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SC: किसानों के प्रदर्शन की वजह से बाधित राजमार्ग खोलने की मांग वाली याचिका खारिज; सुप्रीम कोर्ट ने वजह भी बताई
Mon, 09 Dec 2024 12:33 PM IST
अभिषेक दीक्षित
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: अभिषेक दीक्षित
Updated Mon, 09 Dec 2024 12:33 PM IST
सार
पीठ ने पंजाब में याचिकाकर्ता गौरव लूथरा से कहा कि हम पहले ही व्यापक मुद्दे पर विचार कर रहे हैं। केवल आपको ही समाज की फिक्र नहीं है। बार-बार याचिकाएं दायर मत कीजिए।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को किसानों के विरोध प्रदर्शन से जुड़ी एक याचिका खारिज कर दी। याचिका में पंजाब में उन राजमार्गों से अवरोधकों को हटाने के लिए केंद्र और अन्य प्राधिकारों को निर्देश देने का अनुरोध किया गया था। इन राजमार्गों पर किसान विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। जस्टिस सूर्यकांत और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने कहा कि मामला पहले ही अदालत में विचाराधीन है। वह एक ही मुद्दे पर बार-बार याचिकाओं पर विचार नहीं कर सकती।
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पीठ ने पंजाब में याचिकाकर्ता गौरव लूथरा से कहा कि हम पहले ही व्यापक मुद्दे पर विचार कर रहे हैं। केवल आपको ही समाज की फिक्र नहीं है। बार-बार याचिकाएं दायर मत कीजिए। कुछ लोग प्रचार के लिए याचिका दाखिल करते हैं और कुछ लोगों की सहानुभूति पाने के लिए ऐसा करते हैं। अदालत ने याचिका को लंबित मामले के साथ जोड़ने के लूथरा के अनुरोध को भी खारिज कर दिया।
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याचिका में क्या?
याचिका में कोर्ट से केंद्र और अन्य जिम्मेदारों को पंजाब में किसानों के प्रदर्शन की वजह से अवरुद्ध राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों को तुरंत खोलने का निर्देश दिए जाने की अपील की गई है। दरअसल, संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) और किसान मजदूर मोर्चा के बैनर तले दिल्ली कूच को सुरक्षाबलों की ओर से रोके जाने के बाद किसान 13 फरवरी से पंजाब और हरियाणा के बीच शंभू और खनौरी बॉर्डर पर डेरा डाले हुए हैं।
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सामाजिक कार्यकर्ता ने किया शीर्ष अदालत का रुख
पंजाब निवासी एक सामाजिक कार्यकर्ता की ओर से शीर्ष अदालत में याचिका दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि किसानों और किसान संगठनों को दिल्ली जाने से रोका जा रहा है। इसके बाद उन्होंने पंजाब में पूरे राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों को अनिश्चितकाल के लिए अवरुद्ध कर दिया है। ऐसे में किसानों के प्रदर्शन पर प्रतिबंध हटाने और यह सुनिश्चित करने के लिए केंद्र और अन्य को निर्देश दिया जाए कि आंदोलनकारी किसानों की ओर से राष्ट्रीय राजमार्गों और रेलवे पटरियों को अवरुद्ध न किया जाए।
यह दलील दी गई
याचिका में कहा गया है कि पंजाब और पड़ोसी राज्यों के लोगों को बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। वे आपात चिकित्सा स्थिति में समय समय पर अस्पतालों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं, क्योंकि पूरे पंजाब राज्य में राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर एंबुलेंस को भी रोका जा रहा है।
क्लैट-पीजी के नतीजों को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार से इन्कार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को क्लैट-पीजी 2025 के परिणामों को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया। शीर्ष अदालत ने स्नातकोत्तर में प्रवेश के लिए संयुक्त विधि प्रवेश परीक्षा-स्नातकोत्तर (क्लैट-पीजी) की जारी अनंतिम उत्तर कुंजी को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता को दिल्ली हाईकोर्ट का रुख करने की सलाह दी। चीफ जस्टिस संजीव खन्ना व जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने याचिका पर विचार करने से इन्कार करते हुए इस बात पर जोर दिया कि शीर्ष अदालत ऐसे मामलों में प्राथमिक अदालत के रूप में कार्य नहीं कर सकती। कृपया हाईकोर्ट जाएं।
माकपा ने उपासना स्थल कानून मामले में शीर्ष कोर्ट में दिया हस्तक्षेप आवेदन
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने सुप्रीम कोर्ट में हस्तक्षेप आवेदन दायर कर उपासना स्थल अधिनियम, 1991 की सांविधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं का विरोध किया है। माकपा ने अपने आवेदन में कहा कि यह अधिनियम किसी उपासना स्थल के 15 अगस्त 1947 के समय के धार्मिक चरित्र में कोई परिवर्तन प्रतिबंधित करके भारत के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
दृष्टिबाधित को नियुक्ति नहीं, डीओपीटी सचिव को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने 2008 में सिविल सेवा परीक्षा पास करने वाले पूरी तरह दृष्टिबाधित पंकज श्रीवास्तव की नियुक्ति के निर्देश वाले अपने फैसले का पालन न करने के लिए कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी किया। जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने सचिव को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर यह बताने के लिए कहा है कि उनके खिलाफ न्यायालय की अवमानना अधिनियम 1971 के तहत कार्रवाई क्यों न की जाए। पीठ ने 19 दिसंबर से पहले हलफनामा दाखिल करने को कहा है।
हिंदू महिला के मालिकाना हक के मुद्दे के लिए बड़ी पीठ तय करेंगे सीजेआई
हिंदू महिला के मालिकाना हक के मुद्दे पर सुनवाई के लिए सीजेआई जस्टिस संजीव खन्ना एक बड़ी पीठ तय करेंगे। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सोमवार को कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14 के अनुसार हिंदू महिला के मालिकाना हक पर पिछले निर्णयों में अलग-अलग और कभी-कभी असंगत दृष्टिकोण रखा गया। पीठ ने कहा, यह मुद्दा अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रत्येक हिंदू महिला, उसके बड़े परिवार और ऐसे दावों और आपत्तियों के अधिकारों को प्रभावित करता है जो देशभर में लगभग सभी मूल और अपीलीय अदालतों में विचाराधीन हो सकते हैं। कानून की धारा 14 में कहा गया है कि हिंदू महिला के स्वामित्व वाली कोई भी संपत्ति उसकी पूर्ण संपत्ति है, चाहे वह चल हो या अचल। हालांकि धारा 14(1) का प्रावधान उपहार, वसीयत या अन्य साधन के माध्यम से अर्जित संपत्ति पर लागू नहीं होता है। एक मामले पर विचार करते हुए पीठ ने कहा, ऐसे बहुत से निर्णय हैं जो न केवल सैद्धांतिक रूप में एक दूसरे से असंगत हैं बल्कि तथ्यों के आधार पर उनमें अंतर करके या बाध्यकारी निर्णय की अनदेखी करके विपरीत दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास किया गया है। हमारा मानना है कि अधिनियम की धारा 14 की व्याख्या में स्पष्टता और निश्चितता होनी चाहिए।
सुप्रीम प्रस्ताव : दिल्ली का हरित आवरण बढ़ाने के लिए एजेंसी की हो तैनाती
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक एजेंसी नियुक्त करने का प्रस्ताव रखा जो दिल्ली के घटते हरित आवरण को बढ़ाने की दिशा में कदम सुझा सके। कोर्ट ने कहा, हम न्यायमित्र को उन एजेंसियों के नाम सुझाने की अनुमति देते हैं जो यह कार्य करने में सक्षम हों। जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मामले में न्यायमित्र वरिष्ठ वकील एडीएन राव से अगली सुनवाई यानी 18 दिसंबर तक नाम सुझाने के लिए कहा। पीठ ने अपने आदेश में कहा, इस अदालत की अपेक्षा के अनुसार कोई संतोषजनक प्रगति नहीं हुई है। इसलिए हम दिल्ली में हरित आवरण बढ़ाने के उपाय सुझाने के लिए एक एजेंसी नियुक्त करने का प्रस्ताव रखते हैं। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत को सूचित किया गया कि 26 जून के आदेश के बाद से दिल्ली सरकार द्वारा दो बैठकें बुलाई गई थीं, हालांकि रिपोर्ट रिकॉर्ड पर नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट ने पहले दिल्ली सरकार और नागरिक एजेंसियों को एक बैठक बुलाने और शहर के हरित आवरण को बढ़ाने के लिए व्यापक उपायों पर चर्चा करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने यह भी कहा था कि हरित आवरण के नुकसान के कारण लोगों को परेशानी हो रही है। पीठ ने वन विभाग और वृक्ष प्राधिकरण से अपेक्षा की थी कि वे दिल्ली में पेड़ों को अवैध रूप से नुकसान पहुंचाने की गतिविधि पर नजर रखें।