कृषि कानून: समिति अगले 10 दिन में करेगी पहली बैठक, जानें सुप्रीम कोर्ट के आदेश में और क्या खास
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र की मोदी सरकार को झटका देते हुए नए कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगा दी। इसके साथ ही अदालत ने इन कानूनों को लेकर किसानों की समस्याओं और शंकाओं पर चर्चा के लिए एक समिति का भी गठन किया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि यह समिति दो महीने में अपनी रिपोर्ट पेश करेगी और इसकी पहली बैठक 10 दिन के अंदर आयोजित होगी।
सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि सभी किसान संगठनों के प्रतिनिधियों को, भले ही वह कानूनों का विरोध कर रहे हों या समर्थन, समिति का कार्रवाइयों में शामिल होना चाहिए। समिति को सरकार के साथ किसान संगठनों के पक्ष और अन्य हिस्सेदारों के पक्ष को सुनेगी और पहली बैठक के दो महीने के अंदर अपनी रिपोर्ट पेश करेगी। इस समिति के सभी खर्च केंद्र सरकार वहन करेगी।
समिति में भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष भूपिंदर सिंह मान, शेतकारी संगठन के अध्यक्ष अनिल घन्वत, दक्षिण एशिया के अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति एवं अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. प्रमोद जोशी और कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि भूपिंदर मान सिंह और अनिल घन्वत इन कानूनों का समर्थन कर चुके हैं। ऐसे में समिति की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
समिति के चारों सदस्य 'काले कृषि कानूनों के पक्षधर' हैं: कांग्रेस
उधर, कांग्रेस पार्टी ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित की गई समिति के चारों सदस्य 'काले कृषि कानूनों के पक्षधर' हैं। पार्टी ने दावा किया कि इस समिति से किसानों को न्याय नहीं मिल सकता है। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने यह भी कहा कि इस मामले का एकमात्र समाधान तीनों कृषि कानूनों का रद्द करना है।
सुरजेवाला ने दावा किया कि समिति के इन चारों सदस्यों ने इन कृषि कानूनों का अलग अलग मौकों पर खुलकर समर्थन किया है। उन्होंने सवाल किया, 'जब समिति के चारों सदस्य पहले से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और खेत-खलिहान को बेचने की उनकी साजिश के साथ खड़े हैं तो फिर ऐसी समिति किसानों के साथ कैसे न्याय करेगी?'
उन्होंने कहा, हमें नहीं मालूम कि अदालत को इन लोगों के बारे में पहले बताया गया था या नहीं? वैसे, किसान इन कानूनों को लेकर उच्चतम न्यायालय नहीं गए थे। इनमें से एक सदस्य भूपिंदर सिंह उच्चतम न्यायालय गए थे। मामला दायर करने वाला ही समिति में कैसे हो सकता है? इन चारों व्यक्तियों की पृष्ठभूमि की जांच क्यों नहीं की गई?