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1984 का वह मनहूस मंजर, जब सड़कों पर बिखरी थीं लावारिस लाशें

Mon, 06 Nov 2017 12:44 PM IST
तवलीन सिंह/ अमर उजाला, नई दिल्ली
तवलीन सिंह/ अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 06 Nov 2017 12:44 PM IST
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 Tavleen Singh expressed the Heinous seen of 1984 sikh riots when bodies are spread on roads

सिख संस्थाओं ने 1984 दंगों के पीड़ितों को न्याय दिलवाने की बहुत कोशिश की, लेकिन आज तक न कोई राजनेता दंडित हुआ है, न कोई पुलिस अधिकारी और न ही कोई सरकारी अफसर। इसलिए, 1984 के उन दिनों के बारे में जितना लिखा जाए, जितनी बार लिखा जाए, कम होगा।

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हर वर्ष इस सप्ताह मेरी आंखों के सामने वह दृश्य लौटकर आते हैं, जो 33 वर्ष पूर्व मैंने अपनी आंखों से दिल्ली की गलियों में देखे थे। ऐसा लगता है, जैसे वे दर्दनाक घटनाएं कल हुई हों। वे यादें इतनी ताजा हैं कि मुझे फिर से दिखती हैं सड़कों पर पड़ी हुईं वे लावारिस लाशें, वे जली हुई, बर्बाद बस्तियां, वे डर के मारे भागते सिख परिवार।
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हर वर्ष इस सप्ताह मैं अपने आपसे वही सवाल करती हूं, जो इतने वर्षों से करती आई हूं कि इस महीने के पहले सप्ताह में कैसे हुआ कि 3,000 से ज्यादा सिख तीन दिनों में भारत की राजधानी में मारे गए हों और अभी तक न्याय की संभावना भी न दिखती हो? इस सवाल से जुड़ा एक दूसरा सवाल है, जो मुझे परेशान करता रहता है कि इस नरसंहार को कैसे मेरे पत्रकार बंधु दंगा-फसाद कहते आए हैं?
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मेरी उम्र के पत्रकारों ने अपनी आंखों से देखा होगा किस सुनियोजित ढंग से कांग्रेस ने इस नरसंहार को करवाया था, फिर भी इनमें से शायद ही कोई होगा, जो इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुई इस हिंसा को दंगा न कहता हो। ये वही पत्रकार हैं, जिन्होंने 2002 के गुजरात दंगों को लेकर नरेंद्र मोदी पर बार-बार कीचड़ फेंका है। इसमें से कुछ ऐसे हैं, जो व्यक्तिगत तौर पर मोदी को उस हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराते आए हैं, लेकिन इनमें से एक ने भी कभी राजीव गांधी पर 1984 वाले नरसंहार का दोष नहीं थोपा है।

 Tavleen Singh expressed the Heinous seen of 1984 sikh riots when bodies are spread on roads

यहां मैं बेझिझक स्वीकार करने को तयार हूं कि हम पत्रकारों ने अपना दायित्व नहीं निभाया था 1984 में, सो एक तरह कुछ खून हमारे हाथों पर भी है। उस हिंसा पर भारत के राष्ट्रीय स्तर के पत्रकारों ने थोड़ा-सा ध्यान दिया होता, थोड़ा-सा विश्लेषण किया होता, तो कम से कम कांग्रेस अपनी जिम्मेदारी तो स्वीकार कर चुकी होती अब तक। कम से कम सोनिया गांधी की हिम्मत न होती, मोदी को ‘मौत का सौदागर’ कहने की।

जब भी कांग्रेस के बड़े नेताओं से 1984 की हिंसा के बारे में कोई प्रश्न करता है, तो उनका एक ही जवाब होता है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उस हिंसा के लिए माफी मांग ली है। सो क्या अब न्याय की उम्मीद उन सिख महिलाओं को त्याग देनी चाहिए, जिनके बेटे, पिता और पति जिंदा जला दिए गए थे उनकी आंखों के सामने? मैं अगर उस हिंसा को नहीं भुला पाई हूं, तो वे कैसे भुला सकेंगी? अभी भी याद करती हूं वह दिन, तो कानों में गूंजने लगते हैं ‘इंदिरा गांधी ज़िंदाबाद’ और ‘सिख आ गए हैं, सिख आ गए हैं’ के नारे, जो इशारा करते थे कि हत्यारों की भीड़ पहुंचने वाली है।

दिल्ली का कोई इलाका सुरक्षित नहीं था, सो अशोक होटल के पास मेरी गाड़ी को एक हिंसक भीड़ ने रोककर पूछा था, कोई सिख है की नहीं। भीड़ में बच्चे भी थे, जो हंस रहे थे हत्यारों के साथ। बाद में जब हम लोगों ने तहकीकात शुरू की, तो मालूम पड़ा कि कांग्रेस के बड़े नेता थानों में पहुंचकर अपने कार्यकर्ताओं को छुड़ाने में व्यस्त थे, सिखों की मदद करने में नहीं।

जब खून का बदला खून से लेकर संतुष्ट हुए कांग्रेस के राजनेता, तो सेना को बुलाया गया और हत्यारे ऐसे अदृश्य हुए कि फिर कभी दिखे नहीं। बहुत कोशिश की सिख संस्थाओं ने पीड़ितों को न्याय दिलवाने की, लेकिन आज तक न कोई राजनेता दंडित हुआ है, न कोई पुलिस अधिकारी और न ही कोई सरकारी अफसर। सो 1984 के उन दिनों के बारे में जितना लिखा जाए, जितनी बार लिखा जाए, कम होगा।

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