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मानव तस्करी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: बच्चों के शोषण पर लगेगा पॉक्सो, यौनकर्मी की इच्छा को प्राथमिकता

Mon, 01 Jun 2026 05:46 AM IST
राकेश कुमार अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली। Published by: राकेश कुमार Updated Mon, 01 Jun 2026 05:46 AM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की व्यावसायिक यौन शोषण के लिए की जाने वाली तस्करी पर सख्त रुख अपनाते हुए आदेश दिया है कि ऐसे मामलों में बीएनएस और आईटीपीए के साथ-साथ पॉक्सो कानून की धाराएं भी लगेंगी। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि मानव तस्करी और बाल यौन शोषण जैसे अपराधों में पीड़ित की कथित सहमति का कोई महत्व नहीं है।

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supreme court verdict child trafficking for commercial exploitation pocso act
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की व्यावसायिक यौन शोषण के लिए की जाने वाली तस्करी के मामलों में सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि ऐसे मामलों में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और अनैतिक देह व्यापार (रोकथाम) अधिनियम (आईटीपीए) के साथ-साथ पॉक्सो कानून की धाराएं भी लागू की जा सकती हैं।

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जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने यह फैसला देते हुए यौन कर्मियों की चिंताओं को कम करने और पीड़ितों के पुनर्वास के लिए कई निर्देश भी जारी किए। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर किसी वयस्क पीड़ित को धमकी, बल प्रयोग, धोखाधड़ी, अपहरण, छल, अधिकारों के दुरुपयोग या किसी लाभ के लालच के जरिये शोषण के लिए तैयार किया गया है, तो उसकी कथित सहमति का कोई महत्व नहीं है। मानव तस्करी जैसे अपराध में सहमति की अनुपस्थिति कोई आवश्यक तत्व नहीं है और जांच का केंद्र अपराधियों की मंशा व कार्रवाई होनी चाहिए। सर्वोच्च अदालत ने 29 मई को यह आदेश एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) प्रज्वला की उस याचिका पर दिया गया, जिसमें मानव तस्करी पर रोक लगाने और व्यावसायिक यौन शोषण के पीड़ितों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की गई थी।
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बच्चों का यौन शोषण गैर-सहमति वाला अपराध
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चों की तस्करी के मामलों में उनकी सहमति पूरी तरह अप्रासंगिक है। अगर किसी नाबालिग का यौन शोषण हुआ है तो अपराधियों पर पॉक्सो कानून के तहत मुकदमा चलाया जाएगा। अदालत ने कहा कि भारतीय कानून के अनुसार बच्चे से जुड़ा हर यौन शोषण गैर-सहमति वाला अपराध माना जाता है।
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बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने के लिए पॉक्सो
शीर्ष अदालत ने कहा कि पॉक्सो कानून बच्चों को यौन उत्पीड़न, गंभीर यौन हमले और बाल यौन शोषण सामग्री के निर्माण या प्रसार जैसे सभी अपराधों से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है। ऐसे मामलों में अपराध की रिपोर्टिंग, पीड़ित का बयान दर्ज करने और मेडिकल जांच की प्रक्रिया भी पॉक्सो कानून के विशेष प्रावधानों के तहत होगी।

सहमति के बिना नहीं होना चाहिए वयस्क यौनकर्मी का पुनर्वास
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वयस्क यौनकर्मी के पुनर्वास और संरक्षण गृह में भेजने संबंधी निर्णयों में उनकी सहमति को सर्वोच्च महत्व दिया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी भी वयस्क व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध पुनर्वास प्रक्रिया में शामिल नहीं किया जा सकता।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा, पीड़ितों को केवल बचाव और पुनर्वास के निष्क्रिय विषय के रूप में नहीं देखा जा सकता। उनकी स्वतंत्रता, गरिमा और व्यक्तिगत पसंद का सम्मान करना सांविधानिक रूप से आवश्यक है। यह पीड़ित का जीवन, स्वतंत्रता और भविष्य है। इसलिए उसकी इच्छा को नजरअंदाज कर कोई फैसला नहीं लिया जा सकता। पीठ ने अनैतिक देह व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 की धारा 17 के तहत अपनाई जा रही मौजूदा प्रक्रिया की आलोचना करते हुए कहा कि यह व्यवस्था सभी व्यक्तियों को एक ही श्रेणी में रखती है। इसमें उन लोगों के बीच अंतर नहीं किया जाता जो मानव तस्करी के शिकार हैं, जो किसी दबाव में इस पेशे में आए हैं या जो स्वेच्छा से यौनकर्मी हैं। इससे कई बार अन्यायपूर्ण परिणाम देखने को मिलते हैं।


सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि किसी वयस्क को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से पहले यह जांच की जाए कि वह स्वेच्छा से यौनकर्मी है या नहीं। क्या महिला यौनकर्मी संरक्षण गृह में रहना चाहती है। इस प्रक्रिया में सामाजिक कार्यकर्ताओं की सहायता ली जा सकती है, लेकिन यौनकर्मी खुद की इच्छा को प्राथमिकता दी जाएगी। अदालत ने कहा कि केवल असाधारण परिस्थितियों में ही पीड़ित की इच्छा के विपरीत निर्णय लिया जा सकता है। ऐसा तब होगा जब उसकी सुरक्षा को गंभीर खतरा हो। 

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