किसान अकेला है और बाजार बहुत क्रूर है, पढ़िए आढ़ती से पूंजीपतियों तक के हाथों में पहुंचे अन्नदाता की कहानी
जींद जिले में ईक्कस गांव के किसान दिनेश कुमार कहते हैं, आढ़ती के साथ किसान का गहरा रिश्ता रहा है। जब कभी जरूरत पड़ी, लाला जी के पास पहुंच जाते। उधार-नकद चलता रहता था। अब जो नया सिस्टम आया है, उसके बारे में ज्यादातर किसानों को मालूम नहीं है...
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हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तरप्रदेश और राजस्थान की बात करें तो किसान के लिए आज तक आढ़ती एक बैंकर की भूमिका निभाते आए हैं। कुछ खराब बातों को छोड़ दें तो आढ़ती और किसान का रिश्ता सदियों से चला रहा है। बेटी के हाथ पीले करने हों, या बालक का दाखिला कराना हो, किसान कभी भी आढ़ती के पास मदद मांगने पहुंच जाता था। आढ़ती भी फौरन मदद कर देता और हिसाब किताब अगली फसल के दौरान हो जाता था।
ऑल इंडिया किसान खेत मजदूर संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष सत्यवान आगे बताते हैं कि आज किसान भ्रम में है। किसान अकेला है और बाजार बहुत क्रूर है। सरकार तो पहले से एमएनसी के पक्ष में खड़ी है। अन्नदाता के नाम पर राजनीति करने वाले भी आज खेत पर जाने से कतराने लगे हैं। उन्हें भी एमएलए और एमपी का पद ज्यादा लुभाता है। बहुत से किसान नेता सोचते हैं कि हम चौपाल या खेत में बैठने की बजाए संसद में विराजमान हों तो ही ठीक है।
अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) के सदस्य सत्यवान का बहुत स्पष्ट तरीके से कहना है कि किसानों के लिए जो नई व्यवस्था तैयार हो रही है, वह बिल्कुल वैसी है, जैसी अधिकांश इलाकों में सरकारी स्कूलों की हालत देखने को मिलती है। पहले तो कोई इक्का-दुक्का सरकारी अधिकारी खेत तक पहुंच जाता था, अब प्राइवेट कंपनी वहां तक जाएंगी। कुछ बातें ऐसी हो सकती हैं कि किसान आढ़ती से दुखी हो, मगर अब आढ़ती की जगह हजार गुना बड़ी कंपनी आ रही हैं। नई व्यवस्था में किसान और कंपनी का रिश्ता ऐसा होगा, जैसा आजादी से पहले लंदन के अंग्रेज और भारतीय के बीच होता था। मंडी और आढ़त व्यवस्था में तो लाला के अलावा सरकार भी फसल की ग्रेडिंग तय कर सकती थी। अगर किसी को लगता है कि अन्याय हो रहा है तो जिला अधिकारी भी मौके पर पहुंच जाते थे। अब सारा काम ग्रेडिंग से लेकर दाम तय करने तक, प्राइवेट कंपनी के हाथ में चला जाएगा।
जींद जिले में ईक्कस गांव के किसान दिनेश कुमार कहते हैं, आढ़ती के साथ किसान का गहरा रिश्ता रहा है। जब कभी जरूरत पड़ी, लाला जी के पास पहुंच जाते। उधार-नकद चलता रहता था। अब जो नया सिस्टम आया है, उसके बारे में ज्यादातर किसानों को मालूम नहीं है। वैसे भी उन्हें बड़ी कंपनी से क्या लेना-देना। देश में जब 86 फीसदी किसान ऐसे हैं, जिनके पास दो- चार हेक्टेयर की खेती है तो वे उसे लेकर कहां सौ दो सौ किलोमीटर दूर जाएंगे। वहां पेमेंट रूक गई तो समझो किसान मारा गया। सत्यवान का भी यही कहना है कि नए सिस्टम में तो किसान के हाथ काट दिए गए हैं। किसान को अब यह अधिकार भी नहीं है कि वह पुलिस के पास चला जाए। एसडीएम या डीएम के पास ही मामला निपटेगा। जो किसान अपने जिले की मंडी तक मुश्किल से पहुंचता है, वह दूसरे शहर या राज्य में कैसे जाएगा। मौजूदा व्यवस्था में अगर किसान के साथ गलत होता है तो वह थाने में जा सकता है। दूसरे किसानों को लेकर आढ़ती के पास पहुंच सकता है।
नई व्यवस्था में किसान के लिए पैसे की अनिश्चितता बनी रहेगी
एआईकेएससीसी के सदस्य और पंजाब के किसान नेता सरदार जगमोहन सिंह कहते हैं कि नई व्यवस्था में किसान के लिए पैसे की अनिश्चितता बनी रहेगी। दो सौ किलोमीटर दूर जाकर जब वह फसल बेचेगा तो पैसे मिलने की चिंता तो सताएगी ही। दूसरा, आढ़ती सिस्टम में भी कुछ कमियां आने लगी थीं। जैसे पंजाब में कई ऐसी खबरें आई हैं कि आढ़ती मनी लॉड्रिंग या जमीन कब्जाने जैसे मामलों में संलिप्त होने लगे हैं। एपीएमसी कानून को तो खत्म ही कर दिया। पहले किसान को यह गारंटी रहती थी कि एक बार जे फॉर्म कट गया तो पेमेंट पक्की है। अब ये जे फॉर्म ही खत्म हो जाएगा तो लड़ाई और ज्यादा मुश्किल हो जाएगी।
किसान खुद क्यों नहीं बाहर निकल रहा है, कौन फैला रहा है भ्रम...
किसान नेता सत्यवान ने माना कि आज किसान भ्रम में है। उसे कोई सही बताने वाला भी नहीं है। हैरानी की बात है कि किसानों की जिंदगी से जुड़े इतने बड़े कानून बन जाएं और किसानों की आवाज तक न निकले। आज जो भी सड़क पर दिख रहा है, वह पार्टी या संगठन का कार्यकर्ता है। पहले किसान नेता खेत खलिहान तक पहुंचकर बात बताते थे। सरकारें हिल जाती थीं। अब सब चाहते हैं कि सोशल मीडिया के संदेश से किसान जंतर मंतर तक पहुंच जाएंगे। गांव की चौपालें आज सूनी पड़ी हैं। वहां जाकर कोई बात क्यों नहीं करता। किसान को बड़े स्तर पर बात समझानी है तो उसके पास जाना होगा। मिट्टी के साथ मिट्टी होना पड़ता है। लेकिन अब माहौल बन रहा है। हम लोग एक दिन में दर्जनों गांवों में जाकर किसानों से मिल रहे हैं। 25 सितंबर को ग्रामीण भारत बंद पूरी तरह सफल होगा।
विवाद होने पर किसान कहां और कैसे मामला निपटाएगा...
एआईकेएससीसी के सदस्य रामपाल जाट कहते हैं कि विवाद निस्तारण के लिए उप जिला कलेक्टर को सुलह के लिए पंच नियुक्त करने, पंचों में अध्यक्ष नियुक्त करने तथा अपना निर्णय पारित करने के लिए अधिकृत किया है। इसके द्वारा भारत सरकार देश को 50 वर्ष पीछे धकेल रही है। पूर्व में उप जिला कलेक्टरों को कई प्रकार के प्रकरणों के लिए क्षेत्राधिकार प्राप्त था, किंतु विधि आयोग की अनुशंसाओं के अनुसार कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के कार्यों का पृथक्करण किया गया है। उसके अनुसार 1973 में नई विधि प्रक्रिया संहिता लाई गई।
उप जिला कलेक्टर और जिला कलेक्टरों को सरकार ने जो प्रशासनिक कार्यों का दायित्व सौंपा हुआ है, उनके लिए भी उनको समयाभाव खलता है। कभी चुनाव, कभी जनगणना जैसे अनेकों अभियानों का दारोमदार इन्ही पर होता है। इनके न्यायालयों में भूमि संबंधी राजस्व प्रकरणों के निस्तारण में पीढियां लग जाती हैं। न्यायपालिका की तुलना में तो वे न्यायलय है ही नहीं। किसानों के मामलों में वे न्याय करेंगे या निर्णय देंगे, यह परिस्थिति ही स्वीकार नहीं करती। सिविल न्यायालय की अधिकारिता को प्रतिबंधित करना, संदेह को पुख्ता करना है। अस्थाई निषेधाज्ञा के आवेदनों का निस्तारण 90 दिन में करने का व्यवहार प्रक्रिया संहिता में प्रावधान है। इसके उपरांत इसकी पालना तो अभी तक नहीं हो पाई फिर किसानों के लिए बने नए कानूनों में उप-जिला कलेक्टर एवं अपीली न्यायलय द्वारा 30-30 दिन में निस्तारण के प्रावधान किए हुए हैं।