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SC: 'आउटसोर्स कर्मियों के अनुभव को मान्यता नहीं समानता के खिलाफ', संघर्ष में कमजोर... के साथ खड़ी हों अदालतें

Sun, 01 Dec 2024 06:52 AM IST
ज्योति भास्कर अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Published by: ज्योति भास्कर Updated Sun, 01 Dec 2024 06:52 AM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को निरस्त करते हुए अहम टिप्पणी की। दो जजों की खंडपीठ ने कहा कि आउटसोर्स कर्मियों के अनुभव को मान्यता न देना समानता के खिलाफ है। अदालत ने कहा कि सामाजिक न्याय संविधान में अंतर्निहित है। शक्तिशाली और शक्तिहीन के संघर्ष में अदालतों को कमजोर व गरीब वर्गों के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।

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Supreme Court Verdict Outsource Worker Experience Count Constitution Equality Principle
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारी विभाग में आउटसोर्स किए गए कर्मचारियों के कार्य अनुभव को मान्यता देने से इन्कार करना समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ होगा। शीर्ष अदालत ने कहा, सामाजिक न्याय संविधान में अंतर्निहित उद्देश्य है। यह अदालतों को निर्देश देता है कि जब भी शक्तिशाली और शक्तिहीन में संघर्ष होता है, तो वे कमजोर व गरीब वर्गों के पक्ष में झुकें।
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जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के खंडपीठ के फैसले के खिलाफ चौधरी चरणसिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने एकल जज के फैसले को बरकरार रखा था, जिसमें कहा गया था कि विवि की ओर से जारी विज्ञापन के अनुसार अनुभव के लिए 0.5 अंक देने के बाद प्रतिवादी मोनिका की क्लर्क के पद पर नियुक्ति पर विचार किया जाना चाहिए।
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विश्वविद्यालय ने दलील दी थी, चूंकि महिला अभ्यर्थी को आउटसोर्स नीति के तहत नियुक्त किया था, क्लर्क के किसी नियमित या स्वीकृत पद पर नियुक्त नहीं किया था, इसलिए उसके अनुभव को स्वीकृत पद के लिए जरूरी अनुभव के बराबर नहीं माना जा सकता। हालांकि शीर्ष कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा, किसी अभ्यर्थी को अनुभव के लिए कोई अंक देने से सिर्फ इसलिए मना करना कि उसने स्वीकृत पद पर काम नहीं किया, बल्कि उसे आउटसोर्स किया है, वंचितों के लिए समानता व सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के सांविधानिक कर्तव्य के विरुद्ध होगा। पीठ ने माना कि ग्रुप सी पद की भर्ती प्रक्रिया में अभ्यर्थी को अनुभव के लिए अंक न देना उचित तथा विधिक नहीं है।
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अवसरों में असमानता को खत्म करें
संविधान की प्रस्तावना और अनुच्छेद-38 राज्य के निकायों को यह कर्तव्य सौंपते हैं कि वे लोक कल्याण को बढ़ावा देने के लिए यथासंभव प्रभावी तरीके से सामाजिक व्यवस्था सुनिश्चित और संरक्षित करें। अवसरों में असमानताओं को खत्म करने का प्रयास करें। प्रत्येक चयन प्रक्रिया का वास्तविक जोर काबिल अभ्यर्थियों में से अनुभवी और अन्य मानदंडों को पूरा करने वाले उपयुक्त उम्मीदवारों को ढूंढ़ना और उनका चयन करना होना चाहिए।
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