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SC Updates: मद्रास HC में 19 नए जजों की नियुक्ति की सिफारिश को मंजूरी; कॉलेजियम की बैठक में फैसला

Tue, 19 May 2026 11:24 PM IST
शिवम गर्ग न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवम गर्ग Updated Tue, 19 May 2026 11:24 PM IST
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Supreme Court Updates Refuses to Entertain Plea on Renaming Navi Mumbai International Airport and others
सुप्रीम कोर्ट अपडेट - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें केंद्र सरकार को महाराष्ट्र सरकार के उस प्रस्ताव पर समयबद्ध निर्णय लेने का निर्देश देने की मांग की गई थी, जिसमें नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट का नाम बदलने की बात कही गई है। महाराष्ट्र सरकार ने प्रस्ताव दिया था कि नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट का नाम बदलकर 'लोकनेता डी.बी. पाटिल नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट' रखा जाए।

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सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पांचोली शामिल थे, ने याचिकाकर्ता संगठन प्रकाशज्योत सामाजिक संस्था की ओर से पेश वकील को स्पष्ट रूप से कहा कि यह मामला न्यायालय के हस्तक्षेप का नहीं है। पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा "यह नीति निर्माण का विषय है, इसमें अदालत कैसे हस्तक्षेप कर सकती है?"

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सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि वह इस याचिका पर विचार करने के पक्ष में नहीं है, जो बॉम्बे हाई कोर्ट के नवंबर 2025 के आदेश को चुनौती दे रही थी। हाई कोर्ट ने पहले ही इस याचिका को खारिज कर दिया था। अदालत ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी कि वह अपनी बात सक्षम प्राधिकारी के समक्ष रख सकता है। सुनवाई के दौरान पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा "क्या यह अदालत का काम है कि किसी एयरपोर्ट का नाम क्या होना चाहिए?" इस फैसले के साथ ही नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट के नामकरण से जुड़ा विवाद फिलहाल न्यायिक दायरे से बाहर हो गया है और अब यह मामला प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ेगा।

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सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल से रिटायर होने वाले सदस्यों का बढ़ाया कार्यकाल

सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के विभिन्न ट्रिब्यूनलों में कार्यरत उन अध्यक्षों, प्रमुखों और सदस्यों को बड़ी राहत दी है, जिनका कार्यकाल जल्द समाप्त होने वाला था। अदालत ने मंगलवार को आदेश देते हुए ऐसे सभी अधिकारियों का कार्यकाल 8 सितंबर 2026 तक बढ़ा दिया।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पांचोली शामिल थे, ने यह फैसला ट्रिब्यूनलों के कामकाज में किसी तरह की रुकावट न आए, इसे ध्यान में रखते हुए सुनाया।

दरअसल, अदालत में लंबित एक मामले की सुनवाई के दौरान इस मुद्दे का उल्लेख किया गया। मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के एक न्यायिक सदस्य से जुड़ा था, जिनका कार्यकाल जून में समाप्त हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने उनके कार्यकाल को भी 8 सितंबर तक बढ़ाने का आदेश दिया। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने भी इस विस्तार पर सहमति जताई।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि चयन समिति की बैठक 8 सितंबर को प्रस्तावित है, जिसमें नई नियुक्तियों और कार्यकाल विस्तार पर चर्चा की जाएगी। ऐसे में तब तक मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल बढ़ाना जरूरी है ताकि न्यायिक और प्रशासनिक कार्य प्रभावित न हों।

लंबे समय से लंबित संवैधानिक मामलों की सुनवाई के लिए बनेगी पीठ- CJI
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मंगलवार को कहा कि सुप्रीम कोर्ट में लंबे समय से लंबित संवैधानिक मामलों की सुनवाई के लिए जल्द ही सात जजों वाली कई संविधान पीठें बनाई जाएंगी। उन्होंने एक मामले की सुनवाई टालते हुए कहा कि आने वाले दिनों में वे सात जजों की बेंच गठित करने जा रहे हैं, इसलिए मौजूदा मामले को सुनने के लिए उनके पास पर्याप्त समय नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट में कई ऐसे संवैधानिक मामले लंबे समय से लंबित हैं, जिन पर बड़ी बेंच द्वारा फैसला किया जाना जरूरी है। इन मामलों में कानून की व्याख्या और संविधान से जुड़े अहम सवाल शामिल हैं। इसी कारण अदालत अब बड़ी बेंच बनाकर इन मामलों का जल्द निपटारा करने की तैयारी कर रही है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने नौ जजों की बेंच के सामने चल रहे ‘इंडस्ट्री’ की कानूनी परिभाषा से जुड़े मामले की सुनवाई पूरी की थी। इसके अलावा सबरीमाला मामले से जुड़ी संवैधानिक संदर्भ याचिका की सुनवाई भी पिछले सप्ताह समाप्त हुई। माना जा रहा है कि नई संविधान पीठों के गठन से कई महत्वपूर्ण मामलों में जल्द फैसला आ सकता है।
 

मद्रास हाई कोर्ट में 19 नए जजों की नियुक्ति की सिफारिश को मंजूरी
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मद्रास हाई कोर्ट में 19 नए जजों की नियुक्ति की सिफारिश को मंजूरी दे दी है। यह फैसला 18 मई 2026 को हुई कॉलेजियम की बैठक में लिया गया। कॉलेजियम की अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने की। कॉलेजियम ने छह न्यायिक अधिकारियों के नामों को मंजूरी दी है। इनमें डॉ. पी. मुरुगन, एम.डी. सुमति, एस. अल्ली, सी. थिरुमगल चंद्रशेखर, धर्मलिंगम लिंगेश्वरन और कार्तिकेयन बालाथंडायुथम शामिल हैं। इसके अलावा छह वकीलों को भी जज बनाने की सिफारिश की गई है। इनमें नटराजन रमेश, जी.के. मुथुकुमार, रामकृष्णन राजेश विवेकानंदन, शंकरनारायणन रवीकुमार, नागराजन दिलीप कुमार और एलप्पन मनोहरन के नाम शामिल हैं।

कॉलेजियम ने चार अन्य वकीलों और तीन न्यायिक अधिकारियों के नाम भी मंजूर किए हैं। अब इन सिफारिशों को केंद्र सरकार के पास भेजा जाएगा। इसके बाद राष्ट्रपति की मंजूरी और भारत के राजपत्र में अधिसूचना जारी होने पर ये नियुक्तियां प्रभावी होंगी। भारत में हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया कॉलेजियम प्रणाली के तहत होती है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज अंतिम सिफारिश करते हैं।

कोविड के दौरान शुरू किए गए स्वत: संज्ञान मामलों को सुप्रीम कोर्ट ने बंद किया
सुप्रीम कोर्ट ने कोविड-19 महामारी के दौरान लोगों की समस्याओं से जुड़े चार स्वत: संज्ञान (सुओ मोटू) मामलों को बंद कर दिया है। चीफ जस्टिस Surya Kant की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि महामारी के समय हालात अलग थे और उस दौरान अदालत ने लोगों की चिंताओं को दूर करने के लिए कई अहम आदेश दिए थे।

इन मामलों में कोविड मरीजों के इलाज, अस्पतालों में शवों के सम्मानजनक प्रबंधन, जरूरी सामान और सेवाओं की आपूर्ति, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालतों की सुनवाई और मिड-डे मील योजना बंद होने जैसे मुद्दे शामिल थे। अदालत ने कहा कि अब ये मामले अप्रासंगिक हो चुके हैं। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने भी कहा कि जिन मुद्दों पर अदालत ने संज्ञान लिया था, वे अब मौजूद नहीं हैं। कोर्ट ने माना कि उस समय दिए गए निर्देशों से स्थिति को संभालने में मदद मिली। हालांकि, गुजरात के एक अस्पताल में आग लगने से कोविड मरीजों की मौत से जुड़े मामले की सुनवाई अगस्त में की जाएगी। अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी व्यक्ति को अब भी कोई शिकायत है तो वह संबंधित मंच पर जा सकता है।

 

केजी बेसिन गैस विवाद में रिलायंस की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) और उसकी साझेदार कंपनियों की उस अपील पर अंतिम सुनवाई शुरू कर दी है, जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई है। यह मामला कृष्णा-गोदावरी (KG) बेसिन गैस विवाद से जुड़ा है। रिलायंस, बीपी एक्सप्लोरेशन और निको कंपनी ने हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें उनके पक्ष में आए मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) फैसले को रद्द कर दिया गया था। केंद्र सरकार का आरोप है कि रिलायंस ने ओएनजीसी के ब्लॉक से गैस का अवैध इस्तेमाल किया।

रिलायंस की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि गैस का एक ब्लॉक से दूसरे ब्लॉक में जाना प्राकृतिक प्रक्रिया है और इसे चोरी नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा कि सरकार को हर हाल में रॉयल्टी और मुनाफे का हिस्सा मिलता है। सरकार ने 2016 में रिलायंस और उसकी साझेदार कंपनियों पर 1.55 अरब डॉलर का दावा किया था। इससे पहले 2018 में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता ट्रिब्यूनल ने सरकार का दावा खारिज कर दिया था। मामले की अगली सुनवाई बुधवार को होगी।
 

डॉक्टर सुब्बैया हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट ने 9 दोषियों को उम्रकैद दी
सुप्रीम कोर्ट ने चेन्नई के प्रसिद्ध न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर सुब्बैया की हत्या के मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने मद्रास हाई कोर्ट के बरी करने वाले फैसले को रद्द करते हुए 9 आरोपियों की सजा बहाल कर दी। हालांकि मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया है।

यह हत्या सितंबर 2013 में हुई थी। मामला कन्याकुमारी में दो एकड़ जमीन को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद से जुड़ा था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपियों ने जमीन पर कब्जा करने के लिए डॉक्टर की हत्या की साजिश रची थी। ट्रायल कोर्ट ने 2021 में कई आरोपियों को दोषी ठहराते हुए सात लोगों को फांसी की सजा दी थी। लेकिन 2024 में मद्रास हाई कोर्ट ने सबूतों पर सवाल उठाते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को “गंभीर गलती” बताते हुए ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को सही माना। अदालत ने कहा कि मामले में गवाहों, दस्तावेजों और फोरेंसिक सबूतों से आरोप साबित हुए हैं।
 

अदालत में किसी पक्ष का समर्थन करना सरकारी अधिकारियों का काम नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अदालत में राज्य सरकार और उसके अधिकारियों का काम किसी एक पक्ष का समर्थन करना नहीं, बल्कि कानून के अनुसार सही जानकारी देकर अदालत की मदद करना है। यह टिप्पणी अदालत ने उत्तर प्रदेश में कॉलेज प्रिंसिपल की नियुक्ति से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की। जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ए.एस. चंदूरकर की बेंच ने कहा कि कुछ अधिकारियों ने कानून के खिलाफ जाकर एक पक्ष का समर्थन किया। मामला 2019 में जारी एक भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा था। पुराने कानून के तहत तैयार चयन सूची को नए कानून लागू होने के बाद भी इस्तेमाल करने की कोशिश की गई थी। हाई कोर्ट ने इसे गलत मानते हुए नियुक्ति आदेश रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया और कहा कि नए कानून के लागू होने के बाद पुरानी चयन सूची स्वतः खत्म हो गई थी। अदालत ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव से संबंधित अधिकारियों के आचरण की जांच करने को कहा है।

भारतीय नागरिकों के चोरी हुए डाटा पर केंद्र से जवाब नहीं मांगेगा सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय नागरिकों के चोरी हुए डाटा पर केंद्र से जवाब तलब करने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया। शीर्ष अदालत ने केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से इस जनहित याचिका पर विचार करने को कहा। याचिका में विदेशी सर्वरों पर चोरी कर संग्रहित भारतीय नागरिकों के निजी डाटा को वापस लाने या नष्ट करने के लिए मजबूत तंत्र बनाने की मांग की गई है।

सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची व जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ साइबर सुरक्षा सलाहकार नितीश कुमार की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने याचिका पर सीधे सुनवाई से इन्कार करते हुए कहा कि मामला अत्यधिक तकनीकी प्रकृति का है। इसमें कानूनी पहलुओं की तुलना में सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े मुद्दे अधिक हैं। अदालत ने याचिकाकर्ता को अपनी शिकायतें सरकार के समक्ष रखने की सलाह दी। पीठ ने कहा, इस मामले में प्रभावी तरीका यही होगा कि इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय से संपर्क किया जाए। इस याचिका को पूरक प्रस्तुति के रूप में माना जाए और मंत्रालय इस पर विचार करे। याचिका में डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) अधिनियम, 2023 को लागू करने और डाटा चोरी से जुड़े डिजिटल अरेस्ट व जबरन वसूली जैसे मामलों पर रोक लगाने की भी मांग की गई थी।

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि कम से कम पांच विदेशी देशों में मौजूद संस्थाओं की ओर से चोरी किया गया भारतीयों का डाटा उनके खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि फिंगरप्रिंट और अन्य संवेदनशील पहचान संबंधी जानकारियों का उपयोग अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराधों में किया जा रहा है। इस पर अदालत ने कहा कि प्रत्यर्पण संधि के बिना आरोपियों को भारत लाकर कानून के दायरे में लाना मुश्किल है। याचिका में केंद्र सरकार को विदेशी न्यायक्षेत्रों से चोरी हुए निजी डाटा को वापस लाने या नष्ट करने का निर्देश देने, डीपीडीपी अधिनियम को तत्काल लागू करने और डाटा चोरी की जांच के लिए एसआईटी गठित करने की मांग भी की गई थी। मामले का निस्तारण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को मंत्रालय के समक्ष पूरक प्रस्तुति के रूप में देने की अनुमति दी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को रखा बरकरार
मामला यूपी के सहायता प्राप्त स्नातक और स्नातकोत्तर कॉलेजों में प्राचार्य पदों की नियुक्ति से जुड़ा था। 2019 में जारी विज्ञापन के बाद चयन प्रक्रिया पूरी हुई और 2021 में चयनित तथा प्रतीक्षा सूची के उम्मीदवारों की सूची जारी की गई थी। अदालत के अनुसार, अपीलकर्ता को पहले बलिया के कॉलेज में नियुक्ति की सिफारिश मिली थी, लेकिन पारिवारिक परिस्थितियों के कारण कार्यभार ग्रहण नहीं किया। उसने बाद में मेरठ सहित अन्य कॉलेजों में नियुक्ति की मांग की थी। जनवरी 2024 में उसका तबादला मेरठ कॉलेज में करने का आदेश जारी हुआ, जिसे हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी।

कोविड काल से जुड़े स्वत: संज्ञान वाले 4 केस कोर्ट ने बंद किए
सुप्रीम कोर्ट ने कोविड महामारी के दौरान लोगों की समस्याओं से जुड़े चार स्वत: संज्ञान मामलों को बंद कर दिया है। इनमें कोविड मरीजों के इलाज, अस्पतालों में शवों के सम्मानजनक प्रबंधन, आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति, मिड-डे मील योजना और महामारी के दौरान अदालतों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये सुनवाई से जुड़े मामले शामिल थे। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि महामारी के समय हालात अलग थे और उस दौरान नागरिकों की चिंताओं को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए थे। 

डॉक्टर हत्याकांड में नौ दोषियों को उम्रकैद, हाईकोर्ट का फैसला पलटा
सुप्रीम कोर्ट ने चेन्नई के प्रसिद्ध न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सुब्बैया की 2013 में हुई हत्या मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए मद्रास हाईकोर्ट के बरी करने वाले आदेश को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने नौ दोषियों की सजा बहाल करते हुए उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई है। जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह फैसला सुनाया। 96 पृष्ठों के फैसले में जस्टिस बागची ने शुरुआत रवींद्रनाथ टैगोर के लालच पर लिखे कथन से की। अदालत ने कहा कि लालच इंसान को जीवन और संवेदनाओं तक को कुचलने के लिए तैयार कर देता है। डॉ. सुब्बैया की 14 सितंबर 2013 को दिनदहाड़े हत्या कर दी गई थी। मामला कन्याकुमारी जिले की दो एकड़ जमीन को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद से जुड़ा था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, डॉक्टर का आरोपियों के परिवार से जमीन के स्वामित्व को लेकर करीब एक दशक से विवाद चल रहा था। जांच में सामने आया कि कुछ आरोपियों ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर डॉक्टर की हत्या की साजिश रची थी। उन्हें लगता था कि डॉक्टर की मौत के बाद जमीन पर कब्जा करना आसान हो जाएगा। 

2024 में हाईकोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया था
ट्रायल कोर्ट ने 2021 में सभी आरोपियों को दोषी ठहराया था और उनमें से सात को मौत की सजा सुनाई थी। हालांकि जून 2024 में मद्रास हाईकोर्ट ने गवाहों के बयान और सरकारी गवाह की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को गंभीर गलती बताते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट ने 57 गवाहों, दस्तावेजी और फॉरेंसिक सबूतों के आधार पर दोष सिद्ध किया था। अदालत ने दोषियों की सजा बहाल कर दी, लेकिन राज्य सरकार की ओर से फांसी की सजा पर जोर नहीं देने को देखते हुए मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया।

स्पाइसजेट को राहत नहीं, भुगतान शेड्यूल पर हाईकोर्ट जाने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पाइसजेट की उस याचिका में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया, जिसमें एयरलाइन ने पूर्व प्रमोटर कलानिधि मारन के साथ चल रहे विवाद में 144 करोड़ रुपये की जमा राशि के बदले अचल संपत्ति रखने की अनुमति मांगी थी। हालांकि अदालत ने एयरलाइन को भुगतान शेड्यूल में राहत के लिए दिल्ली हाईकोर्ट जाने की छूट दी है। जस्टिसा पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि वह दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने के पक्ष में नहीं है। हालांकि पीठ ने यह भी कहा कि पश्चिम एशिया में जारी संकट और एयरलाइंस के लिए केंद्र सरकार समर्थित इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम (ईसीएलजीएस) जैसे हालिया घटनाक्रमों को देखते हुए हाईकोर्ट इस मामले पर नए सिरे से विचार कर सकता है।

सुनवाई के दौरान स्पाइसजेट ने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी संकट का असर एयरलाइन के परिचालन और वित्तीय स्थिति पर पड़ रहा है। एयरलाइन ने बकाया भुगतान के शेड्यूल में राहत की मांग करते हुए ईसीएलजीएस योजना का भी हवाला दिया। यह मामला काल एयरवेज प्राइवेट लिमिटेड और कलानिधि मारन के पक्ष में दिए गए मध्यस्थता फैसले से जुड़ा है। इस मामले की सुनवाई स्पाइसजेट और उसके चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक अजय सिंह की ओर से मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत दायर चुनौती याचिका के साथ की जा रही है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 19 जनवरी 2026 के दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली स्पाइसजेट की याचिका खारिज कर दी थी, जिसमें एयरलाइन को 144 करोड़ रुपये जमा करने का निर्देश दिया गया था। इसके बाद स्पाइसजेट और अजय सिंह ने नकद राशि के बदले अचल संपत्ति जमा करने की अनुमति मांगते हुए हाईकोर्ट का रुख किया था। हाईकोर्ट ने 18 मार्च 2026 को यह याचिका खारिज कर दी थी और 4 मई 2026 को पुनर्विचार याचिका भी नामंजूर कर दी गई थी।

केजी बेसिन गैस विवाद: अंतिम सुनवाई शुरू
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कृष्णा-गोदावरी (केजी) बेसिन गैस माइग्रेशन विवाद में रिलायंस इंडस्ट्रीज लि. (आरआईएल), बीपी एक्सप्लोरेशन (अल्फा) लि. और नाइको (नेको) लि. की अपीलों पर अंतिम सुनवाई शुरू की। तीनों कंपनियों ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें उनके पक्ष में आए मध्यस्थता आदेश को रद्द कर दिया था।
मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ कर रही है। सुनवाई के दौरान रिलायंस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलीलें पेश कीं। केंद्र का आरोप है कि रिलायंस और उसके साझेदारों ने ओएनजीसी के पड़ोसी ब्लॉक से गैस निकालकर अपने केजी-डी6 ब्लॉक में उपयोग किया। केंद्र के आरोप को खारिज करते हुए सिंघवी ने कहा कि गैस का प्रवाह पूरी तरह से एक भौतिक परिघटना है, जो दाब के अंतर से संचालित होती है। इस प्रक्रिया की तुलना परासरण (ऑस्मोसिस) से करते हुए उन्होंने कहा, चोरी का आरोप तकनीकी व कानूनी रूप से गलत है। सरकार ने परियोजना में कोई पूंजी निवेश नहीं किया और न ही खोज का जोखिम उठाया, फिर भी गैस से मिलने वाली रॉयल्टी और लाभांश की अंतिम लाभार्थी वही है। वहीं, अदालत में रिलायंस की ओर से कहा कि कंपनी ने अल्ट्रा-डीपवॉटर परियोजना में 7.4 अरब डॉलर का निवेश किया। 

सिंघवी ने आगे कहा कि यह भारत के घरेलू गैस उत्पादन की सबसे बड़ी सफलता है और देश के कुल उत्पादन में 30 प्रतिशत योगदान देती है। उन्होंने यह भी दावा किया कि उर्वरक और बिजली जैसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को सरकारी तय कीमत पर गैस उपलब्ध कराने से भारत को 13.7 अरब डॉलर की सब्सिडी बचाने में मदद मिली। इससे पहले 2025 में दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ ने केंद्र सरकार की अपील स्वीकार करते हुए एकल पीठ के फैसले को पलट दिया था। मामले की अगली सुनवाई बुधवार को होगी।
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