इसलिए पी चिदंबरम न्यायिक के बजाय चाहते थे पुलिस हिरासत, जानें दोनों के बीच क्या है अंतर
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पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम पर इस समय प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने आईएनएक्स मीडिया मामले में शिकंजा कसा हुआ है। उन्हें कुछ दिन सीबीआई ने अपनी हिरासत में रखकर न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। वह इस समय तिहाड़ जेल में बंद हैं। उन्होंने सीबीआई अदालत अनुरोध किया की उन्हें न्यायिक हिरासत में न भेजा जाए लेकिन उनकी एक नहीं सुनी गई। वह ऐसा इसलिए कह रहे थे क्योंकि दोनों ही हिरासतों में काफी अंतर है। यदि आपको दोनों हिरासतों के बीच का फर्क नहीं पता है तो आज हम आपको इसके बारे में बताते हैं।
क्या होती है पुलिस हिरासत
पुलिस हिरासत का मतलब होता है जब आरोपी पुलिस हवालात में बंद होता है। यानी पुलिस आरोपी को पुलिस थाने में बने लॉक-अप में बंद रखती है। पहले आरोपी पुलिस हिरासत में काफी डरे हुए रहते थे क्योंकि उन्हें शारीरिक यातनाएं दी जाती थी। हालांकि उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद इस तरह की घटनाएं बंद हो गई हैं। अब पुलिस आरोपियों पर थर्ड डिग्री का इस्तेमाल नहीं कर सकती है।
संज्ञेय अपराध (अधिकतम तीन साल की सजा ) में एफआईआर दर्ज करने के बाद पुलिस आरोपी को हिरासत में ले लेती है ताकि वह सबूतों के साथ छेड़छाड़, गवाहों को प्रभावित न कर पाए। गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर पुलिस को आरोपी को किसी भी अदालत के सामने पेश करना होता है। जहां से वह पुलिस हिरासत की मांग कर सकती है ताकि वह तेजी से जांच कर सके। पुलिस किसी भी आरोपी की 15 दिन से ज्यादा हिरासत नहीं मांग सकती है।
क्या होती है न्यायिक हिरासत
गंभीर अपराधों के मामलों में अदालत पुलिस हिरासत खत्म होने के बाद आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेज सकती है ताकि वह सबूतों के साथ छेड़छाड़ या गवाहों को किसी तरह प्रभावित करने की कोशिश न करे। कानून 90 दिनों के भीतर आपराधिक मामलों में आरोपपत्र दाखिल करने का आदेश देता है। यदि 90 दिनों के अंदर आरोपपत्र दाखिल नहीं किया जाता है तो अदालत आमतौर पर आरोपी को जमानत दे देती है।
हालांकि जघन्य अपराध जैसे कि हत्या और बलात्कार के मामलों में आरोपी को आरोपपत्र दाखिल न होने के बावजूद भी न्यायिक हिरासत में ही रखा जाता है। जिससे कि ट्रायल की प्रक्रिया प्रभावित न हो। यदि अदालत को यकीन हो जाए कि कारण पर्याप्त है तो वह अन्य सभी अपराधों के लिए न्यायिक हिरासत को 60 दिनों का कर सकता है। जिसके बाद आरोपी या संदिग्ध को जमानत पर रिहा किया जा सकता है।
इसलिए पी चिदंबरम ने अदालत से किया था ईडी की हिरासत में भेजने का अनुरोध
सीबीआई रिमांड पूरी होने के बाद सीबीआई की विशेष अदालत ने पी चिदंबरम को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत के तहत तिहाड़ जेल भेज दिया था। उन्होंने अदालत में आवेदन दाखिल किया था कि उन्हें ईडी की हिरासत में भेजा जाए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और उन्हें तिहाड़ भेज दिया गया। चिदंबरम दो कारणों से खुद ईडी की हिरासत में जाना चाहते थे।1. सीबीआई या ईडी की हिरासत में चिदंबरम को गेस्ट हाउस में रहना पड़ता। जहां उन्हे घर का खाना मिलता है। वहीं तिहाड़ जेल में उन्हें इस तरह की कोई सुविधा नहीं मिलेगी और उनके साथ बाकी कैदियों की तरह व्यवहार किया जाएगा।
2. न्यायिक हिरासत में उन्हें दोबारा ईडी द्वारा गिरफ्तार किए जाने का डर है। जिसके बाद फिर उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजा जाएगा। यह प्रक्रिया उनके लिए पीड़ादायक है। वह यदि सीबीआई मामले में जमानत ले भी लेते हैं तो उन्हें ईडी हिरासत में ले सकती है जिसके 15 दिनों बाद उन्हें दोबारा लौटकर तिहाड़ जाना पड़ सकता है। इसके बाद वह संबंधित अदालत में जमानत की अर्जी दाखिल करेंगे।