संकट में है देश की चाय: खत्म हो जाएंगे सवा करोड़ लोगों को रोजगार देने वाले टी-गार्डन! पढ़िये इन बागानों की कहानी
डीएम ग्रुप ऑफ कंपनी के डायरेक्टर कमलेश सिंह बताते हैं, मौटे तौर पर टीसीपीएल, एचयूएल और गुडरिक जैसी बड़ी कंपनियां चाय की खरीददार हैं। इन्होंने दस साल से एक ही प्राइस तय कर रखा है। चाय की कीमतें लगभग स्थायी हैं। महंगाई, आसमान छू रही है। सालाना 11 फीसदी की दर से खर्च बढ़ता जा रहा है। मतलब, करीब ढाई से तीन गुना खर्च बढ़ चुका है...
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अधिकांश लोगों की चाय के बिना सुबह नहीं होती है। चाहे अमीर हो या गरीब, चाय समान रूप से सभी को चाहिए होती है। लेकिन आप ये जानकर हैरानी होगी कि 'चाय' अब 'आवश्यक वस्तु अधिनियम' में शामिल नहीं है। साल 2012 में इसे आवश्यक वस्तु अधिनियम से बाहर कर दिया गया था। 'टी प्लांटेशन' को सरकार, कृषि उत्पाद भी नहीं मानती। इस वजह से चाय की पैदावार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य 'एमएसपी' नहीं मिलता। पिछले एक दशक से चाय की पैदावार पर सालाना खर्च 11 फीसदी तक बढ़ चुका है, जबकि दामों में 2-3 फीसदी का ही इजाफा हुआ है। ऐसे में देश की 'चाय' संकट में है। डीएम ग्रुप ऑफ कंपनी के डायरेक्टर कमलेश सिंह बताते हैं, सवा करोड़ लोगों का रोजगार किसी भी वक्त खत्म हो सकता है। 25 हजार करोड़ रुपये का चाय कारोबार, अब 17 हजार करोड़ रुपये पर सिमट गया है। अगर मदद के लिए सरकार आगे नहीं आई तो भविष्य में 'चाय' भी लोगों से दूरी बनाने में देर नहीं लगाएगी।
कमलेश सिंह के मुताबिक, टी गार्डन के हालात ऐसे हो गए हैं कि संपत्ति बेचकर श्रमिकों और इस व्यवसाय में लगे दूसरे लोगों को वेतन देना पड़ रहा है। उन्होंने सवाल के लहजे में कहा, ऐसा कब तक चलेगा। असम में देश के कुल टी गार्डन का 65 फीसदी हिस्सा है। वहां करीब 1050 चाय बागान हैं। पश्चिम बंगाल में 250 बागान हैं। दक्षिण भारत में भी सौ से अधिक बागान हैं। सरकार ने 1984 में टी मार्केटिंग कंट्रोल 'टीएमसी' आदेश निकाला था। इसके बाद से बागान मालिकों को अपनी पैदावार 'चाय उत्पादित केंद्रों' पर ही बेचनी पड़ती है। असम, जहां से 750 मिलियन किलोग्राम चाय का उत्पादन होता है, वहां स्थित टी-बागानों को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है।
वह बताते हैं, मौटे तौर पर टीसीपीएल, एचयूएल और गुडरिक जैसी बड़ी कंपनियां चाय की खरीददार हैं। इन्होंने दस साल से एक ही प्राइस तय कर रखा है। बतौर कमलेश सिंह, चाय की कीमतें लगभग स्थायी हैं। महंगाई, आसमान छू रही है। सालाना 11 फीसदी की दर से खर्च बढ़ता जा रहा है। मतलब, करीब ढाई से तीन गुना खर्च बढ़ चुका है। ये चाय पैदावार के काम में लगे लोगों को खून के आंसू रुलाने जैसा काम है। देश की आजादी से पहले के चाय बागान हैं। श्रमिकों की कई पीढ़ियां इसी काम में लगी रही हैं। ऐसे में बागान मालिकों और श्रमिकों के बीच भावनात्मक रिश्ता हो गया है। कुछ मालिक तो ऐसे हैं कि वे घाटे के बावजूद 'बागान' को नहीं छोड़ रहे।
जीएसटी लागू होने से बढ़ीं दिक्कतें
केंद्र सरकार से दर्जनों बार आग्रह किया गया है कि चाय बागान को कृषि क्षेत्र में शामिल कर लें। अगर ये हो जाता तो फसलों की तरह 'चाय पैदावार' को भी 'एमएसपी' मिल सकता था। डीएम ग्रुप ऑफ कंपनी के डायरेक्टर कहते हैं, अब तो जीएसटी लागू हो गया है। पिछला जीएसटी क्लीयर नहीं है तो माल डिस्पैच नहीं कर सकते। सब कुछ डिजिटली है। गड़बड़ की संभावना ही खत्म हो गई है। सरकार, अगर ‘टीएमसी’ हटा दे, तो खरीददार हमारे बागानों से संपर्क कर सकेंगे। बोली केंद्र पर जाकर चाय उत्पादक फंस जाता है। नुकसान हो रहा है, लेकिन माल वापस नहीं आता। चाय को 'आवश्यक वस्तु अधिनियम' में भी शामिल नहीं कर रहे। ये उद्योग हर साल 7-8 हजार करोड़ रुपये के घाटे में जा रहा है।
चाय बागान मालिकों का कहना है कि सरकार अगर 'टीएमसी' को खत्म कर दे तो भी टी गार्डन जीवित रह सकते हैं। साथ ही इन्हें कृषि सेक्टर में शामिल किया जाए। एमएसपी तय कर करें। मौजूदा परिस्थितियों में जो हालात हैं, उनके लिए ये सब फौरी तौर पर काफी नहीं है। सरकार को, ग्रांट देनी चाहिए। कम से कम चार पांच करोड़ रुपये प्रति इंडस्ट्री ग्रांट जरूरी है। असम में चाय उद्योग को यदि पांच हजार करोड़ रुपये की आर्थिक मदद मिल जाती है तो वह आगे बढ़ जाएगा। सरकार, ये भी नहीं करना चाहती तो प्रति यूनिट चार पांच करोड़ रुपये का ब्याज मु्क्त लोन दिलवा दे। इससे करोड़ों लोगों का रोजगार बना रहेगा। कमलेश सिंह कहते हैं, ये ध्यान रहे कि अब सरकार ने उक्त उपायों में से अगर कुछ नहीं किया तो ये मान लें कि देश में चाय बागान लंबे समय तक नहीं दिखाई देंगे।