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सियासत की बाजी: तमिलनाडु में हुआ विरासत की जंग का भी हिसाब
Tue, 04 May 2021 10:00 AM IST
Kuldeep Singh
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: Kuldeep Singh
Updated Tue, 04 May 2021 10:00 AM IST
सार
- पलानीस्वामी के नेतृत्व में अन्नाद्रमुक भले ही हार गई, मगर विपरीत हालात में उम्मीदों से बेहतर प्रदर्शन ने पार्टी में उनके कद को अन्य नेताओं की तुलना में काफी बड़ा कर दिया
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के पलानीस्वामी (फाइल फोटो)
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजों ने सरकार के साथ जयललिता और करुणानिधि की विरासत का भी फैसला कर दिया है। द्रमुक को जीत ने जहां करुणा को विरासत पर एमके स्टालिन के नाम की अंतिम मुहर लगाई। वहीं उम्मीदों से बेहतर प्रदर्शन ने हार के बावजूद अन्नाद्रमुक में जया की विरासत पर पलानीस्वामी की दावेदारी पर एक तरह से सहमति की मुहर लगा दी है।
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हार कर भी जया की विरासत हासिल करने के नजदीक पहुंचे पलानीस्वामी
पलानीस्वामी के नेतृत्व में अन्नाद्रमुक भले ही हार गई, मगर विपरीत हालात में उम्मीदों से बेहतर प्रदर्शन ने पार्टी में उनके कद को अन्य नेताओं की तुलना में काफी बड़ा कर दिया है। पलानीस्वामी के नेतृत्व में पार्टी अपने दम पर 64 सीटें जीतने में कामयाब हुई है।
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बेहद खास है प्रदर्शन
नतीजों के बाद पलानीस्वामी के नेतृत्व क्षमता की खूब चर्चा है। दरअसल, लोकसभा चुनाव में अन्नाद्रमुक के पूरी तरह साफ हो जाने के बाद राजनीतिक विशेषज्ञ मान रहे थे कि पार्टी विधानसभा चुनाव में अन्नाद्रमुक प्रतीकात्मक तौर पर लड़ रही है। वैसे भी जयललिता की मौत के बाद पलानीस्वामी का ज्यादातर समय पार्टी में अंर्तद्वंद को थामने में बीता।
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राज्य की तस्वीर हुई साफ
राज्य दशकों तक करुणा बनाम जया की दो ध्रुवीय राजनीति की जद में रहा। लगभग एक ही समय में दोनों नेताओं के दिवंगत होने के बाद इन दलों में विरासत की जंग के साथ ही नई ताकत बनने का भी सिलसिला चला। अभिनेता रजनीकांत, कमल हासन ने नई पार्टी की घोषणा की। भाजपा ने भी इस शून्य को भरने के लिए जोर आजमाइश की। हालांकि विधानसभा के नतीजे ने साफ कर दिया कि फिलहाल तीसरी ताकत का कोई भविष्य नहीं है।
भाजपा-अन्नाद्रमुक में पनप सकते हैं मतभेद
नतीजे आने के बाद चर्चा है कि अन्नाद्रमुक को भाजपा का साथ लेने का नुकसान झेलना पड़ा। अगर यह गठबंधन नहीं हुआ होता तो अन्नाद्रमुक का प्रदर्शन और बेहतर होता। राज्य के लोग पीएम मोदी और भाजपा के बेहद खिलाफ थे। इसका नुकसान अन्नाद्रमुक को उठाना पड़ा।