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आजादी दिलाने वाले बोले- बदल गए राष्ट्र और राष्ट्रवाद के मायने, पहना संकीर्णता का चोला

Wed, 15 Aug 2018 12:34 PM IST
हरेन्द्र, अमर उजाला, नई दिल्ली
हरेन्द्र, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 15 Aug 2018 12:34 PM IST
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 The people who gave independence, the changed nation and the meaning of nationalism

स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों कहना है कि आजादी के 71 साल बाद लोगों के लिए राष्ट्र और राष्ट्रवाद के मायने बदल गए हैं। उनका कहना है कि उस वक्त एक ही लक्ष्य था मुल्क की आजादी। लेकिन अब देश को बिगड़ती कानून व्यवस्था और आतंकवाद जैसी समस्याओं से जूझना पड़ रहा है और यह स्थिति देश के लिए घातक है। उनका मानना है कि आज अधिकारों का ढांचा तो हमारे पास है, लेकिन उसे पाने के लिए संसाधन जुटाना मुश्किल हो रहा है। 

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आजादी का मतलब बंधनों से मुक्ति
10 अप्रैल 2018 को 100 वर्ष पूरे कर चुके स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एचएस डोरेस्वामी ने आजादी के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान तकरीबन 14 महीने बेंगलुरु की सेंट्रल जेल में बिताए। वह बताते हैं कि उनके लिए आजादी का मतलब है सभी बंधनों से मु्क्ति। वह बताते हैं कि जितनी आजादी आज है उतनी पहले कभी नहीं थी। वह याद करते हुए बताते हैं कि उस समय न तो बोलने की आजादी थी और न ही एक जगह पर एकत्र होने की। 
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आजादी के बाद कानून-व्यवस्था खराब 
वह बताते हैं कि उस समय एक ही लक्ष्य सामने था देश की आजादी। लेकिन आजादी के बाद आज देश को तमाम दूसरी समस्या से जूझना पड़ रहा है। आज देश में आतंकवाद, भ्रष्टाचार और बिगड़ती कानून व्यवस्था का बोलबाला है। आज लोगों का ईमान खत्म हो गया है, करोड़पति देश के प्रतिनिधि बन गए हैं। देश के हालात खराब होते जा रहे हैं और इन्हें नहीं रोका गया तो देश गुडों-बदमाशों के हाथों में चला जाएगा। हमारी आजादी व्यर्थ चली जाएगी और सालों की मेहनत पर पानी फिर जाएगा। 
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बदलाव की शक्ति लानी होगी 
डोरेस्वामी कहते हैं कि पिछले 9 दशकों में उन्होंने देश में आए कई उतार-चढ़ाव देखे हैं और वे लगातार सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को पूरी सक्रियता से उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि युवाओं को उठना चाहिए और देश को मुश्किलों में डालने वाले मुद्दों की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए। युवाओं को अपनी सोच बदलनी होगी कि हर चीज के लिए सरकार ही ज़िम्मेदार है और बदलाव की शक्ति के साथ खुद अपनी जिम्मेदारी को भी समझना होगा। भ्रष्टाचार पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फैंकने के लिए छोटे लोगों की बजाय 'बड़ी मछलियां' पकड़ी जानी चाहिए।

बदले राष्ट्र और राष्ट्रवाद के मायने
वहीं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और दिल्ली यूनिवसिर्टी से रिटायर हो चुके 90 वर्षीय प्रोफेसर बीबी तायल बताते हैं कि आजादी मिलने के बाद तमाम मुद्दे बदल गए हैं लेकिन उस वक्त बस एक ही धुन सवार थी कि अंग्रेजों को भारत से भगाओ। उस समय राष्ट्र और राष्ट्रवाद महत्वपूर्ण था, लेकिन अब इसके मायने बदल गए हैं। आज लोगों में से राष्ट्रवाद और राष्ट्र लोप हो गया है। मानवता के ऊपर राष्ट्रवाद हावी हो गया है, आज राष्ट्रवाद संकीर्णता का चोला पहन कर आ खड़ा हुआ है। ये खतरा ऐसा है जो देश या राष्ट्र के नाम पर एक भ्रमित करने वाली और छद्म संकल्पना को सच की तरह प्रचारित करता है। वह कहते हैं कि उस समय राष्ट्रवाद की परिकल्पना थी कि भारत के लिए ऐसा राष्ट्रवाद चाहते थे जो न केवल भयमुक्त हो बल्कि जीवंत और सजीव भी हो।


अधिकारों का ढांचा है संसाधन नहीं
वह कहते हैं कि हमारे संविधान में हमें तमाम अधिकार मिले हुए, लेकिन उनका क्रियान्वयन हमारे हाथों में नहीं है। अधिकारों का ढांचा तो हमारे पास है, लेकिन उसे पाने के लिए संसाधन जुटाना अहम सवाल है। संविधान को पूर्णरूप से लागू करने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति और संसाधन की जरूरत है, जो आज हमारे पास नहीं है। वह कहते हैं कि लोकतांत्रिक देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानव अधिकारों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि यह सभी स्वतंत्रताओं की जननी है। यह अधिकार समाज व देश के विकास में भी सहायक है, इन अधिकारों का प्रयोग हम सभी को करना चाहिए।

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