केंद्र के इस कानून से 10 लाख डॉक्टरों पर पड़ेगा असर, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की बिगड़ सकती है हालत
- आयुष के डॉक्टर नहीं लिख सकेंगे एलोपैथी की दवाएं, इससे ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ सकता है असर
- यूपीए सरकार ने एक ट्रेनिंग देकर इन्हें भी एलोपैथी दवाएं लिखने की अनुमति देकर डॉक्टरों की कमी से निबटने की बनाई थी योजना
- WHO के एक हजार मरीजों पर एक डॉक्टर से आगे 1.34:1000 अनुपात तक पहुंच चुका है देश
विस्तार
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रति एक हजार की आबादी पर एक प्रशिक्षित डॉक्टर होना चाहिए। केंद्र सरकार की जानकारी के मुताबिक 31 मार्च 2017 तक देश में 10,22,859 डॉक्टर मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया या अन्य संगठनों से रजिस्टर्ड थे। कुछ डॉक्टरों के गैर-चिकित्सकीय कार्यों में भागीदारी के बाद बचे डॉक्टरों और मरीजों में अनुपात 0.77:1000 था। लेकिन अनेक राज्यों में डॉक्टरों के रिटायरमेंट की अवधि बढ़ा दिए जाने और नए मेडिकल छात्रों के आने के बाद कुल कार्यरत डॉक्टरों की संख्या में वृद्धि हुई है। माना जा रहा है कि भारत ने विश्व स्वास्थ्य संगठन का आदर्श स्तर प्राप्त कर लिया है और अब इसके मरीजों और डॉक्टरों का अनुपात बढ़कर 1.34:1000 तक पहुंच चुका है।
लिख रहे थे एलोपैथिक दवाएं
लेकिन इस स्तर के बाद भी भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था की कड़वी सच्चाई यह है कि ज्यादातर डॉक्टर बड़े शहरों में ही काम करना चाहते हैं और ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति बहुत खराब है। लोगों को प्राथमिक चिकित्सा के लिए भी एक प्रशिक्षित डॉक्टर नहीं मिल पाते। स्वास्थ्य व्यवस्था की यही खामी भारतीय चिकित्सा पद्धतियों में प्रशिक्षित लाखों चिकित्सक पूरी कर रहे थे। आयुष (आयुर्वेद, योग, प्राकॉतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्धा, सोवा-रिग्पा, होम्योपैथी इत्यादि) विधाओं में प्रशिक्षित ये डॉक्टर अपनी चिकित्सा पद्धति के साथ-साथ एलोपैथी दवाएं भी लिख देते थे, जिससे मरीजों को तत्काल आराम पाने में मदद मिलती थी।
आयुष डॉक्टर कर रहे हैं इस आदेश का विरोध
लेकिन केंद्र सरकार के पास किये गए नए कानून (द नेशनल कमीशन फॉर इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन, 2020, The National Commission for Indian System Of Medicine) के बाद अब ये चिकित्सक एलोपैथी की दवाएं नहीं लिख सकेंगे। इससे इन चिकित्सकों के व्यवसाय पर असर पड़ेगा, साथ ही लाखों मरीजों को सस्ता, सुलभ चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाएगी। आयुष डॉक्टर इसका विरोध कर रहे हैं। हालांकि, सरकार का तर्क है कि इससे 'झोलाछाप' डॉक्टरों से लोगों को बचाया जा सकेगा।
देश में 10 लाख आयुष डॉक्टर
एग्जामिनिंग बॉडी फॉर पैरामेडिकल ट्रेनिंग फॉर भारतीय चिकित्सा, दिल्ली के चेयरमैन डॉ. प्रदीप अग्रवाल ने अमर उजाला को बताया कि इस समय देश में लगभग 10 लाख आयुष डॉक्टर काम कर रहे हैं। केंद्र या राज्य के स्तर पर कोई विशेष कानून न होेने से इस विशाल प्रशिक्षित वर्ग का उचित उपयोग नहीं किया जा सका था। यूपीए सरकार ने देश में डॉक्टरों की कमी को दूर करने के लिए इस वर्ग को एक ट्रेनिंग के बाद प्राथमिक स्तर की चिकित्सा देने के लिए अनुमति देने की योजना बनाई थी। अगर उस योजना को अमल में लाया जाता, तो इससे देश में आधुनिक चिकित्सा पद्धति से ट्रेंड डॉक्टरों की बड़ी जरूरत को आसानी से पूरा किया जा सकता था। लेकिन बदले कानून में अब आयुष डॉक्टर लोगों को एलोपैथी की दवाएं नहीं लिख सकेंगे। इससे गरीब वर्ग को सस्ता-सुलभ इलाज नहीं मिल पाएगा।
केंद्र की योजना में भी अंतर्विरोध
एक तरफ तो सरकार भारतीय चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा देने का काम कर रही है। वहीं, दूसरी ओर इन डॉक्टरों को एलोपैथी की दवाएं लिखने की अनुमति न देने से इनकी गुणवत्ता कम करने का काम हो रहा है। यह काम ऐसे समय में हो रहा है कि जब सरकार डॉक्टरों की कमी से जूझ रही है और इसकी पूर्ति के लिए अनेक छोटी अवधि के कोर्स कराने की इजाजत देने की योजना पर विचार किया जा रहा है। अगर यही प्रयोग इन आयुष डॉक्टरों के साथ किया जाता तो ज्यादा उच्च गुणवत्ता के डॉक्टर सुलभ कराए जा सकते हैं।
नए कानून में क्या
आधुनिक चिकित्सा पद्धति एलोपैथी के एमबीबीएस डॉक्टरों के अलावा भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के डॉक्टरों के लिए मार्च 1995 में अलग विभाग बनाया गया था। 9 नवंबर 2014 को इसका अलग मंत्रालय स्थापित कर दिया गया। इसके अंतर्गत BAMS, BUMS, BSMS के सैकड़ों नए कालेज और हजारों नई सीटों पर प्रशिक्षण दिया जाना हैै। वर्तमान में भारतीय चिकित्सा पद्धतियों से जुड़े 297 से अधिक कालेज कार्य कर रहे हैं।
भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के कॉलेजों के नियमन के लिए इस समय सेंट्रल काउंसिल ऑफ इंडियन मेडिकल सिस्टम से संचालित किया जाता है। बदले नियमों के मुताबिक अब इन्हें नियमित करने के लिए एडवाइजरी काउंसिल फॉर इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन काम करेगा। इसके नीचे नेशनल मेडिकल कमीशन फॉर इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन और इसके नीचे पांच बोर्ड गठित किए जाएंगे। विशेषज्ञों की चिंता है कि इससे लालफीताशाही बढ़ेगी जिसे सरकार कम करने की बात कह रही है।
इन सबसे शक्तिशाली बोर्ड्स में ज्यादातर सदस्यों का चयन सरकार की मर्जी से होगा। चिंता है कि इस तरह डॉक्टरों के हितों की आवाज उठाने वाले लोग यहां तक नहीं पहुंच सकेंगे, जिससे उनके हितों के अनुसार नियमन नहीं किया जा सकेगा।