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राष्ट्रवादी बाबा रामदेव, सूट-सलवार से लेकर राष्ट्रवादी बर्गर तक की कहानी

Fri, 12 May 2017 12:28 PM IST
amarujala.com- Submitted by: आनंद
amarujala.com- Submitted by: आनंद Updated Fri, 12 May 2017 12:28 PM IST
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The story of nationalist Baba Ramdev, from suits-salwar to nationalist burgers
दिलफरेब समय है। औद्योगिक घरानों के उत्पाद खरीदने के लिए प्रेरित करने वाले पंचलाइन आध्यात्मिक हो चले हैं। योग गुरु बाबा रामदेव ने उद्योग में योग की खोज कर ली है। योग वहीं उद्योग के आखिरी छोर में जाने कब से छिपा हुआ था कोई देख नहीं पा रहा था।
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मुक्ति से जरूरी माया

वो महर्षि पतंजलि के योग दर्शन के जरिए अपनी मुक्ति का रास्ता खोजने चले थे। रास्ते में उन्हें लगा कि मुक्ति से जरूरी माया है जिसके सही इस्तेमाल से एक पूरे देश को गरीबी से मुक्त किया जा सकता है।
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मेड इन भारत

इसके लिए कुछ खास नहीं करना पड़ता बस अपने उत्पादों पर "मेड इन भारत" लिखना होता है। अतः उन्होंने महर्षि को एक ब्रैंड में बदल दिया, फैक्ट्रियां लगा लीं और अब माया का टर्नओवर इतना हो चुका है कि वह पांच साल में मल्टीनेशनल कंपनियों को भारतभूमि से भगा देने का उद्घोष करते देखते हुए रेस्त्रां और स्कूल खोलने जा रहे हैं।
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बाबा की आध्यात्मिक पहेली

The story of nationalist Baba Ramdev, from suits-salwar to nationalist burgers
जब आप खुद बर्गर से लेकर ज्ञान और गोमूत्र तक का व्यापार करते हुए खुद मल्टीनेशनल होना चाहते हैं फिर मल्टीनेशनल कंपनियों को भगाना क्यों चाहते हैं यह एक आध्यात्मिक पहेली है।

विदेशी कंपनियां ऐसा क्या कर रहीं हैं जो देशी वाली नहीं करतीं? आखिर देशी कंपनियों की मिलावटखोरी और मक्कारी ने ही बाबा रामदेव को बनाया है। उन्होंने कम मिलावट और कुछ सस्ता से ही तो उपभोक्ताओं में विश्वसनीयता बनाई है

तड़का योग

माया की यह चमत्कारिक तरक्की एक नए तरह के योग के अविष्कार के कारण संभव हो पाई है जिसे तड़का-योग कहा जाता है। राजनीति में मोदी युग से पहले तड़का भ्रष्टाचार का था जिसे रोमांचकारी बनाने के लिए वे दिल्ली के रामलीला मैदान में सलवार सूट पहने दिखाई दिए थे।
 

पीएम मोदी को राष्ट्रऋषि की उपाधि

The story of nationalist Baba Ramdev, from suits-salwar to nationalist burgers
इस बार तड़का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्रऋषि की उपाधि देकर उन्होंने आध्यात्मिक परंपरा में लगाया है। ऋषियों ने वसुधैव कुटुंबकम माना था, उनका चिंतन एक देश की हदबंदी में नहीं समाता था, वे समाज के बाहर जंगल में गए ही इसलिए थे कि ब्रह्मांड के साथ अपनी एकरूपता को महसूस कर सकें।

ऐसी ही राजर्षि की उपाधि बनारस के पंडितों ने एक और प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को दी थी जो उनके पिछड़ों के लिए आरक्षण का कानून लागू करते ही गंगा में गिरने वाले किसी गंदे नाले में बह गई। इस योग में अपनी दृष्टि चालू राजनीतिक मुहावरों पर स्थिर रखनी पड़ती है और उनका इस्तेमाल अपने व्यापार को दूसरों से पवित्र और महान बताने के लिए करना होता है।

हिन्दू राष्ट्र और गोमाता की हवा

बाकी चीजें गोल कर दी जाती हैं। जैसे इन दिनों हिंदू, राष्ट्र, गोमाता, सेना की हवा है तो व्यापार मुनाफे के लिए नहीं, इन सबकी सेवा के लिए किया जाएगा। बाबा गर्व से बता रहे हैं कि वह सैनिक स्कूल खोलने वाले हैं जिसमें देश की रक्षा में शहीद हुए सैनिकों के बच्चों को मुफ़्त शिक्षा दी जाएगी, इसका जिक्र नहीं होगा कि जीवित सैनिकों और सामान्य लोगों के बच्चों को शिक्षा किस भाव मिलेगी।

बाबा अपने व्यापार के विस्तार करके राष्ट्र को आर्थिक रूप से सबल बनाना चाहते हैं और उसके मुनाफे का एक हिस्सा गो-संवर्धन में खर्च किया जाएगा। अब जबकि बैलों का इस्तेमाल खेती में होना बंद हो चुका है, उनका क्या किया जाएगा इसका जिक्र नहीं होगा।

प्रतीकात्मक राजनीति

The story of nationalist Baba Ramdev, from suits-salwar to nationalist burgers
अगर बाकियों को पॉलीथिन खाने के लिए छोड़कर सिर्फ सौ पचास गायों का संवर्धन हुआ तो पुष्ट बैलों का इस्तेमाल गोरक्षकों के आगे नुमाइश के लिए किया जा सकता है जो प्रतीकात्मक राजनीति में बड़े काम आएगा। इस व्यापार में सबसे काम का वह हिंदू कलर का भजन है जो बाबा ने उपाधि देते समय प्रधानमंत्री के आगे गाकर सुनाया।

उसके बोल थे, "भगवान आर्यों को ऐसी लगन लगा दे। देश और धर्म की खातिर मिटना इन्हें सिखा दे।" यह नहीं बताया कि अनार्यों, द्रविड़ों, म्लेच्छों के साथ घुलमिल कर कोई और नस्ल बन चुकी भारत की विशाल आबादी के साथ भगवान आखिर क्या करें कि उनमें ऐसी लगन पैदा हो।
 
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