विवाह के झूठे वादों पर आधारित संबंधों के बीच अंतर करने की कोशिश की। कोर्ट ने माना कि महिला साथी के पास विवाह के वादे के अलावा किसी पुरुष के साथ रिश्ते में रहने के अन्य कारण भी हो सकते हैं, जैसे कि औपचारिक वैवाहिक संबंधों पर जोर दिए बिना साथी के लिए व्यक्तिगत पसंद। ऐसा संबंध जितना लंबा होगा, उतना ही अधिक संकेत होगा कि यह विवाह के किसी वादे के बिना सहमति से बनाया गया संबंध है।
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पीठ की तर्क
पीठ ने कहा कि ऐसी स्थिति में जहां महिला की ओर से जानबूझकर लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाए रखा जाता है, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है कि उक्त शारीरिक संबंध केवल अपीलकर्ता की ओर से उससे विवाह करने के कथित वादे के कारण था। जहां कोर्ट ने कहा, हमारी राय में, महिला साथी की ओर से विवाह के लिए विरोध और आग्रह के बिना पुरुष साथी के साथ शारीरिक संबंध की अवधि जितनी लंबी होगी, वह पुरुष साथी द्वारा विवाह के झूठे वादे पर आधारित संबंध की बजाय सहमति से बने संबंध का संकेत होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि महिला साथी की ओर से आपत्ति या विरोध के बिना शारीरिक संबंध को इतने लंबे समय तक जारी रखना, वास्तव में आपराधिक दोष के दंश को समाप्त निष्प्रभावी कर देता है।
हाईकोर्ट ने सहमति से संबंध नहीं माना था
महिला ने अपनी बेटी से छोड़छाड़ के आरोप में भी अपीलकर्ता के खिलाफ एक एफआईआर दर्ज कराई थी। उस मामले में भी आरोपी को संरक्षण दिया गया। इसके बाद आरोपी ने दर्ज मामलों को रद्द करने के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज करते हुए कहा कि इस बात का कोई प्रथम दृष्टया सबूत नहीं है कि शिकायतकर्ता के साथ उनका रिश्ता सहमति से था। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। अब शीर्ष अदालत ने आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि दोनों के संबंध 2008 से 2017 तक रहे।
महिला ने भी दर्ज कराया केस
महिला ने भी आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म, धोखाधड़ी और आपराधिक धमकी का मामला दर्ज कराया। उसने कहा कि वह 2008 में आरोपी से मिली थी, जब वह नौकरी की तलाश में थी। आरोपी को अपनी बीमार पत्नी की देखभाल के लिए एक सहायक की जरूरत थी। महिला ने आरोप लगाया कि आरोपी ने शादी का झूठा वादा करके उसके साथ नियमित रूप से यौन संबंध बनाए। यह सिलसिला 2017 तक चलता रहा। इसके बाद आरोपी ने उससे बचना शुरू कर दिया।