ऐसी मशीन जिसकी जरूरत कभी ना पड़े तो ही ठीक, जानें वेंटिलेटर मशीन का पूरा इतिहास

रिसर्च टीम, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 08 Apr 2020 07:25 PM IST
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Ventilator - फोटो : Social Media

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दुनिया के 200 से ज्यादा देश चीन से फैले कोरोना वायरस की चपेट में हैं। कोरोना से दुनिया में लाखों लोग संक्रमित हैं और हजारों की संख्या में मौत का आंकड़ा पहुंच चुका है। अमेरिका, इटली, फ्रांस, स्पेन समेत कई देश चीन के मुकाबले ज्यादा प्रभावित है। कोरोना से संक्रमित लोगों को सांस लेने में दिक्कत हो रही है, जिसकी वजह से मौजूदा समय में वेंटिलेटर सबके लिए प्राथमिकता बन चुका है। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि स्वास्थ्य कर्मचारी वेंटिलेटर का इस्तेमाल मरीज को जिंदा रखने के लिए कर रहे हैं और इस वक्त इतनी महत्वपूर्ण मशीन की सप्लाई में कमी आ रही है। मौजूदा समय में वेंटिलेटर के इस्तेमाल जरूरी हो गया लेकिन क्या आप जानते हैं कि सबसे पहली बार वेंटिलेटर कब इस्तेमाल किया गया था। आइए जानते हैं वेंटिलेटर का इतिहास...
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वेंटिलेटर का इस्तेमाल
डॉक्टर के लिए मरीज को वेंटिलेटर का सहारा देना मरीज को ठीक करने का अंतिम प्रयास होता है। वेंटिलेटर की मदद से मरीज को ऑक्सीजन पहुंचाने का काम किया जाता है। मरीज को जब सांस लेने में दिक्कत होती है तब वेंटिलेटर के सहारे मरीज को सांस के प्रवाह को आसान किया जाता है। वहीं मरीज के नर्वस सिस्टम तक दवाई पहुंचाने में भी मददगार साबित होता है।
वेंटिलेटर का इतिहास
वैसे तो बाइबल के पन्नों में आर्टिफिशियल वेंटिलेटर के बारे में जानकारी दी गई है लेकिन औपचारिक तौर पर किसी मरीज की सांस चलते रहने के लिए एक मशीन का प्रयोग 18वीं शताब्दी के समय हुआ था। जिसमें किसी अन्य व्यक्ति की सहायता से मरीज की सांस वापस लाने में मदद की जाती थी। इसे पॉजिटिव-प्रेशर वेंटिलेटर का नाम दिया गया। इसके अलावा 1830 में एक स्कॉटिश डॉक्टर ने एक वायुरोधक (एयरटाइड) डब्बा बनाया जिसके तहत किसी डूबे हुए नाविक में हवा को लयबद्ध तरीके से पंप किया जाता था। इसे निगेटिव-प्रेशर वेंटिलेटर का नाम दिया गया। इसमें मरीज के नर्वस सिस्टम में हवा देने की बजाय मरीज के शरीर के बाहर की हवा को बदलना होता था। 

19वीं सदी में वीनस के एक डॉक्टर ने एक नया ताजगी पैदा करने वाला डब्बे का आविष्कार किया, जिसका सफलतापूर्वक इस्तेमाल भी किया जाने लगा। लेकिन बाद में प्रसिद्ध आविष्कारक एलेक्जेंडर ग्राह्म बेल ने वैक्यूम जैकेट बनाया, जो काफी लोकप्रिय हुआ। 

20वीं सदी की शुरुआत में आयरन लंग नाम से दुनियाभर में प्रसिद्ध वेंटिलेशन डिवाइस का इस्तेमाल हुआ, ये मशीन भी निगेटिव प्रेशर वेंटिलेटर तकनीकी पर काम करती थी। 1920 में पोलियो से पीड़ित बच्चों के लिए आयरन लंग का इस्तेमाल होने लगा। हालांकि पोलियो को खत्म करने की दवाई का आविष्कार 1950 के अंत तक हो गया था लेकिन इस दौरान पोलियो से साल दर साल कई बच्चों की मौत होने लगी। सिर्फ साल 1952 में पोलियो से तीन हजार बच्चों की मौत हुई थी। 

पुलमोटर का आविष्कार
साल 1907 में एक जर्मन व्यापारी, एक आविष्कारक जोहान हेनरिच ड्रेगर और उसके बेटे बर्नहार्ड ने मिलकर पुलमोटर मशीन का इस्तेमाल किया। ये मशीन पॉजिटिव-प्रेशर वेंटिलेटर तकनीकी पर काम करती थी। एक तरह का ट्रांसपोर्टेबल डिवाइस थी जो एक मास्क के जरिए ऑक्सीजन का प्रवाह करती थी।  

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बनी मशीन
दूसरे विश्व यूद्ध के समय लड़ रहे पायलट्स के लिए एक तरह की वेंटिलेटर मशीन को बनाया गया जो उन्हें ज्यादा ऊंचाई पर आक्सीजन की सप्लाई करते थे। साल 1950 के बीच अमेरिकी सेना के पूर्व पायलट फॉरेस्ट बर्ड ने बर्ड मास्क 7 को ईजाद किया। कुछ लोग मास्क 7 को मॉर्डन मेडिकल रेस्पिरेटर मानते थे। 

कुछ समय बाद एक ऐसी वेंटिलेशन तकनीकी की शुरुआत हुई जिसमें मास्क की जगह एक ट्यूब के जरिए मरीज के फेफड़ों में हवा का प्रवाह किया जाने लगा। वेंटिलेटर के डिजाइन में लगातार बदलाव और डॉक्टर के ज्ञान के तालमेल से मौजूदा समय में वेंटिलेटर के मॉर्डन डिवाइस का इस्तेमाल किया जा रहा है। हालांकि आज के समय में वेंटिलेटर की जितनी जरूरत दिखाई पड़ती है उतनी इसके आविष्कार पर नहीं थी।  
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