SC: वक्फ कानून से जुड़ी अर्जी पर केंद्र को नोटिस; चाइल्ड केयर लीव न मिलने पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं महिला
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सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 द्वारा संशोधित वक्फ अधिनियम, 1995 के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को 1995 के वक्फ अधिनियम को चुनौती देने वाली लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ दिया।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 22 मई को वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के बाद तीन मुद्दों पर अपना अंतरिम आदेश सुरक्षित रख लिया था। इसमें अदालतों द्वारा वक्फ, वक्फ बाई यूजर या वक्फ बाई डीड घोषित संपत्तियों को गैर-अधिसूचित करने की शक्ति और मामले में जिलाधिकारी की शक्ति भी शामिल है।
मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने अंतरिम आदेश सुरक्षित रखने से पहले करीब तीन दिन तक वरिष्ठ अधिवक्ताओं कपिल सिब्बल, राजीव धवन और अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलें सुनीं, जो संशोधित वक्फ कानून के विरोध में याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार का पक्ष रखा।
केंद्र ने इस अधिनियम का दृढ़ता से समर्थन करते हुए कहा कि वक्फ अपनी प्रकृति से ही एक धर्मनिरपेक्ष अवधारणा है और संवैधानिकता की धारणा के इसके पक्ष में होने के मद्देनजर इस पर रोक नहीं लगाई जा सकती। वहीं, याचिकाकर्ताओं की पैरवी कर रहे सिब्बल ने इस कानून को “ऐतिहासिक कानूनी और संवैधानिक सिद्धांतों से पूर्ण विचलन” तथा “गैर-न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से वक्फ पर कब्जा करने” का जरिया बताया। सिब्बल ने कहा, यह वक्फ संपत्तियों पर सुनियोजित तरीके से कब्जा करने का मामला है। सरकार यह तय नहीं कर सकती कि कौन से मुद्दे उठाए जा सकते हैं।
याचिकाकर्ताओं ने तीन अहम मुद्दों पर अंतरिम राहत की मांग की
- पहला मुद्दा “अदालतों द्वारा वक्फ, वक्फ बाई यूजर या वक्फ बाई डीड” घोषित संपत्तियों को गैर-अधिसूचित करने की शक्ति से जुड़ा हुआ है।
- दूसरा मुद्दा राज्य वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद की संरचना से संबंधित है। याचिकाकर्ताओं की दलील है कि पदेन सदस्यों को छोड़कर केवल मुसलमानों को ही राज्य वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद में काम करना चाहिए।
- तीसरा मुद्दा उस प्रावधान से जुड़ा है, जिसमें कहा गया है कि जब कलेक्टर यह पता लगाने के लिए जांच करते हैं कि संपत्ति सरकारी भूमि है या नहीं, तो वक्फ संपत्ति को वक्फ नहीं माना जाएगा।
दूसरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें विनायक दामोदर सावरकर के नाम का दुरुपयोग न करने और उनका नाम प्रतीक एवं नाम (अनुचित प्रयोग की रोकथाम) अधिनियम में शामिल करने के निर्देश देने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी को सावरकर के खिलाफ की गई टिप्पणी के लिए दंड के रूप में सामुदायिक सेवा करने का निर्देश देने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के किसी भी मौलिक अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ा है।
झारखंड की एक महिला न्यायिक अधिकारी ने चाइल्ड केयर लीव की अस्वीकृति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ के समक्ष तत्काल सुनवाई के लिए याचिका का उल्लेख किया गया। पीठ ने 29 मई को मामले की सुनवाई करने पर सहमति जताई। वहीं महिला न्यायिक अधिकारी की ओर से पेश हुए वकील ने कहा कि वह एक अतिरिक्त जिला न्यायाधीश और एकल अभिभावक हैं।
वकील ने कहा, 'उसने चाइल्ड केयर लीव की मांग की थी क्योंकि उसका किसी अन्य स्थान पर तबादला कर दिया गया था।' उन्होंने कहा कि उसके द्वारा मांगी गई छुट्टी को अस्वीकार कर दिया गया था। वकील ने कहा कि महिला ने 10 जून से दिसंबर तक चाइल्ड केयर लीव की मांग की थी। सीजेआई ने पूछा, 'इसे क्यों अस्वीकार कर दिया गया?' वकील ने कहा कि इसके लिए कोई कारण नहीं बताया गया।
उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को बार निकाय एससीबीए की चुनाव समिति से कहा कि वह नौ कार्यकारी सदस्यों के मतों की पुनर्गणना कराए। ताकि कुछ सदस्यों की शिकायतों का समाधान किया जा सके। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ ने बार निकाय का चुनाव कराने के लिए शीर्ष अदालत द्वारा नियुक्त चुनाव समिति की प्रशंसा की। पीठ ने कथित अनियमितताओं को वास्तविक त्रुटि करार दिया। पीठ ने कहा कि नौ कनिष्ठ कार्यकारी सदस्यों के चुनाव के संबंध में हमने चुनाव समिति से कहा है कि वह असंतुष्ट सदस्यों को संतुष्ट करने के लिए मतों की पुनर्गणना कराए। चूंकि चुनाव समिति के कुछ सदस्य आंशिक कार्य दिवसों (सर्वोच्च न्यायालय के) के दौरान उपलब्ध नहीं होते हैं, इसलिए हमने उनसे अनुरोध किया है कि वे अदालतें खुलने के तुरंत बाद यह कार्य करें और वे सभी उपलब्ध रहें।
इसमें कहा गया है कि शीर्ष अदालत कार्यकारी सदस्यों के मतों की पुनर्गणना के लिए पर्याप्त स्टाफ उपलब्ध कराएगी। पुनर्मतगणना उम्मीदवारों/नामांकित व्यक्तियों की उपस्थिति में की जाएगी। हालांकि वे इस प्रक्रिया में बाधा नहीं डालेंगे।सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के पूर्व अध्यक्ष आदिश अग्रवाल द्वारा चुनाव समिति के सदस्यों के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर भी नाराजगी व्यक्त की।
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 21 हाईकोर्ट न्यायाधीशों के तबादलों की सिफारिश की
भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बी. आर. गवई की अध्यक्षता में सोमवार, 26 मई 2025 को हुई सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की बैठक में देशभर के विभिन्न उच्च न्यायालयों के 21 न्यायाधीशों के तबादलों और पुनः नियुक्तियों (रिपैट्रिएशन) की सिफारिश की गई है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, जिन न्यायाधीशों के नाम स्थानांतरण के लिए प्रस्तावित किए गए हैं, उनकी सूची निम्नलिखित है:
| क्र.सं. | माननीय न्यायाधीश का नाम | वर्तमान हाईकोर्ट | प्रस्तावित हाईकोर्ट |
|---|---|---|---|
| 1 | जस्टिस सुजॉय पॉल (मूल उच्च न्यायालय: म.प्र.) | तेलंगाना | कलकत्ता |
| 2 | जस्टिस वी. कामेश्वर राव (मूल उच्च न्यायालय: दिल्ली) | कर्नाटक | दिल्ली |
| 3 | जस्टिस लानुसुंगकुम जमीर | गुवाहाटी | कलकत्ता |
| 4 | जस्टिस मानस रंजन पाठक | गुवाहाटी | ओडिशा |
| 5 | जस्टिस नितिन वासुदेव सांब्रे | बॉम्बे | दिल्ली |
| 6 | जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा | इलाहाबाद | पंजाब एवं हरियाणा |
| 7 | जस्टिस सुमन श्याम | गुवाहाटी | बॉम्बे |
| 8 | जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा (मूल उच्च न्यायालय: राजस्थान) | पंजाब एवं हरियाणा | राजस्थान |
| 9 | जस्टिस विवेक चौधरी | इलाहाबाद | दिल्ली |
| 10 | जस्टिस दिनेश कुमार सिंह (मूल उच्च न्यायालय: इलाहाबाद) | केरल | कर्नाटक |
| 11 | जस्टिस विवेक कुमार सिंह (मूल उच्च न्यायालय: इलाहाबाद) | मद्रास | म.प्र. |
| 12 | जस्टिस बट्टू देवनंद (मूल उच्च न्यायालय: आंध्र प्रदेश) | मद्रास | आंध्र प्रदेश |
| 13 | जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ल | इलाहाबाद | दिल्ली |
| 14 | जस्टिस श्री चंद्रशेखर (मूल उच्च न्यायालय: झारखंड) | राजस्थान | बॉम्बे |
| 15 | जस्टिस सुधीर सिंह (मूल उच्च न्यायालय: पटना) | पंजाब एवं हरियाणा | पटना |
| 16 | जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल | पंजाब एवं हरियाणा | दिल्ली |
| 17 | जस्टिस अरुण कुमार मोंगा (मूल उच्च न्यायालय: पंजाब एवं हरियाणा) | राजस्थान | दिल्ली |
| 18 | जस्टिस जयंत बनर्जी | इलाहाबाद | कर्नाटक |
| 19 | जस्टिस सी. सुमलता (मूल उच्च न्यायालय: तेलंगाना) | कर्नाटक | तेलंगाना |
| 20 | जस्टिस ललिता कन्नेगंटी (मूल उच्च न्यायालय: आंध्र प्रदेश) | कर्नाटक | तेलंगाना |
| 21 | जस्टिस अन्निरेड्डी अभिषेक रेड्डी (मूल उच्च न्यायालय: तेलंगाना) | पटना | तेलंगाना |
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को स्वास्थ्य बीमा कवरेज से मिर्गी को बाहर रखने के खिलाफ दायर याचिका पर केंद्र सरकार और भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (इरडा) से जवाब मांगा। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने संवेदना फाउंडेशन की ओर से दायर याचिका पर नोटिस जारी किए। याचिका में इरडा के मास्टर सर्कुलर को अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मिर्गी से पीड़ित व्यक्तियों के अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए रद्द करने की मांग की गई है। इरडा के मानकीकृत स्वास्थ्य बीमा उत्पादों के मास्टर सर्कुलर में मिर्गी को कवरेज से बाहर रखा गया है, क्योंकि इसे एक न्यूरोलॉजिकल विकार या पूर्ववर्ती स्थिति माना जाता है। याचिका में कहा गया, मिर्गी को स्थायी बहिष्करण में शामिल करने का निर्णय अवैज्ञानिक और असांविधानिक है। यह गलत धारणा पर आधारित है कि मिर्गी से पीड़ित व्यक्तियों की सभी स्वास्थ्य समस्याओं का कारण मिर्गी ही है। इस बहिष्करण के कारण मिर्गी के रोगियों को स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने में गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।