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Explainer: हाईकोर्ट का एक फैसला कैसे बना आपातकाल की बड़ी वजह? इसी ने इंदिरा के करियर पर लगाया था सबसे बड़ा दाग

Thu, 25 Jun 2026 06:08 AM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Thu, 25 Jun 2026 06:08 AM IST
सार

देश में 25 जून 1975 को आपातकाल लागू किया गया, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि कई महीने पहले तैयार हो चुकी थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द करने, बढ़ते विपक्षी आंदोलन और राजनीतिक संकट के बीच सरकार ने आपातकाल का फैसला लिया। 21 महीने तक चले इस दौर को भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा माना जाता है। आखिर ऐसा क्या हुआ था कि अदालत के फैसले के सिर्फ 13 दिन बाद इंदिरा को देश में आपातकाल लागू करना पड़ा?

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The Court Ruling That Challenged Indira Gandhi and Set the Stage for the Emergency
12 जून क्यों है अहम? - फोटो : AI

विस्तार

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25 जून 1975 की रात भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे विवादास्पद रातों में से एक मानी जाती है। इसी रात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिफारिश पर देश में आंतरिक आपातकाल लागू किया गया। इसके साथ ही नागरिकों के कई मौलिक अधिकार सीमित कर दिए गए, प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई, हजारों विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया और केंद्र सरकार के हाथों में असाधारण शक्तियां केंद्रित हो गईं।

25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक करीब 21 महीने चले इस दौर को भारतीय लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा माना जाता है। आपातकाल को लेकर आज भी बहस होती है कि यह देश की स्थिरता के लिए जरूरी कदम था या फिर लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सबसे बड़ा प्रहार।

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हालांकि, आपातकाल की कहानी 25 जून की रात से शुरू नहीं होती। इसकी पृष्ठभूमि कई महीनों से तैयार हो रही थी। बढ़ता विपक्षी आंदोलन, आर्थिक चुनौतियां, सरकार विरोधी प्रदर्शन और सबसे बढ़कर 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट का वह ऐतिहासिक फैसला, जिसने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द कर दिया था। इस फैसले ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया और अगले 13 दिनों में घटनाएं इतनी तेजी से बदलीं कि अंततः देश आपातकाल की ओर बढ़ गया।

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ऐसे में सवाल है कि आपातकाल लागू करने के पीछे क्या परिस्थितियां थीं? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी के खिलाफ क्या फैसला दिया था? अदालत के निर्णय के बाद राजनीतिक संकट कैसे गहराया? और आखिर 25 जून 1975 की रात ऐसा क्या हुआ कि देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया? आइए विस्तार से जानते हैं।

The Court Ruling That Challenged Indira Gandhi and Set the Stage for the Emergency
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी - फोटो : अमर उजाला

12 जून 1975 को क्या हुआ? 

12 जून का इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला समझने के लिए 1971 में जाना होगा। जब लोकसभा चुनाव में रायबरेली सीट से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने समाजवादी नेता राज नारायण को हराया था। चुनाव में हार के बाद राज नारायण ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए सरकारी मशीनरी और अधिकारियों का दुरुपयोग किया। उन्होंने दावा किया कि चुनाव प्रचार में सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल किया गया और सरकारी कर्मचारी उनके चुनाव अभियान में शामिल रहे। 

करीब चार साल तक चली सुनवाई के बाद 19 मार्च 1975 को एक अभूतपूर्व घटना हुई। इंदिरा गांधी अदालत में गवाही देने वाली भारत की पहली प्रधानमंत्री बनीं। उन्होंने लगभग पांच घंटे तक न्यायालय में सवालों के जवाब दिए। इसके बाद 12 जून को इहालाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया। इसके 13 दिन बाद 25 जून की रात को देश में आपातकाल लगा। आइये जानते हैं इन 13 दिनों की पूरी कहानी...

12 जून 1975: हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

12 जून 1975 की सुबह इलाहाबाद हाई कोर्ट के कक्ष संख्या 15 में न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने फैसला सुनाया। 238 पृष्ठों के निर्णय में अदालत ने 14 आरोपों में से 12 को खारिज कर दिया, लेकिन दो आरोपों को सही माना।

पहला आरोप
इंदिरा गांधी के निजी सचिव रहे यशपाल कपूर ने औपचारिक रूप से सरकारी पद छोड़ने से पहले ही उनके चुनाव एजेंट के रूप में काम करना शुरू कर दिया था।

दूसरा आरोप
उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों ने चुनावी सभाओं के लिए मंच, बिजली और अन्य व्यवस्थाएं उपलब्ध कराईं। अदालत ने माना कि यह सरकारी मशीनरी का चुनावी उपयोग था, जो जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 का उल्लंघन था।

अदालत ने उनके 1971 के चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया और उन्हें छह वर्षों तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य ठहरा दिया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट में अपील के लिए 20 दिन का समय दिया गया। देश में पहली बार किसी मौजूदा प्रधानमंत्री का चुनाव अदालत ने रद्द किया था। इससे सरकार की वैधता पर सवाल उठने लगे।

13 जून 1975: इस्तीफे की मांग शुरू

फैसले के अगले ही दिन विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति भवन तक मार्च किया और इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग की। उनका तर्क था कि जब चुनाव अवैध घोषित हो चुका है तो नैतिक रूप से प्रधानमंत्री पद पर बने रहना उचित नहीं है। प्रसिद्ध भारतीय इतिहासकार और लेखक रामचंद्र गुहा इंडिया आफ्टर नेहरू में लिखते हैं कि कांग्रेस ने इंदिरा गांधी के समर्थन में व्यापक राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन शुरू कर दिया। हरियाणा के तत्कलीन मुख्यमंत्री बंसीलाल बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों को दिल्ली लाने लगे, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि पार्टी और जनता का बड़ा हिस्सा अब भी प्रधानमंत्री के साथ है। उनके समर्थन में नारे लगाए गए, जबकि इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश जगमोहनलाल सिन्हा के पुतले भी जलाए गए।

14 से 19 जून 1975: समर्थन और विरोध का दौर

गुहा ने बताया कि इस दौरान इंदिरा गांधी कई बार बाहर आकर समर्थकों को संबोधित करती रहीं। उन्होंने आरोप लगाया कि देश की कुछ राजनीतिक ताकतें विदेशी शक्तियों के साथ मिलकर उनकी सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रही हैं और उनके विरोधियों के पास अपार संसाधन उपलब्ध हैं। मामला कानूनी विवाद से आगे बढ़कर अस्तित्व की राजनीतिक लड़ाई बन गया।

20 जून 1975: बोट क्लब की विशाल रैली

गुहा बताते हैं कि इस शक्ति प्रदर्शन का चरम 20 जून 1975 को देखने को मिला, जब दिल्ली के बोट क्लब मैदान में इंदिरा गांधी ने एक विशाल रैली को संबोधित किया। अपने दोनों बेटों और बहू सोनिया गांधी की मौजूदगी में उन्होंने नेहरू-गांधी परिवार की सार्वजनिक सेवा की विरासत का उल्लेख किया और कहा कि वह अपनी अंतिम सांस तक देश की सेवा करती रहेंगी।

21-22 जून 1975: कांग्रेस में मंथन

कांग्रेस के भीतर चर्चा शुरू हुई कि अगर सुप्रीम कोर्ट भी हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखता है तो आगे क्या होगा। कुछ नेताओं ने अस्थायी इस्तीफे की सलाह दी, लेकिन इंदिरा गांधी इसके लिए तैयार नहीं दिखीं। सत्ता के भीतर असुरक्षा और अनिश्चितता बढ़ने लगी।

23 जून 1975: सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

इंदिरा गांधी की अपील पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई। पूरे देश की नजर अदालत पर थी। अब सबको सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश का इंतजार था।

24 जून 1975: आधी राहत, आधा संकट

न्यायमूर्ति वीआर कृष्ण अय्यर ने इंदिरा गांधी को सीमित राहत दी। उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने की अनुमति मिली, लेकिन सांसद के रूप में मतदान करने और वेतन लेने पर रोक लगा दी गई। यानी उन्हें पूरी राहत नहीं मिली थी और उनका राजनीतिक भविष्य अब भी सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय पर निर्भर था। दिलचस्प बात यह थी कि न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने भी अपने फैसले में संकेत दिया था कि जिन चुनावी उल्लंघनों के आधार पर उन्होंने फैसला सुनाया, वे कानून में वर्णित सबसे गंभीर चुनावी अपराधों की श्रेणी में नहीं आते। रामचंद्र गुहा बताते हैं कि इसी बीच कांग्रेस और सरकार के भीतर यह चर्चा शुरू हुई कि संकट को टालने के लिए इंदिरा गांधी अस्थायी रूप से इस्तीफा दे सकती हैं। कुछ नेताओं ने सुझाव दिया कि मामले का अंतिम फैसला आने तक वरिष्ठ कांग्रेस नेता जगजीवन राम को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है। लेकिन इंदिरा गांधी इस विकल्प के लिए तैयार नहीं हुईं और राजनीतिक संकट लगातार गहराता गया।

इतिहासकार ग्यान प्रकाश अपनी पुस्तक Emergency Chronicles में लिखते हैं कि इंदिरा गांधी को यह विश्वास नहीं था कि अगर वह अस्थायी रूप से प्रधानमंत्री पद छोड़ती हैं तो बाद में आसानी से सत्ता में लौट पाएंगी। प्रकाश के अनुसार, उन्हें लगने लगा था कि उनके खिलाफ एक व्यापक राजनीतिक साजिश चल रही है। वह आशंकित थीं कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन उनके विरोधियों को समर्थन दे रहे हैं। इस संदर्भ में वह अक्सर चिली के राष्ट्रपति सल्वाडोर अलेंदे के तख्तापलट का उदाहरण देती थीं। ग्यान प्रकाश के मुताबिक, ऐसे समय में उनके पुत्र संजय गांधी, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे, हरियाणा के मुख्यमंत्री बंसीलाल, कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता लगातार उन्हें पद पर बने रहने की सलाह दे रहे थे।

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पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी - फोटो : अमर उजाला

25 जून 1975 (दिन): रामलीला मैदान में विपक्ष का शक्ति प्रदर्शन

जयप्रकाश नारायण ने दिल्ली के रामलीला मैदान में विशाल रैली को संबोधित किया। उन्होंने इंदिरा गांधी से इस्तीफे की मांग दोहराई और 29 जून से राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करने की घोषणा की। जेपी ने पुलिस और सेना से भी संविधान और नैतिकता के अनुरूप काम करने की अपील की।

25 जून 1975 (शाम): आपातकाल की तैयारी

प्रधानमंत्री के करीबी सलाहकारों ने स्थिति की समीक्षा की। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने आंतरिक आपातकाल लगाने का कानूनी मसौदा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की सिफारिश भेजी गई।

25 जून 1975 (रात): राष्ट्रपति की मंजूरी

राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री की सिफारिश पर हस्ताक्षर कर दिए और देश में "आंतरिक अशांति" (Internal Disturbance) के आधार पर आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी।

26 जून 1975 की सुबह: देश को आपातकाल की जानकारी

इतिहासकार रामचंद्र गुहा की किताब के अनुसार, आपातकाल लागू होने के बाद इंदिरा गांधी ने देश और विदेश में इसे उचित ठहराने की व्यापक कोशिश की। उन्होंने अपनी मित्र और कलाकार पुपुल जयकर को लिखे एक संदेश में कहा कि बढ़ती हिंसा, नफरत और गलत सूचनाओं को रोकने के लिए आपातकाल आवश्यक था। उन्होंने दावा किया कि केवल लगभग 900 लोगों को गिरफ्तार किया गया है और अधिकांश को जेलों में नहीं बल्कि आरामदायक स्थानों पर रखा गया है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि देश में शांति और अमन-चैन का माहौल है व आपातकाल का उद्देश्य देश को सामान्य लोकतांत्रिक गतिविधियों की ओर वापस ले जाना है।


हालांकि गुहा लिखते हैं कि वास्तविकता इससे अलग थी। देशभर में पुलिस विपक्षी नेताओं, छात्र कार्यकर्ताओं, मजदूर संगठनों और कांग्रेस विरोधी समूहों से जुड़े लोगों को गिरफ्तार कर रही थी। जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई जैसे बड़े नेताओं को हिरासत में लिया गया, जबकि हजारों लोगों को मीसा (MISA) कानून के तहत बिना मुकदमे जेलों में बंद कर दिया गया। गुहा के अनुसार, गिरफ्तार लोगों की संख्या इंदिरा गांधी द्वारा बताए गए आंकड़ों से कहीं अधिक थी।

गुहा बताते हैं कि आपातकाल के शुरुआती महीनों में इंदिरा गांधी ने विदेशी मीडिया को कई साक्षात्कार दिए। उन्होंने लंदन के संडे टाइम्स से कहा कि आपातकाल सत्ता बचाने के लिए नहीं बल्कि जयप्रकाश नारायण द्वारा पैदा की गई कथित असंवैधानिक चुनौती का जवाब था। उन्होंने दावा किया कि देश को अव्यवस्था और विघटन से बचाने व आर्थिक कार्यक्रमों को लागू करने के लिए यह कदम उठाना पड़ा। Saturday Review को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि आपातकाल लोकतंत्र को खत्म करने के लिए नहीं बल्कि उसकी रक्षा के लिए लगाया गया है। उन्होंने पश्चिमी मीडिया की आलोचना करते हुए कहा कि भारत की तुलना पाकिस्तान और चीन जैसे अधिनायकवादी देशों से करना अनुचित है।

रामचंद्र गुहा के अनुसार, आपातकाल के दौरान सरकार ने अनुशासन और नैतिकता को प्रमुख नारे के रूप में प्रचारित किया। सरकारी प्रचार तंत्र ने “अनुशासन ही देश को महान बनाता है”, “काम ज्यादा, बातें कम” और ''स्वदेशी खरीदें, भारतीय बनें'' जैसे नारे पूरे देश में फैलाए। इसके साथ ही इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व को मजबूत नेतृत्व के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया। बड़े-बड़े होर्डिंगों और सरकारी प्रचार में उन्हें व्यवस्था और स्थिरता की गारंटी के रूप में दिखाया गया।

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आपातकाल का दौर - फोटो : अमर उजाला

मौलिक अधिकारों पर रोक

आपातकाल लागू होने के बाद नागरिकों के कई मौलिक अधिकार प्रभावी रूप से निलंबित हो गए। 27 जून 1975 को अनुच्छेद 358 और 359 लागू किए गए।

अनुच्छेद 358 के तहत
नागरिकों को अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाली स्वतंत्रताएं निलंबित कर दी गईं, जिनमें शामिल थीं:

  • बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
  • शांतिपूर्ण सभा करने का अधिकार
  • संगठन बनाने का अधिकार
  • देश में स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार

अनुच्छेद 359 के तहत

सरकार ने नागरिकों को अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ अदालत जाने के अधिकार से भी वंचित कर दिया। इसका असर विशेष रूप से अनुच्छेद 14, 21 और 22 पर पड़ा, जो समानता, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान करते हैं।

बड़े पैमाने पर हुई गिरफ्तारियां

आपातकाल लागू होते ही हजारों विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और छात्रों को गिरफ्तार कर लिया गया।गिरफ्तार होने वाले प्रमुख नेताओं में शामिल थे:

  • जयप्रकाश नारायण
  • मोरारजी देसाई
  • अटल बिहारी वाजपेयी
  • लालकृष्ण आडवाणी

इन गिरफ्तारियों के लिए मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट (मीसा) का उपयोग किया गया। शाह आयोग के अनुसार लगभग 35 हजार लोगों को बिना मुकदमे के हिरासत में रखा गया।

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26 जून 1975 में लगा आपातकाल का दौर - फोटो : अमर उजाला

प्रेस पर सेंसरशिप

26 जून 1975 से देशभर में प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी गई। अखबारों को कोई भी समाचार प्रकाशित करने से पहले सरकारी सेंसर अधिकारियों की मंजूरी लेनी पड़ती थी। सरकार की आलोचना करने वाली खबरों को रोका जाता था। कई समाचार पत्रों के दफ्तरों की बिजली तक काट दी गई ताकि वे अखबार प्रकाशित न कर सकें। विदेशी पत्रकारों की रिपोर्टिंग पर भी निगरानी रखी गई। जुलाई 1975 से विदेशी संवाददाताओं के टेलीक्स संदेशों की जांच शुरू कर दी गई।

फरवरी 1976 में देश की चार प्रमुख समाचार एजेंसियों, पीटीआई, यूएनआई, समाचार भारती और हिंदुस्तान समाचार को मिलाकर "समाचार" नामक एक एजेंसी बना दी गई। इसी दौरान प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को भी समाप्त कर दिया गया।

फिल्मों और मीडिया पर नियंत्रण

20 जुलाई 1975 को फिल्म सेंसर बोर्ड का पुनर्गठन किया गया। फिल्मों और सांस्कृतिक गतिविधियों पर भी सरकार की निगरानी बढ़ गई। सरकार विरोधी सामग्री को रोकने के लिए सेंसरशिप का दायरा व्यापक कर दिया गया।

संवैधानिक संशोधन और सत्ता का केंद्रीकरण

आपातकाल के दौरान संसद ने कई महत्वपूर्ण संविधान संशोधन पारित किए।
38वां संविधान संशोधन: इस संशोधन के बाद राष्ट्रपति द्वारा लगाए गए आपातकाल को अदालत में चुनौती देना लगभग असंभव हो गया।
39वां संविधान संशोधन: प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव को न्यायिक समीक्षा से बाहर कर दिया गया।
42वां संविधान संशोधन: इसे अक्सर छोटा संविधान कहा जाता है। इसके तहत:

  • केंद्र सरकार की शक्तियां बढ़ा दी गईं।
  • न्यायपालिका की शक्तियां सीमित कर दी गईं।
  • नीति-निर्देशक सिद्धांतों को मौलिक अधिकारों से ऊपर महत्व दिया गया।
  • लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल पांच वर्ष से बढ़ाकर छह वर्ष कर दिया गया।
  • संविधान संशोधनों की न्यायिक समीक्षा पर रोक लगाने की कोशिश की गई।
  • नसबंदी अभियान

आपातकाल का सबसे विवादास्पद पहलू बड़े पैमाने पर चलाया गया नसबंदी अभियान था। इसका उद्देश्य जनसंख्या नियंत्रण बताया गया। सरकार के अनुसार 1975-76 में 26.42 लाख नसबंदी, 1976-77 में 81.32 लाख नसबंदी की गई। दो वर्षों नसबंदी का आंकड़ा 1.07 करोड़ तक पहुंच गया। कई जगहों पर राशन कार्ड, सरकारी नौकरी, आवास, ऋण और अन्य सुविधाओं को नसबंदी से जोड़ दिया गया। इससे जनता में भारी नाराजगी फैली और सरकार की आलोचना बढ़ी।

शाह आयोग की जांच

आपातकाल समाप्त होने के बाद मई 1977 में शाह आयोग का गठन किया गया। इसकी अध्यक्षता पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेसी शाह ने की। आयोग का काम 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 के बीच हुई घटनाओं की जांच करना था।

आयोग की प्रमुख टिप्पणियां

  • देश की जेलों में क्षमता से अधिक कैदी बंद थे।
  • 1.26 लाख से ज्यादा कैदी विचाराधीन थे।
  • लगभग 25,962 सरकारी कर्मचारियों को जबरन सेवानिवृत्त किया गया।
  • अविवाहित लोगों की जबरन नसबंदी की 548 शिकायतें दर्ज हुईं।
  • नसबंदी से जुड़ी 1,774 मौतों की रिपोर्ट सामने आई।
  • समाचार पत्रों को मित्र, तटस्थ और शत्रुतापूर्ण श्रेणियों में बांटा गया।
  • कई अखबारों की बिजली काटी गई और अदालतों के फैसलों तक को सेंसर किया गया।

आयोग ने अपनी रिपोर्टों में सत्ता के दुरुपयोग, मनमानी गिरफ्तारियों, सेंसरशिप और मानवाधिकार उल्लंघनों को उजागर किया।

आपातकाल का अंत

जनवरी 1977 में लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा की गई। 16 से 20 मार्च 1977 के बीच चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा और जनता पार्टी सत्ता में आई। मोरारजी देसाई देश के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने। 21 मार्च 1977 को आधिकारिक रूप से आपातकाल समाप्त कर दिया गया।

44वां संविधान संशोधन

जनता पार्टी सरकार ने 1978 में 44वां संविधान संशोधन पारित किया ताकि भविष्य में आपातकाल का दुरुपयोग न हो सके।

इस संशोधन के तहत:

  • 'आंतरिक अशांति' की जगह "सशस्त्र विद्रोह" शब्द जोड़ा गया।
  • मौलिक अधिकारों की सुरक्षा मजबूत की गई।
  • आपातकाल घोषित करने की प्रक्रिया को अधिक कठिन बनाया गया।
  • न्यायपालिका की शक्तियों को बहाल किया गया।
  • लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए अतिरिक्त सुरक्षा प्रावधान जोड़े गए।
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