{"_id":"6374f511d16f5b39d5339025","slug":"supreme-court-updates-sc-asks-iaf-to-consider-32-women-ex-ssc-officers-for-grant-pensionary-benefits","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"सुप्रीम कोर्ट: 32 सेवानिवृत्त महिला SSC अधिकारियों को पेंशन लाभ देने पर केंद्र करे विचार, पढ़ें SC की खबरें","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
सुप्रीम कोर्ट: 32 सेवानिवृत्त महिला SSC अधिकारियों को पेंशन लाभ देने पर केंद्र करे विचार, पढ़ें SC की खबरें
Wed, 16 Nov 2022 09:21 PM IST
Amit Mandal
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Amit Mandal
Updated Wed, 16 Nov 2022 09:21 PM IST
सार
पूर्व महिला आईएएफ एसएससी अधिकारियों को राहत देते हुए पीठ ने कहा कि वे 1993-1998 के दौरान नीतिगत निर्णय के तहत सेवाओं में शामिल हुई थीं कि उन्हें पांच साल बाद स्थायी कमीशन देने पर विचार किया जाएगा।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र और भारतीय वायु सेना को निर्देश दिया कि वे 32 सेवानिवृत्त महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) अधिकारियों को उनकी उपयुक्तता के आधार पर पेंशन लाभ देने के उद्देश्य से स्थायी कमीशन (पीसी) देने पर विचार करें। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति हेमा कोहली और जेबी पारदीवाला की पीठ ने हालांकि इस आधार पर उनकी बहाली का आदेश देने से इनकार कर दिया कि उन्हें 2006 और 2009 के बीच सेवा से बहुत पहले ही रिलीज कर दिया गया था।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट ने की वायु सेना की तारीफ
आदेश में कहा गया है, देश की सेवा करने की अनिवार्यताओं से संबंधित जरूरत को ध्यान में रखते हुए बहाली एक व्यवहार्य विकल्प नहीं हो सकता है। खंडपीठ ने कहा कि महिला आईएएफ अधिकारी यदि स्थायी कमीशन के अनुदान के लिए भारतीय वायुसेना द्वारा पात्र पाई जाती हैं, तो वे उस तारीख से एकमुश्त पेंशन लाभ पाने की हकदार होंगी, जब वे सेवा में 20 साल पूरे कर चुकी होतीं, अगर यह जारी रहता। सीजेआई ने निष्पक्ष दृष्टिकोण लेने के लिए वायु सेना की सराहना की और केंद्र व वायु सेना की ओर से पेश वरिष्ठ वकील आर बालासुब्रमण्यम से वायु सेना प्रमुख और सरकार तक सराहना पहुंचाने के लिए कहा।
विज्ञापन
पूर्व महिला आईएएफ एसएससी अधिकारियों को राहत देते हुए पीठ ने कहा कि वे 1993-1998 के दौरान नीतिगत निर्णय के तहत सेवाओं में शामिल हुई थीं कि उन्हें पांच साल बाद स्थायी कमीशन देने पर विचार किया जाएगा। हालांकि, स्थायी सेवा आयोग के लिए विचार किए जाने के बजाय उन्हें क्रमिक रूप से छह और चार साल का विस्तार दिया गया।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि गंभीर चोटों के परिणामस्वरूप स्थायी अक्षमता वाले दुर्घटना के मामलों में पीड़ित के भविष्य की संभावनाओं के लिए मुआवजे की संभावना को खत्म करने का कोई औचित्य नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि अदालत द्वारा मुआवजे के निर्धारण की प्रक्रिया अनिवार्य रूप से एक बहुत कठिन कार्य है और यह कभी भी सटीक नहीं हो सकता है। एक पूर्ण मुआवजा शायद ही संभव है, विशेष रूप से चोट और विकलांगता के दावों में संभव नहीं।
जस्टिस सूर्यकांत और जे बी पारदीवाला की पीठ ने जुलाई 2012 में कर्नाटक में एक सड़क दुर्घटना के कारण 45 प्रतिशत की सीमा तक स्थायी विकलांगता का सामना करने वाले एक व्यक्ति को दिए गए मुआवजे को बढ़ाकर 21,78,600 रुपये कर दिया। अदालत ने कहा कि हमें विभिन्न न्यायाधिकरणों के कई आदेश देखने को मिले हैं और दुर्भाग्य से विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा इसकी पुष्टि की गई है, जिसमें दुर्घटना के मामलों में भविष्य की संभावनाओं के लिए मुआवजे का हकदार नहीं माना गया। इसमें गंभीर चोटें भी शामिल हैं, जिसके परिणामस्वरूप स्थायी विकलांगता हुई है।
जस्टिस सूर्यकांत और जे बी पारदीवाला की पीठ ने जुलाई 2012 में कर्नाटक में एक सड़क दुर्घटना के कारण 45 प्रतिशत की सीमा तक स्थायी विकलांगता का सामना करने वाले एक व्यक्ति को दिए गए मुआवजे को बढ़ाकर 21,78,600 रुपये कर दिया। अदालत ने कहा कि हमें विभिन्न न्यायाधिकरणों के कई आदेश देखने को मिले हैं और दुर्भाग्य से विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा इसकी पुष्टि की गई है, जिसमें दुर्घटना के मामलों में भविष्य की संभावनाओं के लिए मुआवजे का हकदार नहीं माना गया। इसमें गंभीर चोटें भी शामिल हैं, जिसके परिणामस्वरूप स्थायी विकलांगता हुई है।
क्या निचली अदालत को अतिरिक्त आरोपियों को तलब करने का अधिकार?
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इस मुद्दे की पड़ताल शुरू की कि क्या आपराधिक मामले में कुछ आरोपियों के खिलाफ फैसला सुनाने के बाद भी निचली अदालत को अतिरिक्त आरोपियों को तलब करने का अधिकार है। न्यायमूर्ति एस. ए. नज़ीर की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय की संविधान पीठ ने संदर्भ के सवालों पर दलीलें सुनीं। शीर्ष अदालत ने 2019 में दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 319 (अपराध के दोषी प्रतीत होने वाले अन्य व्यक्तियों के खिलाफ कार्यवाही की शक्ति) के दायरे और क्षेत्र पर कानून के तीन प्रश्न तैयार किए थे और इस मामले को निर्णय के लिए एक बड़ी पीठ को भेज दिया था।
पीठ की ओर से संदर्भित मुद्दों में यह शामिल है कि क्या निचली अदालत के पास सीआरपीसी की धारा 319 के तहत अतिरिक्त अभियुक्तों को तलब करने की शक्ति है, यदि अन्य सह-अभियुक्तों से संबंधित मुकदमे का फैसला आ गया हो और तलब किए जाने की घोषणा से पहले उसी तारीख को दोषसिद्धि का फैसला सुनाया गया हो। शीर्ष अदालत ने इस मामले को एक बड़ी पीठ के पास भेजते हुए कहा था कि उसका मानना है कि सीआरपीसी की धारा 319 के तहत प्राप्त शक्ति असाधारण प्रकृति की है और निचली अदालतों को जटिलताओं से बचने और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए आरोपियों को तलब करते समय सतर्क रहना चाहिए।
पीठ की ओर से संदर्भित मुद्दों में यह शामिल है कि क्या निचली अदालत के पास सीआरपीसी की धारा 319 के तहत अतिरिक्त अभियुक्तों को तलब करने की शक्ति है, यदि अन्य सह-अभियुक्तों से संबंधित मुकदमे का फैसला आ गया हो और तलब किए जाने की घोषणा से पहले उसी तारीख को दोषसिद्धि का फैसला सुनाया गया हो। शीर्ष अदालत ने इस मामले को एक बड़ी पीठ के पास भेजते हुए कहा था कि उसका मानना है कि सीआरपीसी की धारा 319 के तहत प्राप्त शक्ति असाधारण प्रकृति की है और निचली अदालतों को जटिलताओं से बचने और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए आरोपियों को तलब करते समय सतर्क रहना चाहिए।
एक ही वाद में दो अलग-अलग आदेश से संबंधित मामले पर नौ जनवरी को सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने एक दीवानी मामले पर सुनवाई नौ जनवरी, 2023 तक स्थगित कर दी, जिसमें मद्रास उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने दो अलग-अलग आदेश पारित किए थे। न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी और न्यायमूर्ति सी.टी. रविकुमार की पीठ ने उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल की तरफ से पेश रिपोर्ट पर गौर करने के बाद सुनवाई स्थगित की।
पीठ ने कहा, 23 सितंबर 2022 के आदेश का अनुपालन करते हुए उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल ने प्रतिवेदन प्रस्तुत किया है। जिन प्रतिवादियों को नोटिस नहीं मिला है, उन्हें नए सिरे से नोटिस जारी किया जाए। चूंकि रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी गई है, इसलिये रजिस्ट्रार जनरल को व्यक्तिगत रूप से पेश होने की जरूरत नहीं है।
अदालत ने 23 सितंबर 2022 को मद्रास उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल से चार सप्ताह में एक सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट मांगी थी, जिसमें उन परिस्थितियों की व्याख्या करने को कहा गया था जिनके तहत एक ही दीवानी मामले में एक खंडपीठ ने 1 सितंबर को दो अलग-अलग आदेश पारित किए गए थे। न्यायालय ने एक पक्ष की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता के. सुब्रमण्यन की दलीलों पर गौर किया था कि खुली अदालत में सुनाया गया आदेश उन्हें मिली प्रमाणित प्रति से अलग था।
पीठ ने कहा, 23 सितंबर 2022 के आदेश का अनुपालन करते हुए उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल ने प्रतिवेदन प्रस्तुत किया है। जिन प्रतिवादियों को नोटिस नहीं मिला है, उन्हें नए सिरे से नोटिस जारी किया जाए। चूंकि रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी गई है, इसलिये रजिस्ट्रार जनरल को व्यक्तिगत रूप से पेश होने की जरूरत नहीं है।
अदालत ने 23 सितंबर 2022 को मद्रास उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल से चार सप्ताह में एक सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट मांगी थी, जिसमें उन परिस्थितियों की व्याख्या करने को कहा गया था जिनके तहत एक ही दीवानी मामले में एक खंडपीठ ने 1 सितंबर को दो अलग-अलग आदेश पारित किए गए थे। न्यायालय ने एक पक्ष की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता के. सुब्रमण्यन की दलीलों पर गौर किया था कि खुली अदालत में सुनाया गया आदेश उन्हें मिली प्रमाणित प्रति से अलग था।