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उपचुनाव: नोटबंदी के बीच सरकार का लिटमस टेस्ट

Fri, 18 Nov 2016 04:47 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, एजेंसी भोपाल/कोलकाता
ब्यूरो/अमर उजाला, एजेंसी भोपाल/कोलकाता Updated Fri, 18 Nov 2016 04:47 AM IST
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the government litmus test in between By-elections
नोटबंदी से देशभर में नकदी संकट के बीच तीन लोकसभा और पांच विधानसभा सीटों का उपचुनाव न सिर्फ फीका पड़ गया है बल्कि 500 और 1000 रुपये के नोटों का चलन बंद होने के बाद इसे मोदी सरकार का लिटमेस टेस्ट भी माना जा रहा है। इन सभी सीटों के लिए 19 नवंबर को वोट डाले जाएंगे।
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मध्य प्रदेश के शहडोल, पश्चिम बंगाल की कूचबिहार और तमलुक लोकसभा सीटों के अलावा छह विधानसभा सीटों पर चुनाव का उत्साह फीका है। नोटबंदी का फैसला इन चुनावों पर भारी पड़ रहा है। न तो कई चुनाव प्रचार का शोर सुनने को मिल रहा है और न ही किसी पार्टी की बड़ी रैली हो रही है। बंगाल की दो लोकसभा सीटों व एक विधानसभा सीट पर भी उपचुनाव होने हैं। बावजूद इसके मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की स्टार प्रचारक ममता बनर्जी चुनाव अभियान का जिम्मा दूसरे नेताओं को सौंप कर नोटबंदी के खिलाफ आंदोलन बुलंद करने में जुटी हैं। राज्य में कूचबिहार (आरक्षित) और पूर्व मेदिनीपुर जिले की तमलुक लोकसभा सीट के अलावा मंटेश्वर विधानसभा सीट के लिए शनिवार को वोट पड़ेंगे। इनके लिए प्रचार अभियान तो आज थम गया। लेकिन किसी चुनाव क्षेत्र में न तो किसी पार्टी ने कोई बड़ी रैली और न ही मीडिया में इन्हें कवरेज भी मिला। 
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मध्य प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा दोनों सीटें आरक्षित हैं और इन्हें इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि यदि भाजपा इन जगहों से चुनाव हारती है तो इसे मोदी सरकार के नोटबंदी फैसले का खमियाजा समझा जाएगा। हालांकि भाजपा के एक नेता दोनों सीटों पर पार्टी की जीत सुनिश्चित मान रही है लेकिन कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव का कहना है कि इस तानाशाही फैसले से लोगों को गंभीर समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। आम आदमी और किसान कतार में खड़े हैं। लोग इस फैसले से बहुत नाराज हैं और मुझे पूरा विश्वास है कि वे नोटबंदी के मुद्दे पर ही भाजपा के खिलाफ वोट देंगे।   
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भाजपा नेता और प्रदेश सिविल सप्लाई कॉर्पोरेशन लिमिटेड के अध्यक्ष डॉ. हितेष बाजपेयी कहते हैं कि इस आदिवासी बहुल इलाके में नोटबंदी कोई मुद्दा नहीं है। वे भूमि लीज अधिकार हासिल करने जैसे मुद्दों पर ज्यादा गंभीर हैं, वे अपने मुख्य भोजन चावल और ज्वार से ही खुश हैं। पार्टी इससे पहले भी शहडोल सीट दो लाख के अंतर से जीत चुकी है और मुझे पूरा विश्वास है कि हम डेढ़ लाख से अधिक वोटों के अंतर से जीतेंगे।  

उधर, पश्चिम बंगाल के कूचबिहार में तृणमूल कांग्रेस सांसद रेणुका सिन्हा की मौत की वजह से वहां उपचुनाव हो रहे हैं जबकि तमलुक के तृणमूल सांसद शुभेंदु अधिकारी ने बीते विधानसभा चुनावों में जीतने के बाद इस्तीफा दे दिया था। इससे वह सीट खाली हो गई थी। मंटेश्वर के तृणमूल विधायक सजल पांजा के असामयिक निधन की वजह से वहां उपचुनाव हो रहा है।

 असम में तो भाजपा की साझा सरकार के मुख्यमंत्री बने सर्वानंद सोनोवाल की लखीमपुर संसदीय सीट पर उपचुनाव के बावजूद राज्य में चुनाव प्रचार के नाम पर सन्नाटा छाया रहा। सोनोवाल ने मुख्यमंत्री बनने के बाद संसद सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। वहां बैठालांग्सू विधानसभा सीट के लिए भी उपचुनाव होने हैं। अरुणाचल प्रदेश में हायूलियांग विस सीट पर ही उपचुनाव होना है। पूर्व मुख्यमंत्री कालिखो पुल की विधवा देसिंगू पुल के भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरने की वजह से मुकाबला दिलचस्प हो गया है। त्रिुपुरा में विधानसभा की दो सीटों पर होने वाले उपचुनाव में जीत के लिए तृणमूल कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। लेकिन खुद चुनाव प्रचार के लिए जाने का समय नहीं निकाल सकी हैं। 

उपचुनावों पर भारी साबित हो रहा है नोटबंदी का फैसला

the government litmus test in between By-elections
पश्चिम बंगाल समेत पूर्वोत्तर के चार राज्यों की पांच विधानसभा और तीन लोकसभा सीटों के लिए 19 नवंबर को उपचुनाव होने हैं। लेकिन नोटबंदी का फैसला इन चुनावों पर भारी साबित हो रहा है। न तो कहीं चुनाव प्रचार का शोर सुनने को मिल रहा है और न ही किसी पार्टी की बड़ी रैली हो रही है। बंगाल की दो लोकसभा सीटों व एक विधानसभा सीट पर भी उपचुनाव होने हैं। बावजूद इसके मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की स्टार प्रचारक ममता बनर्जी चुनाव अभियान का जिम्मा दूसरे नेताओं को सौंप कर नोटबंदी के खिलाफ आंदोलन बुलंद करने में जुटी हैं।

राज्य में कूचबिहार (आरक्षित) और पूर्व मेदिनीपुर जिले की तमलुक लोकसभा सीट के अलावा मंटेश्वर विधानसभा सीट के लिए शनिवार को वोट पड़ेंगे। इनके लिए प्रचार अभियान तो आज थम गया। लेकिन खासकर बीते आठ नवंबर को नोटबंदी के फैसले के बाद पूरे राज्य में न तो कोई चुनावी शोर सुनने को मिला और न ही किसी पार्टी ने कोई रैली वगैरह की। मीडिया में हर जगह नोटबंदी और इससे संबधित खबरें की ही भरमार है।

कूचबिहार में तृणमूल कांग्रेस सांसद रेणुका सिन्हा की मौत की वजह से वहां उपचुनाव हो रहे हैं जबकि तमलुक के तृणमूल सांसद शुभेंदु अधिकारी ने बीते विधानसभा चुनावों में जीतने के बाद इस्तीफा दे दिया था। इससे वह सीट खाली हो गई थी। मंटेश्वर के तृणमूल विधायक सजल पांजा के असामयिक निधन की वजह से वहां उपचुनाव हो रहा है। 
बंगाल से सटे असम में तो भाजपा की साझा सरकार के मुख्यमंत्री बने सर्वानंद सोनोवाल की लखीमपुर संसदीय सीट पर उपचुनाव के बावजूद राज्य में चुनाव प्रचार के नाम पर सन्नाटा छाया रहा।

सोनोवाल ने मुख्यमंत्री बनने के बाद सांसदी से इस्तीफा दे दिया था। वहां बैठालांग्सू विधानसभा सीट के लिए भी उपचुनाव होने हैं। असम से सटे अरुणाचल प्रदेश में यूं तो हायूलियांग विस सीट पर ही उपचुनाव होना है। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री कालिखो पुल की विधवा देसिंगू पुल के भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरने की वजह से मुकाबला दिलचस्प हो गया है। मालूम हो कि कालिखो पुल ने बीते अगस्त में रहस्यमय हालातों में फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली थी।

त्रिुपुरा में विधानसभा की दो सीटों पर होने वाले उपचुनाव में जीत के लिए तृणमूल कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। वह इन दोनों सीटों को जीत कर पार्टी अपनी स्थिति और मजबूत करना चाहती है। लेकिन पार्टी की स्टार प्रचारक ममता बनर्जी आखिरी दौर में वहां चुनाव प्रचार के लिए जाने का समय नहीं निकाल सकी हैं। पर्यवेक्षकों का कहना है कि नोटबंदी के फैसले के बाद वोटर जहां अपने पुराने नोट बदलने की जुगत में जुटे हैं वहीं नेता इस पर राजनीति करने में। इसी वजह से इस बार  उपचुनावों का शोर पूरी तरह दब गया है।
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