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36 महीनों में बना दिया था देश का पहला सैटेलाइट 'आर्यभट्ट'

Mon, 24 Jul 2017 04:59 PM IST
BBC
BBC Updated Mon, 24 Jul 2017 04:59 PM IST
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 The country's first satellite 'Aryabhatta' was made in 36 months.
डॉ.यूआर राव - फोटो : Deccan Chronicle

भारत में स्पेस सैटेलाइट कार्यक्रम के पुरोधा डॉक्टर उडुपी रामचंद्र राव की मौत हो गई है। वो 85 साल के थे। उनके काम का असर देश की आर्थिक तरक्की में दिख सकती है। यूं कहें तो इस कारण देश के दूरसंचार क्षेत्र में क्रांति आई। इंटरनेट टेक्नोलॉजी क्षेत्र में तरक्की हुई। रिमोट सेन्सिंग, टेली मेडिसिन और टेली एजुकेशन क्षेत्र में प्रगति हुई है। कुटीर उद्योगों के बड़े शहर बेंगलुरु के पेन्या में एक छोटे टीन के बने घर के नीचे उन्होंने अपना काम शुरू किया था।

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उन्होंने देश के विभिन्न संस्थानों से इंजीनियरों और वैज्ञानिकों को इकट्ठा शुरू किया ताकि वो देश का पहला सैटलाइट 'आर्यभट्ट' बना सकें और उसे अप्रैल 1975 में लॉन्च के लिए सोवियत रूस को सौंप सकें। डॉक्टर यूआर राव 1984 से 1994 तक भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) के चेयरमैन रहे। तब से ले कर बीते हफ्ते तक डॉक्टर राव देश में बने लगभग हर सैटेलाइट के बनने की प्रक्रिया के साथ किसी ना किसी रूप में जुड़े रहे।
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भारत के अग्रणी खलोगशास्त्री और इंडियन इस्टीट्यूट ऑफ साइंस के एरोस्पेस इंजीनियरिंग के चेयरमैन प्रोफेसर आर नरसिम्हा कहते हैं, "बीते हफ्ते वो एक मीटिंग में भी शिरकत करने वाले थे लेकिन तबीयत खराब होने के कारण वो नहीं आ सके थे।" प्रोफेसर नरसिम्हा याद करते हैं, "ये पहली बार था जब वो किसी मीटिंग में नहीं आ सके थे।" उन्होंने बीबीसी को बताया, "डॉक्टर राव देख पाते थे कि किस क्षेत्र में अधिक ध्यान देने की जरूरत है। वो उस पीढ़ी से थे जो मानती थी कि समाज की भलाई के लिए विज्ञान और तकनीक का विकास होना चाहिए। 

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 The country's first satellite 'Aryabhatta' was made in 36 months.
पीएसएलवी - फोटो : YouTube

वो भारत के स्पेस कार्यक्रम के जनक कहे जाने वाले डॉक्टर विक्रम साराभाई के छात्र थे और उनसे काफी प्रभावित भी थे।" इसरो के पूर्व चेयरमैन डॉक्टर के कस्तूरीरंगन कहते हैं, "डॉक्टर साराभाई चाहते थे कि कोई जिम्मेदार व्यक्ति सैटेलाइट कार्यक्रम को संभाले। डॉक्टर राव एक मेधावी छात्र थे, कर्मठ थे और विजनरी थे। वो बड़े काम भी आसानी से कराना जानते थे।" वो कहते हैं, "डॉक्टर साराभाई ने उन्हें मैसाच्युसेट्स इंस्टीच्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) से वापस बुलाया और उन्हें सैटेलाइट कार्यक्रम पर काम करने के लिए कहा।"

डॉक्टर के कस्तूरीरंगन कहते हैं, "उन्होंने लोगों को एकजुट किया और 36 महीनों में सैटेलाइट बना कर लॉन्च के लिए सोवियत रूस को दे दिया। एसएलवी-3 को 40 किलो का बनाया जाना था।" वो कहते हैं, "उस वक्त के सोवियत रूस के राष्ट्रपति ब्रेझनेव ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से बात की और सुझाया कि भारत को एक भारी सैटेलाइट बनाना चाहिए।

इस तरह आर्यभट्ट बनाया गया।" वो कहते हैं, "इसरो के लिए वो एक पिता की तरह थे। आज हम जो भी सैटेलाइट कार्यक्रम देख रहे हैं सब उनके ही दौर में शुरू किया गया काम है।" ऐसा नहीं है कि डॉक्टर राव को कभी आलोचना का सामना नहीं करना पड़ा। एएसएलवी रॉकेट का लॉन्च फेल हो गया और इस कारण उन्हें काफी आलोचना झेलनी पड़ी।

 The country's first satellite 'Aryabhatta' was made in 36 months.
डॉ. यूआर राव

प्रोफेसर नरसिम्हा कहते हैं, "वही वक्त था जब मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिला। वो चाहते थे कि मैं उस कमेटी में काम करूं जो लॉन्च के फेल होने के कारणों की जांच कर रही थी। हमने एक साल में समस्या को सुलझा लिया। हमने इसके बाद पीएसएलवी का लॉन्च किया। इसका पहला लॉन्च भी फेल हुआ। लेकिन उसके बाद से पीएसएलवी कभी फेल नहीं हुआ और हमारे सैटेलाइट सिस्टम के लिए वो एक जादू की गाड़ी जैसा बन गया।"

आर्यभट्ट भारत का पहला उपग्रह था। इसका नाम प्राचीन भारत के खगोलविद् आर्यभट्ट के नाम पर रखा गया था। डॉ राव ने नासा के लिए भी उपकरण बनाए। योजना आयोग के पूर्व सदस्य रह चुके डॉक्टर कस्तूरीरंगन बताते हैं, "वो एक प्रेरणा देने वाले व्यक्ति थे और अपनी मेहनत और फ्रोफेशनलिज्म से उन्होंने हमारा मार्गदर्शन किया। मैं नहीं कह सकता कि मैंने उनसे कुछ सीखा भी या नहीं लेकिन मैंने कोशिश जरूर की। मुझे खुद पर गर्व हैं कि मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिला।"

1971 में जब डॉक्टर साराभाई ने डॉक्टर राव को इसरो में काम संभालने को कहा, उस वक्त वो एमआईटी में कॉस्मिक रेज से संबंधित शोध पर काम कर रहे थे और साथ ही वो नासा के अंतरिक्षयानों में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों को बनाने के काम में भी शामिल थे। डॉक्टर राव अहमदाबाद स्थित फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी की गवर्निंग काउंसिल और तिरुवनंतपुरम के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी के के चेयरमैन रहे थे। वो पहले भारतीय थे जिन्हें साल 2013 में वॉशिंगटन में सैटेलाइट हॉल ऑफ फेम में शामिल किया गया। उन्हें पद्म भूषण और पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया गया।

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