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क्या ट्विटर इंडिया के हेड को गिरफ्तार करने का प्लान था, केवल नोटिस देने नहीं गई थी आतंकियों से निपटने वाली 'स्पेशल सेल'

Tue, 25 May 2021 03:05 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 25 May 2021 03:05 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और साइबर मामलों के विशेषज्ञ पवन दुग्गल कहते हैं, इस साल 25 फरवरी के बाद पुलिस को ऐसी पावर मिल गई है कि वह ट्विटर इंडिया के दफ्तर में रेड, छापेमारी या नोटिस देने के लिए जा सकती है। उसके हाथ में एक मजबूत कानून है, जिसकी मदद से सामने वाले के खिलाफ फौजदारी का मामला भी दर्ज हो सकता है...

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The official statement by the Delhi Police said that special cell gone for to serve notice to Twitter India as part of a routine process
ट्विटर इंडिया के ऑफिस पर दिल्ली पुलिस - फोटो : Agency

विस्तार

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल, जो आतंकियों, गैंगस्टर और अन्य बदमाशों से जुड़े मामले देखती है, उसे सोशल मीडिया की दुनिया के सबसे बड़े प्लेटफॉर्म 'ट्विटर' इंडिया के दफ्तरों पर रेड करने के लिए भेजा गया। जब मामला गर्माने लगा तो दिल्ली पुलिस का आधिकारिक बयान आता है। इसमें कहा गया कि यह टीम एक रूटीन प्रक्रिया के तहत ट्विटर इंडिया को नोटिस देने के लिए उनके दफ्तर में पहुंची थी। यह अलग बात है कि सोशल मीडिया या साइबर क्राइम से जुड़े मामले देखने के लिए दिल्ली पुलिस में अलग से साइबर क्राइम यूनिट है।

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पिछले दिनों किसान आंदोलन के दौरान टूलकिट केस की जांच भी साइबर क्राइम यूनिट ने की थी। अब सवाल उठता है कि ट्विटर के दफ्तर में दिल्ली पुलिस की 'स्पेशल सेल' की डरावनी चाल के पीछे क्या राज है। मात्र एक नोटिस थमाने के लिए आतंकियों से निपटने वाली टीम को ट्विटर इंडिया के दफ्तर में भेज दिया गया। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और साइबर मामलों के विशेषज्ञ पवन दुग्गल कहते हैं, इस साल 25 फरवरी के बाद पुलिस को ऐसी पावर मिल गई है कि वह ट्विटर इंडिया के दफ्तर में रेड, छापेमारी या नोटिस देने के लिए जा सकती है। उसके हाथ में एक मजबूत कानून है, जिसकी मदद से सामने वाले के खिलाफ फौजदारी का मामला भी दर्ज हो सकता है। फौजदारी से जुड़े मामले में पुलिस द्वारा किसी व्यक्ति को गिरफ्तार भी किया जा सकता है।

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बता दें कि सोमवार की देर शाम दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल, ट्विटर इंडिया के दफ्तरों में पहुंची थी। दिल्ली के लाडो सराय और गुड़गांव के गोल्फ कोर्स रोड स्थित दफ्तरों पर रेड की गई। इसका मकसद था, ट्विटर ने भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा के ट्वीट पर 'मैनीपुलेटेड मीडिया' का लेबल क्यों लगाया है। स्पेशल सेल वो राज जानना चाहती थी, जिसके आधार पर ट्विटर को यह कदम उठाना पड़ा। ट्विटर को आखिर 'टूलकिट' के बारे में क्या कुछ मालूम है। मीडिया में जब स्पेशल सेल की रेड की खबरें चलने लगीं तो माहौल गरमा गया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर तरह तरह की प्रतिक्रियाएं आने लगीं।

दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता चिन्मय बिस्वाल को कहना पड़ा, स्पेशल सेल की टीम एक रूटीन प्रक्रिया के तहत ट्विटर इंडिया के दफ्तर पहुंची थी। वहां उसे एक नोटिस देना था। पुलिस को यह भी मालूम करना था कि नोटिस देने के लिए सही व्यक्ति कौन है। हालांकि इससे पहले भी ट्विटर इंडिया और दिल्ली पुलिस के बीच पत्राचार हुआ है। बिस्वाल के मुताबिक, ट्विटर इंडिया के एमडी द्वारा दिया गया जवाब बेहद अस्पष्ट और उलझा हुआ था। ट्विटर के पास कोई ऐसी खास जानकारी है, जो हमारे पास नहीं है। पुलिस यह जानना चाहती है कि क्या उसी जानकारी के आधार पर संबित पात्रा के ट्वीट को इस तरह से क्लासीफाई किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और साइबर मामलों के विशेषज्ञ पवन दुग्गल कहते हैं, दरअसल अब कानून बदल गया है। 25 फरवरी 2021 से जो आईटी नियम लागू हुए हैं, उनके तहत पुलिस की पावर बढ़ गई है। पहले इस तरह के मामलों में सामने वाली पार्टी जवाब दे तो ठीक, न दे तो ठीक, वाली स्थिति थी। अब पुलिस के नोटिस और सवालों का जवाब देना अनिवार्य है। अगर ऐसा नहीं होता है तो पुलिस, फौजदारी का केस दर्ज कर सकती है। पुलिस, ट्विटर इंडिया के दफ्तर में जाकर पूछताछ कर सकती है। यदि केस से जुड़ी कोई सूचना नहीं मिलती है तो पुलिस के हाथ में फौजदारी का मुकदमा दर्ज करने की पावर है।

हालांकि पुलिस को इस तरह की पावर देने से इसके दुरुपयोग की संभावना बनी रहती है। मौजूदा समय में आईटी नियमों में 'चेक एंड बैलेंस' नहीं हैं। इसकी कानूनी संवैधानिकता को चैलेंज भी किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बाबत अभी आदेश जारी नहीं किया है। ट्विटर इंडिया को ईमेल के जरिए भी नोटिस भेज सकते थे। पूर्व आईपीएस अधिकारी यशोवर्धन आजाद कहते हैं, अधिकांश जगहों पर वर्क फ्रॉम होम चल रहा है। भाजपा व कांग्रेस के बीच की लड़ाई है। ऐसे में ट्विटर इंडिया को लेकर किसी बहस की जरूरत ही नहीं है। दिल्ली पुलिस के पास इस मामले में ऐसा कोई ठोस कारण नहीं था कि उसे ट्विटर इंडिया के दफ्तर में जाना पड़े। ऐसे मामले में केवल समय की बर्बादी होती है। राजनीतिक लड़ाई में बेवजह दूसरों को परेशान किया जा रहा है।

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