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SC Updates: एससी-एसटी वकीलों को आरक्षण की मांग पर 'सुप्रीम' इनकार, लोक सेवकों के खिलाफ शिकायतों पर कही ये बात

Tue, 27 Jan 2026 12:55 PM IST
ज्योति भास्कर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: ज्योति भास्कर Updated Tue, 27 Jan 2026 12:55 PM IST
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Supreme Court Updates PIL ECI Bihar SIR acid attack NH Safety road encroachments BCCI office-bearers Election
सुप्रीम कोर्ट। (फाइल) - फोटो : अमर उजाला

जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि यह याचिका काफी देर से दाखिल की गई है, जबकि बार काउंसिल चुनाव की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है। ऐसे में मौजूदा चुनाव के लिए किसी तरह का हस्तक्षेप संभव नहीं है।

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मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की पीठ कर रही थी, जिसकी अध्यक्षता सूर्य कांत कर रहे थे। पीठ ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद इस तरह की मांग उठाना उचित नहीं है। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि जैसे महिला वकीलों को प्रतिनिधित्व दिया गया है, उसी तरह एससी-एसटी वकीलों को भी मौका मिलना चाहिए।
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इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि महिला वकीलों को आरक्षण नहीं बल्कि प्रतिनिधित्व दिया गया था। यह फैसला लंबे समय तक चली कानूनी लड़ाई के बाद आया था। अदालत ने कहा कि बार काउंसिल 1961 से अस्तित्व में है, लेकिन याचिकाकर्ता अब तक इस मुद्दे पर सक्रिय नहीं थे।
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पीठ ने स्पष्ट किया कि एससी-एसटी वकीलों की मांग पर विचार किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए पहले संबंधित वैधानिक प्राधिकरणों के सामने मामला रखा जाना चाहिए। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को बार काउंसिल ऑफ इंडिया समेत सक्षम संस्थाओं के समक्ष प्रतिनिधित्व देने की छूट दी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में प्राधिकरण इस पर फैसला नहीं लेते हैं, तो अगली बार अदालत का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। हालांकि, मौजूदा चुनाव में किसी तरह का आदेश नहीं दिया जाएगा।


लोक सेवकों के खिलाफ शिकायतों के साथ हलफनामा अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी ड्यूटी के दौरान अपराध करने के आरोप में किसी लोक सेवक के खिलाफ दी जाने वाली शिकायत या अर्जी हलफनामे के साथ होना अनिवार्य है। शीर्ष अदालत ने कहा कि जस्टिस दिपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने इस संबंध में कहा कि जब न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ शिकायतों के लिए हलफनामा जरूरी माना गया है, तो लोक सेवकों के मामलों में इससे अलग कोई तर्कसंगत आधार नहीं हो सकता।

पीठ ने सभी उच्च न्यायालयों को भेजे गए मुख्य न्यायाधीश के एक पत्र का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि बिना हलफनामे के न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ शिकायतों पर विचार नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि दोनों ही मामलों में उद्देश्य समान है। एक ओर जहां लोक सेवकों को जवाबदेह ठहराना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग से उनकी सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। हलफनामे की शर्त इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए है। 

पीठ ने यह भी साफ किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 175(3) के तहत यदि किसी लोक सेवक के खिलाफ लगाए गए आरोप पूरी तरह असंगत, स्पष्ट रूप से निराधार या इतने अविश्वसनीय हों कि कोई समझदार व्यक्ति अपराध मान ही न सके, तो न्यायिक मजिस्ट्रेट को ऐसी अर्जी खारिज करने का अधिकार है। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह का फैसला मनमाने ढंग से नहीं, बल्कि ठोस और वैध कारणों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।


केरल हाईकोर्ट के आदेश को दी गई है चुनौती
यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें केरल हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत तीन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एक महिला से यौन उत्पीड़न के मामले में प्राथमिकी दर्ज करने से जुड़ा सवाल था। अदालत ने इस मौके पर यह भी दोहराया कि शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया निष्पक्ष और जिम्मेदार होनी चाहिए।

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